नागण - जाया चीटला, सींघण - जाया साव।

राणी - जाया नह रुकै, सो कुळ - वाट सुभाव॥

नागिनी से उत्पन्न सर्प-शिशु, सिंहनी से प्रसूत शावक और रानियों से पैदा हुए राजपूतों का तो यह स्वभाव एवं कुलमार्ग है कि वे किसी के रोके नही रुकते।

स्रोत
  • पोथी : वीर सतसई ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : नरोत्तमदास स्वामी, नरेन्द्र भानावत, लक्ष्मी कमल ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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