अकबर वाली आपरै, आगै लागी अग्ग।

देखै बळती डूंगरां, प्रथम देखै पग्ग॥

शक्तिसिंह मानसिंह से कहता है कि आपको हमारे यहाँ के चित्रों में अश्लीलता नजर रही है परन्तु अपनी बुआ अकबर को ब्याह रखी है जिसका (अकबर का) अश्लील व्यक्तित्व आपसे छिपा नही है। वह अश्लीलता की आग जो सामने लग रही है आप उसको तो नही देख रहे है, किन्तु चित्रों की अश्लीलता को देख रहे है अर्थात् घर जलता हुआ नही दिखाई देख कर पहाड़ जलता हुआ दिखाई देता है। शक्तिसिंह का आशय है की मनुष्य को अपनी बुराई तो नही दिखाई देती है उसे दुसरो की बुराई ही नजर आती है।

स्रोत
  • पोथी : सगत रासो (सगत रासो) ,
  • सिरजक : गिरधर आसिया ,
  • संपादक : हुक्मसिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : प्रताप शोध प्रतिष्ठान, उदयपुर
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