झमकि सोम असि झरत परत बरबर प्रबीर पर।
बिजयचंद्र दल बिकल भज्यो सिर गिरत घोर भर।
दइव भद्र इत उदित जुद्ध हुव मच्छरीक जय।
स्वबपु घाय चउसठ्ठि लहे करि अरिन महालय।
सतपंच करी हय भट सहंस पहु दोउ न इतके परे।
प्रतिभट हजार पंचक प्रमित उतके धारन उत्तरे॥