अवनि अमर नहिं कोई, सिद्ध साधक अरु मुनिवर।
गण गंधर्व मनुष्य, जिख्ख किन्नर असुरासुर।
पन्नंग पावक उदधि, भार तरुवर अष्टादस।
ध्रुव नखित्र ससि सुर, अन्त सब खपै काळ बस।
प्रस्ताव पिख्खि रे नर चतुर, ता लगि कीजइ ऊंच कर।
तिहुं भुवन मज्झि छीहल कहइ, सदा एक कीरति अमर॥