छीहल
सेखावाटी खेतर रा अग्रवाळ जैन कवि।
सेखावाटी खेतर रा अग्रवाळ जैन कवि।
अवनि अमर नहिं कोई
भ्रमर इक्क निसि भ्रमै
छाया तरुवर पिख्खिं
दरबु गाडि जिन धरहिं
फिर चउरासी लख्ख
गरब न कर गुणहीन
घरी घरी नृप गेहि
झीण लंक पदमिणी
लिखा तणइ परमाणि
मृग वन मंज्झि चरंति
नाद श्रवण ध्यावंत
नीच सरिस नहीं प्रीति
निरमल चित्त पवित्त
ओंकार आकार रहित अविगति अपरम्पर
रीति होइ सो भरै
रितु ग्रीषम रवि किरण
सबळ पवन उतपन्न
थोरौ थोरौ माहिं
उदरि मज्झि दस मासु