धकि तोपन घमचक्क अग्गि लग्गिय धर अंबर।

ओलन गति दुहुं ओर असह गोलन आडंबर।

सलिल निवानन सुक्कि तजत पत्रन भुरसे तरु।

देस अनूपहु दहत महत झंखर बनिगो मरु।

हडुहु चलाइ रोके अहित तारागढ़ सन तोप तति।

किन्नों बिहाल मंडुव कटक गजब डारि पबि पात गति॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 4 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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