एक लम्बे समय से लोक-गीत एवं लोक-संगीत पर कार्य करते रहने का अवसर मिला। सन् 1953 की बात है जब पहली बार लोक-गीतों के विषय में सोचने का अनायास क्रम प्रारम्भ हुआ।

 

बिज्जी एवं मैं 'प्रेरणा' नाम से एक हिन्दी साहित्य की मासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे थे। तब यह तय किया कि प्रत्येक महीने एक लोक-गीत प्रकाशित करेंगे। यह भी तय किया कि प्रकाशित गीतों से चयन नहीं करेंगे, नये गीतों का स्वयं संकलन करके छापेंगे। इस निर्णय का परिणाम यह हुआ कि गायकों से गीतों को संकलित करना पड़ा। उस समय लोक-संगीत पक्ष पर कोई दृष्टि नहीं बन पाई थी। केवल उसके पाठ, उसके काव्य, उस में निहित सौन्दर्य एवं बिम्ब योजना के साथ साहित्यिक मार्मिकता ही प्रभावी आधार बने। लेकिन दस-बीस-पच्चीस गीतों में से एक गीत का प्रकाशन होना था। चयन की प्रक्रिया में गीतों की संरचना पर अपने-आप ध्यान तो आकर्षित होता ही था। कुछ भी हो, यह तो एक बीज था जो धीरे-धीरे अनेक धाराओं में सिंचित होकर पल्लवित होता रहा। सन् 1953 के पूर्व सूर्यनारायण जी पुरोहित एवं नरोत्तमदास जी स्वामी के गीत-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। राजस्थान की अन्य पत्र-पत्रिकाओं, निबन्धों एवं लेखों में लोक-गीतों के साहित्यिक एवं सहृदय की भावभूमि से ओत-प्रोत रूप भी पढ़ने को मिलते थे। लोक-गीतों के माध्यम से व्यक्त मानवीय रिश्तों की धरोहर छवि को प्रशंसा के रूप में प्रकाशित किया जाता था। आज तक भी लोक-गीत अपने भावात्मक एवं संवेदनात्मक रसिक भाव से अथवा मानवीय रिश्तों की सहज अभिव्यक्ति की सीमा से बाहर निकलने में सफल नहीं हो रहा है। यही वो समय भी था जब श्री झवेरचन्द जी मेघाणी का गुजराती लोक-साहित्य की कृतियों में भी खूब मन रमा था। हम भी उसी धारा के ऊहापोह में लोक-गीतों की थाह लेने लगे।

 

दूसरी ओर इसी क्रम में समाजशास्त्र के नये अनुशासन ने लोक-गीतों के अध्ययन की देहरी पर अपनी दस्तक दी। नृतत्वशास्त्र के विद्वानों ने भी लोक-गीतों के माध्यम से समाज एवं मनुष्य के रिश्तों को तराशना व तलाशना प्रारम्भ कर दिया था। निश्चय ही इन शोध एवं अध्ययन की प्रक्रिया ने गीतों की सहज साहित्यिकता से अलग हटकर, सामाजिक सम्बन्धों की सूक्ष्मताओं के अध्ययन का प्रयत्न प्रारम्भ किया। किन्तु स्थापित सामाजिक मूल्यों की पुनःस्थापना अथवा मानवीय व्यवहार के अन्तर्सम्बन्धों की शाब्दिक व्याख्या के परे जाने का क्रम शुरू नहीं हो सका। लोक-गीतों को अपनी मान्यताओं की स्थापना के प्रमाण-स्वरूप उपयोग करना ही प्रमुख ध्येय बना रहा। लोक-वार्ता सम्बन्धी अध्ययन की यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनी रही कि कभी साहित्य ने, कभी इतिहास ने, कभी समाजशास्त्र ने, कभी नृतत्वशास्त्र ने अथवा अन्य विशिष्ट विषयों ने अपनी जरूरत हेतु आवश्यक तथ्यों के लिए इन विशिष्ट अभिव्यक्तियों की खोज-खबर तो ली किन्तु कहीं भी उसे स्वतन्त्र और निरपेक्ष विषय का दर्जा नहीं दिया। लोक-गीतों को लोक-गीतों के हेतु ही देखने-समझने का उपक्रम प्रारम्भ ही नहीं हुआ। यही सत्य लोक-वार्ता की अन्य विधाओं के लिए भी काफी हद तक लागू होता है। यह बात भी भूली नहीं जा सकती कि हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में लोक-वार्ता सम्बन्धी अध्ययन को नये आयाम नहीं मिल रहे थे। अवश्य अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीय लोक-वाङ्मय का नया व्याख्यायित रूप निर्मित होने लगा था।

 

लोक-वार्ता या लोक-वाङ्मय को अपनी स्वतन्त्र व्याख्या के लिए हमेशा ही संघर्ष करना पड़ता है। पहला प्रश्न यही उठता है कि लोक क्या है? क्या फॉक जैसे अंग्रेजी शब्द का अर्थ लोक में रूपायित हो जाता है अथवा नहीं, क्या लोक जैसे विशेषण से युक्त संरचनाओं का उत्स औपनिवेशिक आर्थिक सम्बन्धों के साथ मानवीय व्यवहार की वस्तु-स्थिति को तो प्रकट नहीं करते? इन विवादों से निकलने के बाद लोक एवं शास्त्र या मार्गी एवं देशी जैसी मान्यताओं की तंग गलियों में निकलने का संघर्ष। जो कुछ भी हुआ या जो हो रहा है—उसके बीच एक सुखद स्थिति यह भी बनी कि ‘लोक’ विशेषण से सम्बोधित सभी प्रकार की विधाओं ने अपने-अपने आकार-प्रकार एवं अभिव्यक्ति के दायरे में, अपना-अपना अस्तित्व अवश्य दर्ज करा लिया। ये विधाएँ चाहे लोक-साहित्य हो, लोक-नाट्य हो, लोक-प्रबन्ध काव्य हो, लोक कथाएँ हों, लोक-संगीत हो अथवा लोक-व्यवहारों, आचारों-विचारों का संसार हो। निश्चय ही ‘लोक’ जैसे शब्द के कारण विषय की सीमाएँ और अपनी विशिष्ट स्थिति की ओर हमें अग्रसर कर देती हैं। यह भी स्पष्ट होने लगता है कि प्रत्येक विधा के अनुरूप लोक या लोकोत्तर स्वरूप को पृथक किया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप हम लोक-गीतों को समझने का उपक्रम कर रहे हैं। गीतों के विशिष्ट पक्ष हैं—एक, भाषा की काव्यमय भंगिमा से सम्बन्धित है तो दूसरा, उसके संगीत पक्ष से जुड़ा है। भाषा के साथ अपनी समस्याएँ गुम्फित हैं। जो कथ्यात्मक या मौखिक वस्तुस्थिति तक ले जाने का प्रयत्न करती हैं। सम्भवतया यहीं भाषा के लिखित एवं कथ्य-स्वरूप में भेद की स्थिति पैदा हो जाती है। यह भी स्पष्ट है कि लोक-गीतों की भाषा का सम्बन्ध ‘कथ्य’ से है। निश्चय लिखित से नहीं है। भाषा का दूसरा स्वरूप काव्य से सम्बन्धित है अर्थात् छन्दात्मक अभिव्यक्ति से। यहाँ भी लोक-गीतों के छन्द-रूप अपना स्वतन्त्र रूप स्थापित करने में समर्थ हैं। पारम्परिक रूप से लिखित साहित्य के वार्णिक एवं मात्रिक गणों पर आधारित छन्द-रूपों का अस्तित्व हमें सामान्य लोक-गीतों में नहीं मिलता। छन्दशास्त्र के मूल नियमों का प्रत्यारोपण भी गीतों के छन्दों को व्यवस्थित नहीं कर पाते। अतः यह तो मान ही लेना पड़ता है कि लोक-गीतों की संरचना में कुछ वैशिष्ट्य है या उसके सृजन की प्रक्रिया में कुछ भिन्नात्मक निबद्ध हैं। यही स्थिति हमें संगीत के क्षेत्र में भी मिलती है। संगीत की वस्तुस्थिति पुनः दो तथ्यों पर निर्भर करती है। स्वर एवं लय। शास्त्रीय परम्परा में स्वरों के नाम हैं (सरगम) एवं लय को नापने-जोखने की गणित है। लोक संगीत के साथ दोनों की समझ के स्वरूप भित्र हैं या उनका अस्तित्व गायकों के लिए है ही नहीं। लगता है कि लोक-संगीत की प्रस्थापना की पृष्ठभूमि में विशिष्ट व्याकरण या तकनीकी शब्दावली का अस्तित्व नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि किसी-न-किसी व्याकरणगत नियमों के अभाव में ही काम चल रहा है। अवश्य ही एक अमूर्त व्याकरण गीतों की संरचना का आधार है, जिसके अभाव में लोक-संगीत कभी भी सामाजिक अभिव्यक्ति एवं संवाद का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता।

 

हमारी दुविधा का प्रारम्भ उस स्थिति में निहित है जब लोक-गीतों की व्याख्या करते समय उन मानदण्डों, उपकरणों एवं नियमों के माध्यम से अपनी बात को कह सकते हैं जो हमें लिखित अथवा शास्त्रीय विवेचन में प्राप्त है। ये वस्तुस्थितियाँ चाहे भाषा की हों, काव्य की हों, छन्द की हों, स्वरों की हों, चाहे लय की हों; इस प्रकार का प्रत्यारोपण प्रक्रिया के कारण लगता है कि लोक या लोकेतर गीतों का भेद कृत्रिम है, असंगत है और बहुत हद तक अव्यावहारिक है। काव्य एवं संगीत विशिष्ट कलाएँ हैं और उन में भेद की आवश्यकता नहीं है। लोक एवं शास्त्रीय का भेद कृत्रिम है। इस धारणा के बनने का कारण विश्लेषण की शब्दावली है। जो भी हो, लोकवार्ता की प्रत्येक विधा को अपने मानदण्डों के अनुरूप ही समझना पड़ेगा। अनेक अर्थों में लोक-विधाएँ दूसरे पक्ष को प्रस्तुत करती हैं और निश्चय ही उसका अपना एक दृढ़ शास्त्रात्मक स्वरूप भी अस्तित्व में है, जिसकी गहराई से खोजबीन आवश्यक है।

 

जब 'प्रेरणा' मासिक पत्र में एक ही लोक-गीत छापते थे, उस समय ये समस्याएँ हमारे सामने नहीं थीं। एक सहजभाव था और लोक-गीत की जगह निश्चय ही किसी अन्य प्रकार के गीत ने जगह नहीं पाई थी। लोक गीत जैसी दिखने वाली कविता भी प्रवेश नहीं कर पाई। यह सहज समझ ही लोक जैसे विशेषण की महत्ता को स्थापित करना है।

 

इसी पृष्ठभूमि में प्रेरणा मासिक पत्र में प्रकाशित एक लोकगीत का अपना क्रम चलता रहा। सन् 57 तक आते-आते, बिज्जी और मैंने एक त्रैमासिक पत्र (परम्परा का) के प्रथम अंक को लोक-गीत विषय पर निकालने का तय किया। यह सही है कि वो लोकगीतों का अंक भी साहित्यिक एवं काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ सहज मानवीय व्यवहारों की संवेदनात्मक स्थिति तक सीमित था। ‘प्रेरणा’ के चिन्तन का विकास था या यूँ कहिए कि विस्तार था। लेकिन एक तथ्य अवश्य जुड़ा जो लोक-गीतों के संगीत पक्ष को छूता था। उसके निकट पहुँचने के महत्त्व को इंगित करता था। लेकिन वो प्रयत्न बहुत कुछ संगीत-बोध की चेतना का प्रयास भी नहीं बन पाया। शायद एक अंकुर ने अपना अस्तित्व अवश्य ग्रहण कर लिया। इसी अंक में पहली बार लोकवाद्यों की खोज-खबर ली। वाद्यों सम्बन्धी सभी सूचनाएँ सुनी-सुनाई और अपरिपक्व थीं। लोक-संगीत सम्बन्धी इसी विशेषांक ने हमें लोकगीतों के विषयों की ओर जागृत किया। अंक को निकालते समय ही तय किया कि अगला अंक ‘गोरा हट जा’ नाम से निकालेंगे, जिस में 19वीं सदी में ब्रिटिश साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ प्रचलित गीत होंगे।

 

सन् 1958 में मुझे राजस्थान संगीत नाटक अकादमी में सचिव के पद पर नियुक्ति मिली। अब मुझे मुख्य रूप से संगीत सम्बन्धी कार्यों को करना था। मैंने तय किया कि राजस्थान के लोक-वाद्यों को संग्रहीत किया जाए और उनकी पूरी जानकारी ली जाए। ये वाद्य गाँवों में ही बजते थे—बाजार में उपलब्ध भी नहीं थे। साथ-ही-साथ वाद्य को उपयोग में लेने वाले और बजाने की विधि को समझे बिना भी काम नहीं चल सकता था। वाद्यों की खोज-खबर के लिए मैंने पूरे राजस्थान के गाँवों-गाँवों में घूमना आरम्भ किया। उस समय किया गया वाद्यों का संग्रह आज भी संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर के संग्रहालय का भाग है। लेकिन मैं यह भी स्वीकार करना चाहता हूँ कि वाद्यों को पूरी तरह समझने की मेरी अपनी तैयारी नहीं थी। काम करते-करते ही सीखना पड़ा। कोई समझाने वाला भी सामने नहीं था। जो भी हो, दो बातें स्पष्टतः दिखाई देने लगीं— प्रथम तो वाद्य मुख्यतया पेशेवर गायकों-वादकों के पास ही थे। वे ही कुशल वादक थे। दूसरे, लोकवाद्यों का प्रमुख उद्देश्य गायन से अविच्छेद रूप में जुड़ा था। उन में स्वतन्त्र वादन की प्रवृत्ति नहीं थी। अवश्य ही सुषिर वाद्यों का सीधा-सीधा गायन से सम्बन्ध नहीं था किन्तु उस में जो कुछ बज रहा था, वो गेय-धुनों पर आधारित था। धीरे-धीरे वाद्यों का यह विषय ही मेरे लिए विशिष्ट बनता गया जो चालीस वर्षों बाद भी मेरे साथ चल रहा है।

 

यह सब उस वक्त की बातें हैं जब टेपरिकॉर्डर जैसे यन्त्र ने लोक-गीतों के अध्ययन-क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया था। उसके अस्तित्व में आने की सूचना देश में थी, आकाशवाणी के माध्यम से उसका उपयोग भी हो रहा था किन्तु सामान्य लोगों के पास पहुँचने में काफी समय शेष था। ऐसे समय में केवल एक ही उपाय था कि जो लोक-गीत गाये जाते थे या महिलाएँ गाती थीं उन से सुनकर लिख लिया जाए। डिक्टेशन की इस प्रक्रिया ने गीतों के विशिष्ट लिखित स्वरूप को जन्म दिया। लिखने वालों एवं लिखाने वालों का किसी-न-किसी रूप में दखल होना स्वाभाविक था। लिखाने वाले भी, गेय रूप के अभाव में, शब्दों एवं पंक्तियों को सही संप्रेषित नहीं कर पाते थे। मोटे रूप में भावाभिव्यञ्जना का स्वरूप तो मिल ही जाता था किन्तु गीत के साथ चलने वाली अनेक संगीतात्मक प्रवृत्तियों और आवृत्तियों का उल्लेख सम्भव नहीं बनता था। इस स्थिति का अन्दाज उन सभी विद्वानों एवं संकलनकारों को है जिन्होंने गीतों को डिक्टेशन के माध्यम से लिखने का प्रयास किया। अधिकांशतया लिखने वाले अपने विवेकानुसार शब्दों एवं पंक्तियों को भी व्यवस्थित करना आवश्यक समझते थे। हमें बहुत बाद में समझ में आया कि लोक-गीतों को गाने वाले कभी गीतों को कंठस्थ नहीं करते और गीत को जितनी बार भी गाया जाएगा, उसका स्वरूप, पंक्तियों का क्रम, इसके बिम्बों की क्रमिकता में फेर-बदल होता जाएगा। नई पंक्तियाँ जुड़ भी सकती हैं और घट भी सकती हैं। इतना ही नहीं गीतों के गेय-छन्द की प्राप्ति के लिए अनेक निरर्थक शब्दों का प्रयोग भी होगा।

 

सन् 1960 तक हमारे सामने अन्य कोई विकल्प नहीं था। गीतों को लिख लेने का ही आसरा था। इसी दौरान एक परिस्थिति सामने तो आई लेकिन उसने हमें विशेष रूप से सोचने के लिए बाध्य नहीं किया। लोक-गीतों को कौन गा रहा है, यह प्रश्न ही पैदा नहीं हुआ। विशेषकर पुरुषों द्वारा गाये जाने वाले एवं महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले गीत। यह वस्तुस्थिति धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी कि अधिकतर गीत महिलाओं की ही थाती है। जन्म एवं विवाह, अधिकांश त्योहार एवं उत्सव अथवा पारिवारिक अवसरों पर गीत गाने की परम्परा उन्हीं के पास है। जहाँ तक पुरुषों में गीतों के गाने का प्रश्न है वो होली, कुछ लोक देवी-देवताओं के मेले एवं जागरण के अवसर पर भक्त कवियों की रचनाओं तक ही सीमित हैं। महिलाओं की तुलना में पुरुषों के पास कम गीत और सीमित अवसर ही प्राप्त हैं। यह स्थिति आदिवासी समाज में नहीं है जहाँ स्त्री-पुरुष एक साथ गाते और नाचते हैं। इस वस्तुस्थिति के कारण निश्चय ही हमें महिलाओं के पास ही पहुंचना पड़ा। यह तथ्य हमारे लिए ही महत्त्वपूर्ण नहीं था अपितु जिन्होंने भी लोक-गीतों का संग्रह कार्य किया उनके लिए अनिवार्य बना होगा। लोक-गीतों सम्बन्धी सैकड़ों प्रकाशित संग्रहों में यह स्थिति देखी जा सकती है।

 

बोरुंदा गाँव में एक मौके पर गीतों के संग्रह का कार्य हाथ में लेने का सोचा। विजयदान ने यह दायित्व लिया। गीतों के संग्रह के कौशल के लिए कुछ योग्यताओं का होना आवश्यक है। राजस्थानी भाषा का पूर्ण ज्ञान पहली शर्त, राजस्थानी की कविता को आत्मसात् करने की क्षमता दूसरी शर्त। वाच्य राजस्थानी को लिखने की योग्यता, तीसरी शर्त और अन्तिम शर्त कि जिस से गीतों को सुना जाए, उस में विश्वास जागृत करने के साथ-साथ विषयों के आधार पर उसकी स्मृति को जगाने का उपक्रम। इसका अर्थ यह भी हुआ कि संग्रह करने के पूर्व उन अवसरों की अच्छी जानकारी हो जब गीत निश्चय ही गाये जाते हैं। यदि हम विवाह सम्बन्धी गीतों का संकलन कर रहे हैं तो पहिले विवाह सम्बन्धी रीति-रिवाजों को भली प्रकार समझ लें। यह स्थिति रहेगी तो निश्चय ही गायक-महिला से विपुल सामग्री प्राप्त की जा सकेगी।

 

यहाँ मैं यह भी उल्लेख करना चाहूँगा कि अपने कार्य के प्रारम्भिक वर्षों में, जब हमारे पास किसी प्रकार के साधन नहीं थे, तब अनायास यह भी तय किया था कि हम अपने गाँव बोरुंदा से ही लोक-विधाओं सम्बन्धित सामग्री को संग्रहीत करेंगे तथा लोक-गीत, लोक-कथा, लोक-प्रवाद, लोक-महाकाव्य, लोक-नाट्य, भजन, हरजस, वाणी, फकीरी, कहावत, पहेलियाँ, लोक-चित्राम, गाँव के कारीगरों के काम और अन्य सभी प्रकार के सामाजिक रचनात्मक प्रयत्न एवं किसी भी प्रकार के उत्पादन की प्रक्रियाएँ हमारे कार्यक्षेत्र में होंगे। यह भी बहुत कुछ सत्य है कि प्रारम्भिक अवस्था में भाषा के माध्यम से जो अभिव्यक्तियाँ मिलीं, उन पर पहिले कार्य किया। अतः लोक-कथा एवं लोक-गीत हमारे लिए प्राथमिक हो गये। लोक-कथाओं को सुनकर, उन्हें साहित्यिक एवं सृजनात्मकता के आधार पर लिखने का काम विजयदान ने प्रारम्भ किया। बोलचाल की सशक्त वाणी को लोक-कथाओं के माध्यम से एक नया जीवन प्राप्त हुआ। इन लोक-कथाओं का प्रकाशन बोरुंदा गाँव से हमारी मासिक पत्रिका ‘वाणी’  में करना प्रारम्भ किया। ये कथाएँ राजस्थानी भाषा में लिखी गईं। हमारा प्रारम्भ से ही यह प्रयत्न भी रहा था कि राजस्थानी भाषा में नये साहित्य की रचना हो। लिखित भाषा सम्बन्धी वर्णविन्यास का निर्धारण हो। अपनी भाषा को एक मानक रूप प्रदान किया जाए। सन् 1960 के पूर्व राजस्थानी कविताओं का तो विपुल प्रकाशन हुआ किन्तु गद्य में बहुत कम लिखा जा रहा था। जो कुछ मिलता था उस में लिखित रूप सम्बन्धी अनेक भ्रांतियाँ थीं। जैसा बोलो, वैसा लिखो जैसी स्थिति के कारण हमारी भाषा में एकरूपता का स्वरूप नहीं बन रहा था। दूसरी ओर हम इसके लिए भी प्रयत्नशील थे कि वर्तमान रूप में बोली जाने वाली भाषा का साहित्यिक प्रयोग हो। यह भी एक प्रमुख कारण रहा कि हमने लोक-कथाओं के लेखन कार्य को तरजीह दी। लोक-कथाओं को सुनने की प्रक्रिया में बोलचाल की राजस्थानी भाषा का रूप भी मिला। किन्तु उस से भी अधिक वो तात्विक एवं मार्मिक अभिव्यक्तियाँ भी मिलीं जो किसी भी कथा को कहने में स्वाभाविक रूप से आती हैं। प्रभावी रूप से कथा सुनाने वाले तो अत्यन्त सुष्ठ और सुन्दर भाषा का प्रयोग करते हैं। निश्चय ही लोक-कथाओं के माध्यम से राजस्थानी भाषा के गद्यात्मक साहित्य की अपार क्षमता दिखने लगी और उसका फल भी हमें विजयदान द्वारा लिखित ‘बातां री फुलवाड़ी’ के चौदह भागों से मिला। कथाओं के प्रकाशनों ने यह भी सिद्ध कर दिया कि उसके पाठकों की कोई कमी नहीं है। वाणी मासिक पत्र भी हजारों बच्चों, युवकों एवं वृद्धों के हाथ में पहुँचा। बाद में ‘बातां री फुलवाड़ी’ के चार संस्करण हाथोंहाथ निकल गये। उस गद्य को खरीद कर पढ़ने वाला पाठक भी मिल गया। विजयदान की उस मौलिक क्षमता का दर्शन भी हुआ जो सामान्य-से-सामान्य कथा को नया आयाम प्रदान कर सकती थी। पारम्परिक कथा के अर्थ और उद्देश्य का सीधा सम्बन्ध वर्तमान जीवन के संघर्ष एवं उसकी समस्याओं के उद्घाटन से जुड़ गया। लोक-कथाओं का अयथार्थ ही जीवन के यथार्थ को सशक्त रूप से परिभाषित करने लगा। विजयदान का गद्य-सर्जन धीरे-धीरे राजस्थानी भाषा के पाठक के रूप में स्वीकारा गया। लेकिन लोक-गीतों की वस्तुस्थिति उस से भिन्न थी। लोक गीतों के लेखन में किसी प्रकार के भाषायी प्रयोग की आवश्यकता नहीं थी। उन्हें तो ठीक उसी रूप में लिखा जाना था, जिस रूप में वे कण्ठों पर विराजमान थे। लेकिन गीतों की भाषा के प्राञ्जल रूप की अनुभूति भी अपने-आप में अद्भुत थी। अनुभूतियों का सौन्दर्य भी भाषा के प्रयोग में बहुत सहायक सिद्ध हुआ।

 

अपने को गाँव की सीमा में ही आबद्ध करने का परिणाम यह भी हुआ कि हम विषयों एवं विधाओं की गहराई तक पहुँच सके। विजयदान का सम्पूर्ण बचपन इसी गाँव में बीता, उनके परिवार के सभी सदस्य सात पीढ़ियों से यहीं रहते थे, गाँव के सभी परिवारों से पीढ़ियों के आत्मीय सम्बन्ध थे। कोई भी अपरिचित नहीं था। परिवार खेती पर निर्भर था। गाँव की सभी प्रकार की सेवाएँ खेती के काम के साथ जुड़ी थीं। अनजाना कुछ भी नहीं था। इस आत्मीयता का परिणाम यह भी हुआ कि गीतों एवं कथाओं के प्रसंग व उनकी पृष्ठभूमि का लाभ अनायास मिल गया। इस दौरान हम बहुत सजग नहीं थे कि लोक-विधाओं के अध्ययन में ‘प्रसंग’ का कितना महत्त्व है। कौन, कब, कहाँ, कैसे व कौन-सी विधाओं के माध्यम से अपने-आपको व्यक्त करता है? व्यक्त करने वाले व्यक्ति की परिवार, समाज, जाति व गाँव में कौन-सी स्थिति है। और वो ही व्यक्ति क्यों विशिष्ट विधा के प्रयोग का धनी है। ये गहरे व संश्लिष्ट अनुभव हमारे लिए आने वाले वर्षों में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।

 

गाँव में जब गीतों के संकलन का प्रश्न आया तो पहिले यही जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न किया कि किन से गीत संग्रह किये जाएँ। गाँव वालों ने ही बताया कि भाँबी परिवार की महिलाओं को बहुत गीत याद हैं। ये महिलाएँ गाँव की मुख्यतया खेतीहर मजदूरी का कार्य करती हैं, उन्हें बुलाकर गीतों को आसानी से लिखा जा सकता है। यह भी हमें महसूस हो रहा था कि सवर्ण जाति की महिलाएँ पारम्परिक गीतों से धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं या उन्हें बहुत कम चीजें याद हैं। अपनी आवश्यकता होने पर, अन्य महिलाओं को आमन्त्रित करके, रीति-रिवाज पूरे करती हैं। पढ़ाई-लिखाई ने भी उन्हें गीतों से दूर करना प्रारम्भ कर दिया है। साथ ही यह भी महत्त्वपूर्ण तथ्य था कि उन्हें गीत लिखाने के लिए आसानी से तैयार करना कठिन कार्य था। सो भाँबी स्त्रियों से गीतों को लिखने का क्रम प्रारम्भ हुआ। लेकिन यहाँ भी खास स्थिति का सामना करना पड़ा। सामान्यतया लोक-गीतों को समूह-बद्ध होकर गाया जाता है लेकिन तीन-चार औरतों के समूह को डिक्टेशन पद्धति से नहीं लिखा जा सकता। अतः बुलाते तीन-चार स्त्रियों को थे किन्तु लिखाने वाली महिला, हर हालत में एक होती थी। धीरे-धीरे यह भी स्पष्ट होने लगा कि संकलन की प्रक्रिया में, जो वास्तविक है उसे अपनी पूर्ण मान्यता के साथ, प्रस्तुत करना लिखना कठिन हो सकता है। अब यह अवश्य महसूस होता है कि संकलन करने की पूरी प्रक्रिया से पाठकों को स्पष्टतः बता देना चाहिए ताकि उन्हीं आधारों पर वे विश्लेषण हेतु अपने निर्णय ले सकें।

 

विजयदान ने जब अनेक गीतों का संग्रह तैयार कर लिया तो स्वाभाविक था कि उन्हें किसी-न-किसी रूप में वर्गीकृत किया जाए। उस समय तक के अध्ययनों के आधार पर वर्गीकरण की प्रक्रिया को समझने की कोशिश की। सामान्यतया ये वर्गीकरण संस्कारगत परिस्थितियों (अर्थात् जन्म एवं विवाह), त्योहार-उत्सव, ऋतुएँ और प्रकृति के विभिन्न तथ्यों के आधार पर मिले। अर्थात् गीतों के गाने के अवसर कौन-से हैं या उनके विषय क्या हैं उन्हीं तथ्यों के इर्द-गिर्द वर्गीकरण की स्थिति प्राप्त हुई। विजयदान ने उन वर्गीकरण की परिस्थितियों से, भिन्न गीतों की भावनात्मक अवधारणाओं पर गीतों को सजाया। यह एक नये तरह का प्रयास था। यहाँ गीतों के गाने का अवसर का महत्त्व स्वीकार नहीं किया गया। भाई-बहिन से सम्बन्धित गीत साथ हो गये, ससुराल के विभिन्न अनुभवों को व्यक्त करने वाले गीत साथ जुड़ गये, दाम्पत्य स्नेह के गीतों का गुच्छा एक बन गया। निश्चय ही गीतों के साहित्यिक एवं काव्यात्मक रूपों को यहाँ प्राथमिकता मिली।

 

दूसरी बार गीतों के संग्रह के लिए अन्य पद्धति को ग्रहण करने का प्रयत्न किया। इस बार समूह को सामने नहीं रखा गया। गाँव में यह जानने का प्रयत्न किया कि ऐसी कौन-सी महिला है जिसे अनेक गीत याद हैं। गाँव की महिलाओं से जानकारी लेने पर यह बात भी आसानी से पता लग जाती है। पता लगा कि विजयदान के परिवार में ही स्वर्गीय श्रीमती सायर कँवर धर्मपत्नी श्री चिमनदान जी देथा को खूब गीत याद हैं और चारण परिवार की महिलाएँ उन्हीं के नेतृत्व में गीतों को गाती हैं। रिश्ते की निकटता के कारण गीतों को लिखने का अवसर भी मिल गया। विजयदान को गीत लिखाने में रिश्ते की बाधा नहीं थी। ये गीत भी डिक्टेशन के आधार पर लिखे गये। इन्होंने कुल 208 गीत लिखवाये। सावा, लगन एवं विरद के गीत ही लिखवाने की बात उन्होंने की। गीतों को लिखवाते समय उन्होंने गीतों को जिन शीर्षकों से सम्बन्धित किया वो विश्लेषण की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लग रहे हैं। इन में विवाह के क्रिया-कलापों का आभास है लेकिन लिखवाने में सभी जगह उनका वास्तविक क्रम अवश्य नहीं मिलता।

 

इन गीतों के विषय में उन्होंने कहा कि सावे, लगन एवं विरद के गीत तो हैं फिर भी गीतों की पहिचान के लिए कुछ शीर्षकों का उपयोग किया। शीर्षक थे- आरती, बनौली, पीठी-चढ़ाना एवं उतारना, तेल सञ्चारना, बाजोट बिठाना, स्नान कराना, शृंगार करना, सेवरा पहिनाना, घोड़ी, बन्ना-बन्नी के लाड-कोड, कांमण, सामेळौ, कैवारी जान, सेवरा, तोरण, कँवर-कलेवा, माया, हथलेवा जोड़ना एवं छोड़ना, झुरावौ, चंवरियाँ सूं उतरणौ, सीख, खोळ भरणौ, बधावौ, झारी इत्यादि बाँधना, जान-जीमण, गाळियाँ, समठावणी, सुगन-बंदावणा, ओळूं और उसके बाद रातीजगे के विभिन्न गीत। इनके दो भाग—देवी-देवताओं से सम्बन्धी एवं सिंगार गीत (शृंगारिक गीत, विशेषकर कथाएँ)। कुछ गीतों को नाम देने की बजाय सम्पन्न होने वाले कार्य का विवरण देना ही उचित समझा। लेकिन यहाँ इस बात को स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि एक शीर्षक के अन्तर्गत एक ही गीत हो, यह नहीं होता। आरती, बना-बन्त्री, बधावा, घोड़ी, कांमण जैसे नामों से दस-बीस-तीस तक गीत होते हैं। गीतों के इन नामकरणों के विषय में एक पूरे सोच की जरूरत है जो उनके विषय, विवरण एवं सम्बन्धित क्रिया-कलापों को व्याख्यायित करते हैं। साथ-ही-साथ गीतों के आने वाले भावों, कल्पनाओं, उनके रूप एवं मुहावरों को सृजित करते हैं। विषयगत ये विभाजन स्वयं गायक ही निर्धारित करते हैं। कभी-कभी संग्राहक अपनी ओर से गीतों के शीर्षक दे देते हैं जो उचित नहीं होता। यहाँ गीत के शीर्षक में एक या दो शब्द हैं किन्तु जो कार्य इन शब्दों में निहित हैं, उसे भली प्रकार समझे बिना गीत के अर्थ को प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ प्रत्येक शब्द का अर्थ एक वस्तु नहीं है अपितु एक सम्पूर्ण क्रिया है। और इन क्रियाओं में जाति एवं स्थान के साथ-साथ मान्यताओं सम्बन्धी अनेकानेक भेद हैं।

 

श्रीमती सायर कँवर का यह भी कहना था कि ये गीत उन्होंने बोरुंदा में अपने विवाह के पूर्व 14 वर्ष की उम्र तक गाये या सीखे। सीखने का अर्थ उन्होंने यही बताया कि गाँव की अन्य महिलाओं के साथ-साथ गाया। किसी के पास कुछ समय बैठकर सीखने का प्रयास कभी नहीं हुआ। बाद में बोरुंदा आने के बाद उन्होंने अन्य स्त्रियों के साथ इन्हीं गीतों को गाकर अपनी एक विशिष्ट पहचान भी बनाई। गीतों को याद रख पाने की ऐसी क्रिया पर निश्चय विचार करने की आवश्यकता है। 208 गीतों तक की बात भी श्रीमती सायर कँवर के साथ पूर्ण नहीं होती क्योंकि उन्होंने बच्चे के जन्म के पूर्व, दौरान एवं बाद के मांगलिक अवसरों के गीत लिखाए नहीं।

 

व्रत, उत्सव, त्योहारों के गीत भी याद थे लेकिन विजयदान को मौका नहीं मिला कि उन्हें संग्रहीत कर पाता। इस एक उदाहरण से यह तो प्रमाणित होता है कि 400-500 संख्या तक गीत विशिष्ट महिलाओं में मिलना सम्भव है।

 

जोधपुर के माली समाज में जन्मी श्रीमती सुखदा देवी दूसरा उदाहरण है। उन्होंने राजस्थानी के सौ लोकगीतों की एक पुस्तक प्रकाशित की है, दो-तीन भाग और भी तैयार कर रही हैं और वे भी इन्हीं वर्षों में प्रकाशित होने हैं। उनसे जब मैंने पूछा कि ये गीत आपने किसलिए संकलित किये? तो उनका उत्तर था कि सब गीत मुझे याद हैं। आने वाले संग्रह के गीत भी उन्हें याद हैं। सुखदाजी जोधपुर में जायी-जन्मी और 14-15 वर्ष में उनका भी विवाह हो गया था और वो दिल्ली में रहने लगीं। वहाँ राजस्थानी गीतों को यदा-कदा ही गाने का अवसर मिला। अपने पीहर के मांगलिक अवसरों पर अवश्य कुछ गाया। लेकिन स्मृति से वे जो भी गीत लिख पाईं, वे सभी विवाह के पूर्व उनके पास पहुँचे थे। सुखदाजी से मैंने पूछा कि क्या इन सभी गीतों की धुनें आपको याद हैं? उत्तर था— धुन की स्मृति के बिना गीत को याद रख पाना सम्भव नहीं है। मैंने जब अपनी स्मृति से गीत लिखने प्रारम्भ किए तो बिना उन्हें गुनगुनाये या गाये पाठ आगे चलता ही नहीं था। यह स्थिति उस महिला की है जो स्वयं अपने गाये हुए गीतों के लिखने का प्रयास करती है। उपरोक्त दो उदाहरण इस प्रकार के गीतों की स्मृति के पक्ष पर हमें सोचने के लिए बाध्य करते हैं।

 

धीरे-धीरे वो समय भी आ गया जब टेपरिकॉर्डर हमारे संग्रह का एक मुख्य साधन बन गया। इस साधन ने दो नई स्थितियों को जन्म दिया—पहली, जहाँ गीतों को एक महिला से लिखवाने का प्रयत्न होता था, उसकी जगह महिलाओं के समूह ने ले लिया। महिला-गायक-समूह में गीत ‘उगेरने वाली’ अर्थात उसे संचालित करने वाली एक महिला का चयन समूह स्वयं करता है। उगेरने वाली महिला का मुख्य सांगीतिक कार्य गीत को आधार स्वर प्रदान करना होता है। यह आधार स्वर ऐसा होना चाहिए जो साथ गाने वाली महिलाओं के लिए भी गेय हो। गायन की इस स्थिति के कारणों के विषय में विचार करना सम्भवतया आवश्यक है। दूसरी स्थिति यह बनी कि गीत के पाठ के साथ-साथ उसकी धुन या संगीत रूप भी संग्रह का भाग बन गया। हमारे पास टेपरिकॉर्डर हो जाने के बाद अनेक महिला दलों का हमने ध्वन्यांकन किया। लेकिन एक स्थिति ऐसी बनी कि रेकॉर्डड गीतों के पाठ को लिख लेने का क्रम शिथिल-सा हो गया। लगा कि गीत हमारे पास संरक्षित हैं इन्हें कभी भी सुना जा सकता है। लेकिन जब कभी किन्हीं गीतों को लिखने का प्रयास किया तो गीत के सही स्वरूप को लिपिबद्ध करना सहज नहीं लगा। संगीत की उपस्थिति में अर्थहीन वर्णों एवं शब्दों के पुनरावर्तन की प्रक्रिया, पंक्तियों के दुहराव-तिहराव, टेर या टेर जैसी जरूरतों ने नया ही आयाम प्रदान कर दिया। सांगीतिक धुन ने एक ओर स्वरों की संरचना और दूसरी ओर लय की बद्धता ने गीत की अपनी छान्दसिकता का प्रश्न खड़ा कर दिया। रेकॉर्डड गीतों को लिपिबद्ध करने हेतु कुछ नियमों का निर्धारण करना जरूरी हो गया। गीत के गेय रूप के साथ जो पाठ प्राप्त होता है वो अत्यधिक सधा हुआ और छन्द की दृष्टि से बहुत गुँथा हुआ मिलता है। किन्तु उस में प्रत्येक उच्चारित वर्ण का समायोजन करना आवश्यक हो गया। ऐसी स्थिति के बिना छन्द एवं पद का आधार ही नहीं मिलता।

 

एक बार महिलाओं के होली सम्बन्धी गीतों को रिकॉर्ड करने का तय किया। होली पर गाये जाने वाले महिला गीतों को लूर कहते हैं। गीतों के साथ दो समूह बनाकर स्त्रियाँ नृत्य भी करती हैं। इन गीतों की महत्ता इस बात में थी कि प्रत्येक गीत की सांगीतिक धुन एवं लय रूप तो समान रहता है किन्तु उनका पाठ बदलता जाता है। गीतों के विषय में स्वच्छन्द उल्लास की अभिव्यक्ति होती है। स्त्रियाँ मुक्त अवस्था में होती हैं। अनेक लूरें निश्चय ही अश्लील की सीमा में आती है। इन गीतों के माध्यम से महिलाओं की अपनी विवशताओं के साथ पुरुष के व्यवहारों का उल्लेख भी मौजूद होता है। नये-नये पाठों की सर्जना ऐसे गीतों की पहली आवश्यकता है। इन गीतों की तुलना में हम महिलाओं के एक-एक गीत को देखें तो सभी की संगीतात्मक धुनें भिन्न हैं। लय के नियम भी पृथक-पृथक मिलते हैं। होली के ही अवसर पर पुरुषों द्वारा फाग गाये जाते हैं। फागों की धुन एक ही होती है, पाठ अवश्य बदलता है।

 

दो

 

एक ओर जहाँ विजयदान लोक-गीतों को गाँव में लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहा था, मैं लोक-वाद्यों के अध्ययन में लगा हुआ था। राजस्थान के विभिन्न अञ्चलों से लोक-वाद्यों का संग्रह भी कर रहा था और उनके साथ गाने वाले गीतों को भी रिकॉर्ड कर रहा था। लोक-वाद्यों पर एकछत्र राज्य पुरुषों का मिला। लेकिन धीरे-धीरे यह भी स्पष्ट होने लगा कि अधिकांश लोक-वाद्य पेशेवर गायक जातियों के हाथ में हैं। ये पेशेवर गायक भी अपने जजमानों के घर जनम, परण एवं मरण के सांस्कारिक अवसरों से जुड़े हुए हैं। साथ-ही-साथ उत्सव-त्योहारों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। पेशेवर जातियों में मुख्यतया ढोली, दमामी, नगारची, राणा, लंगा, माँगणियार, ढाढ़ी, जोगी, कामड़, जागा, भाट एवं छोटे-छोटे अनेक समुदाय मिले। बहुत-सी बार गायक जातियों के नाम यही मिलते हैं, किन्तु जजमान विभिन्न जातियों के होते हैं। तदनुसार हमें उन्हें भिन्न जाति का मानना पड़ता है। अधिकांशतया ऐसे एक ही नाम के पृथक समूहों के बीच विवाह सम्बन्ध नहीं होते। इनके अलावा पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाद्यों का प्रयोग करने वाले लोगों में लोक-महाकाव्यों की परम्परा भी मिली। कुछ वाद्य ऐसे भी मिले जो सामान्य लोग अपने उपयोग में ले रहे हैं और उनके साथ भक्ति संगीत यथा वाणी, भजन, हरजस या फकीरी जैसी चीजें गा रहे हैं। भक्ति संगीत में प्रमुखतया मध्ययुगीन संत कवियों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया जा रहा है। इन्हें गाने का प्रमुख अवसर ‘जागरण’ जैसी संस्था में मिलता है। इन जागरणों का अस्तित्व राजस्थान के प्रत्येक गाँव में मिल जाता है, जहाँ मण्डली या संगत के नाम से पाँच-दस लोगों का एक समूह होता है। जहाँ गाँव है—वहाँ मण्डली है। मण्डली के बिना गाँव के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

 

महिलाओं के गीतों की पृष्ठभूमि में लोक-संगीत की अन्य परम्पराओं को समझना एवं विश्लेषित करना एक आवश्यक शर्त माननी चाहिए। पुरुषों के संगीत के साथ वाद्यों का प्रचुर उपयोग है अर्थात् उनकी सांगीतिक अवधारणाओं में वाद्यों का प्रभाव भी निश्चित रूप में मिलता है। यहाँ इस तथ्य का उल्लेख करना आवश्यक है कि अनेक पेशेवर जातियों ने स्वतन्त्रता के बाद अपनी महिलाओं को सार्वजनिक या पारिवारिक रूप में गाने से हटा लिया है। पेशेवर गायक जाति की महिलाओं में जो गा रही थीं और आज भी अनेक गाँवों में गा रही हैं, उनके साथ हमें लय-वाद्यों का प्रयोग मिलता है अर्थात् ढोली, दमामी, नगारची आदि जैसी जातियों में महिलाएँ ढोलक, ढोल एवं कहीं-कहीं नगारे के साथ गाती हैं। हारमोनियम के प्रवेश ने कहीं-कहीं इन महिलाओं के हाथ में यह स्वर वाद्य भी थमा दिया। जहाँ महिलाएँ जागरण अथवा भक्ति संगीत के साथ जुड़ी हैं, वहाँ तन्दूरा (तत् वाद्य) एवं मंजीरा एवं ताल (घन वाद्य) भी उनके हाथ में पहुँचे हैं। एक ओर ऐसी पेशेवर जाति की महिला गायिकाओं के लोक-गीत, सांगीतिक रूप से, सामान्य महिलाओं से भिन्न हैं और दूसरी तरफ स्थिति यह भी है कि पेशेवर गायक जातियों में पुरुष-स्त्री साथ-साथ भी गाते हैं। ऐसी स्थिति में वाद्य-वादन का कार्य पुरुष करते हैं किन्तु लय-वाद्य निश्चित ही महिला के हाथ में रहता है। जो महिला गायिकाएँ संगीत में निष्णात हो जाती हैं, वे अपने गायन में पुरुषों द्वारा स्वर वाद्यों की वाद्य संगत का सहारा भी लेती हैं।

 

राजस्थान के लोक-संगीत की परम्परा में पेशेवर गायक समुदाय के कुछ विशिष्ट वाद्यों के विषय में एक सारणी यहाँ देना समुचित होगा :

 

1. तत् वाद्यों के परिवार से :

वाद्य का नामवादक जाति

कामायचा माँगणियार
प्यालेदार सारंगी माँगणियार
सिंधी सारंगी लंगा
गुजरातण सारंगी लंगा, ढोली, दमामी, नगारची
खम्याच (सारंगी परिवार)  ढाड़ी
जोगिया सारंगी जोगी
पाविया सारंगी पाविया (रंगास्वामी)
रावणहत्था भोपा (नायक) पाबू गाथा हेतु
गूजरी/नारेळी भील
कामरिया सारंगी कामरिया भील
जन्तर गूजर, कुम्हार, बळाई, गायरी 
(बगड़ावत गाथा हेतु)
रवाजरावत-मेहरावत के भाँड
सुरिन्दा सुरणाइया लंगा
अपंग भील एवं भाँबी
भपंग जोगी

 

उपरोक्त तत्-वाद्यों में जन्तर एवं रवाज के अलावा सभी वाद्य गज से बजाये जाते हैं। ये दोनों वाद्य नखली अथवा आघात की छेड़ से अनुरणित किये जाते हैं। सभी वाद्यों का प्रयोग वादक स्वयं अपने गायन की संगत हेतु करते हैं। स्वतन्त्र रूप से उनका शुद्ध वादन करने की परम्परा लगभग नहीं है। कामायचा, प्यालेदार सारंगी, सिंधी सारंगी, खम्याच कुछ उन्नत वाद्य हैं और उनके वादन में संगीत की बहुत कुछ स्वतन्त्र अवधारणा भी मिलती है। राजस्थान में सुरिन्दा का वादन मुख्यतया सुषिर वाद्यों के साथ होता है। शेष लगभग सभी तत्-वाद्य आधार-स्वर, धुन के कुछ प्रमुख स्वर एवं लय प्रदान करने का काम करते हैं। तत्-वाद्यों में चौतारा (बीणा, तन्दूरा) भी आता है किन्तु उसका वादन किसी विशिष्ट जाति से जुड़ा हुआ नहीं है। इस वाद्य में पाँच खुले तार होते हैं और उन्हें पीछे से आघातित करके सा-प के संयोजन से आधार-स्वर प्राप्त किया जाता है। आघात के तरीके में लय रूप भी मिलता है। शास्त्रीय संगीत में यही कार्य श्रुति हेतु तानपुरे से लिया जाता है। लेकिन तानपुरा की छेड़ में लय-रूप का विधान नहीं होता। तत् वाद्यों में यही एक ऐसा वाद्य है, जो महिलाओं द्वारा भी बजाया जाता है।

 

2. सुषिर वाद्यों के परिवार से :

वाद्य का नामवादक जाति

अलगोजा  सामान्य भेड़ पालक या पशु
           पालक जातियों में (दो बाँसुरी)
पावाजोड़ी  पशु पालक/लंगा-माँगणियार (दो बाँसुरी)
पावा डोढ़ा (दो बाँसुरी) पशु पालक/लंगा-माँगणियार
पावरी (दो बाँसुरी)कथौड़िया
रोला (दो बाँसुरी)        भील एवं अन्य आदिवासी
सुरणाई        अनेक पेशेवर जातियाँ—लंगा, माँगणियार, ढोली, नगारची
टोटो                अनेक पेशेवर जातियाँ—लंगा, माँगणियार, ढोली, नगारची
नफीरी        अनेक पेशेवर जातियाँ—लंगा, माँगणियार, ढोली, नगारची
पैली                सामान्य पशु पालक
बाँसली       भील एवं गरासिया
नड़               ऊँट पालक विशेष रूप से एवं मुसलमान फकीर वैत गायन हेतु
बाँकिया        सरगरा, भाट
बरगू               सरगरा, भाट
भंगल        भवाई
करणा       नगारची एवं किलों पर नियुक्त वादक
नागफणी        साधु
शंख                मन्दिरों एवं धार्मिक कार्यों में
सिंघी                नाथ साधु
तुरही                किलों पर नियुक्त गायक जाति
मुरली        लंगा, माँगणियार
पुंगी (बीण)        जोगी
मशक        भैंरू जी के भोपे
तारपौ/तारणीकथौड़िया

 

इन सुषिर वाद्यों को केवल पुरुष वर्ग ही बजाते हैं। उपरोक्त वाद्यों में से कुछ वाद्यों को गायन के साथ भी काम में लिया जाता है। इन में प्रमुखतया अलगोजा (दो बाँसुरी) एवं पैली का वादन पुरुषों के गीतों एवं लोक-गाथा के साथ मिलता है। पावाजोड़ी एवं पावाडोढ़ा का वादन सूफी प्रेम-गाथाओं के साथ मिलता है। नड़ का उपयोग भी वैत गायन के साथ रहता है। मशक का प्रयोग भी गान के साथ जुड़ा है। लेकिन वाद्यों के साथ गायन भी पुरुषों द्वारा किया जाता है। पुंगी या बीण ऐसा सुषिर वाद्य मिलता है जिसके साथ मुख्य रूप से जोगी जाति की महिलाएँ गीत गाती हैं। ऐसे वाद्यों का उपयोग सामान्यतया गीत की धुन बजाने से सम्बन्धित नहीं होता है। आधार-स्वर एवं एक-दो अन्य स्वर एवं लय बताना ही इनका मुख्य प्रयोजन है। वादन में लय का स्वरूप प्रकट करना इनका एक प्रमुख ध्येय होता है। किन्तु पावाजोड़ी, मुरली एवं सुरणाई अधिक सांगीतिक कार्य करते मिलते हैं। इनकी सशक्त स्वतन्त्र वादन परम्परा ने राजस्थान में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है।

 

3. अवनद्ध वाद्यों के परिवार से :
वाद्य का नामगायक-जाति

 

बमसामान्य लोग
दमामानगारची, ढोली, दमामी
धूँसानगारची, ढोली, दमामी
कामटमीणा एवं मेव
कुंडीभील, गरासिया, अन्य आदिवासी
नगाराढोली, दमामी, नगारची
तासामुसलमान वादक
डमरूमदारी
डेरूगोगा के भक्त
ढाकआदिवासी समाज
चंगसामान्य लोग
चंगड़ीभील महिलाएँ
डफसामान्य लोग
घेरामुसलमान वादक
खञ्जरीविभिन्न रूपों में, मुख्यतया घुमक्कड़ जातियों में। महिलाएँ भी बजाती हैं।
ढोलमहिलाएँ भी गायन के साथ बजाती हैं। स्वतन्त्र भी।
ढोलकमहिलाएँ भी बजाती हैं।
नटों की ढोलकनट, बाजीगर
मिरदंगचारणों के रावळिया
पखावजजाहरपीर की गाथा गाने वाले। शास्त्रीय से भिन्न।
मादलआदिवासी समाज।

 

ढोल, ढोलक, खञ्जरी एवं चंगड़ी ऐसे अवनद्ध वाद्य हैं जो महिलाएँ बजाती हुई मिलती हैं। विवाह के अवसर पर अनेक पेशेवर जाति की महिलाएँ ढोल-थाली का वादन करती हैं। महिलाओं के नृत्यों के साथ भी बजाती हैं। इस दौरान एक हाथ में डाका व दूसरी ओर खाली हाथ होता है। किन्तु जब पेशेवर गायक जाति की महिलाएँ गाने के साथ बैठकर गीत गाती हैं जो सुन्दर लयकारियों के साथ ढोलक का वादन कर सकती हैं। अनेक पेशेवर महिला गायिकाएँ ढोलक पर अत्यधिक उपज की लयकारियाँ अदा करती हैं। ऐसी महिलाओं का ढोलक-वादन गेयधुन के साथ लिपट कर विकसित होता है। खञ्जरी का साधारण लय-वादन घुमक्कड़ जाति की महिलाओं में मिल जाता है। गरासिया एवं भील समुदाय में चंगड़ी जैसा वाद्य प्राप्त होता है।

 

इन अवनद्ध वाद्यों की श्रृंखला में हमें महिलाओं के वादन की परम्परा के दर्शन होते हैं।

 

4. घन वाद्यों के परिवार से :

 

इस जाति के वाद्य सामान्य लोगों द्वारा बजाये जाते हैं। पेशेवर जातियाँ भी अपनी आवश्यकतानुसार प्रयोग करती हैं, उस हालत में लयकारी के कार्य में अद्भुत वृद्धि हो जाती है।

घुँघरू               रमझोळ
भैंरूजी के घुँघरू               चौरासी के घुँघरू
डंडिया (स्त्रियाँ भी)               छड़ी
घण्टा                       घण्टी
घड़ियाल               झालर
थाली (लय हेतु) (स्त्रियाँ भी)        थाली (स्वर हेतु) (स्त्रियाँ भी)
कटोरा (लय हेतु)               कटोरा (स्वर हेतु)
चिमटा               ताल (स्त्रियाँ भी)
मँजीरा (स्त्रियाँ भी)       झाँझ
खड़ताल (माँगणियार, लंगों द्वारा)    करताल
जिक्की               लेजिम (गरासियों में प्रचलित)
मोरचंग (जोगी जाति एवंघोरालिया (जोगी जाति एवं
आदिवासी स्त्रियों में       आदिवासी स्त्रियों में
मटकी (लय वादन हेतु) बड़ा मुँहघड़ा (लयवादन हेतु) बहुत छोटे मुँह वाला
वाला घड़ा (फूंक द्वारा)         भरणी
करगच                 चूड़ियाँ (स्त्रियाँ ही)
साँकल (स्त्रियाँ ही)

 

घुँघरू, ताल, मंजीरा, थाळी, कटोरा, मोरचंग, घोरालिया एवं चूड़ियाँ ऐसे घन वाद्य हैं जिन्हें महिलाएँ अपनी सांगीतिक अभिव्यञ्जना में काम लेती हैं। कामड़ जाति की महिलाएँ अपने विभिन्न अंगों पर मंजीरे बाँध कर विशिष्ट रूप से नृत्य करती हैं। ऐसे नृत्य के संयोजन में हमें केवल महिलाएँ ही मिलती हैं। आदिवासी एवं घुमक्कड़ जातियों में मोरचंग एवं घोरालिया का वादन महिलाएँ करती हैं। शेष वाद्य पुरुषों के ही हाथ में प्राप्त होते हैं।

 

एक ओर सांगीतिक ध्वनि के सिद्धान्त के अनुरूप तत्, अवनद्ध, सुषिर एवं घन वाद्य के रूप में वर्गीकरण किया जाता है तो दूसरी ओर संगीत की वस्तुस्थिति के आधार पर उन्हें दो भागों में विभाजित करके भी देखा जा सकता है। एक ओर वे वाद्य हैं जो ‘स्वर’ एवं उसके क्रमिक स्वरूप को अभिव्यक्त करने की क्षमता रखते हैं और दूसरे वे वाद्य जो केवल लयकारी का धर्म निभाते हैं। तत् एवं सुषिर स्वर-वाद्य की श्रेणी में आते हैं जबकि अवनद्ध एवं घन लय-वाद्य माने जाते हैं। किन्तु इस नियम के कहीं-कहीं अपवाद भी मिलते हैं। अपंग और भपंग जैसे वाद्य में तार तो हैं, उन्हें आघातित करके स्वरों को प्राप्त करने की बजाय लय को अभिव्यक्त करने के काम में लिया जाता है। दूसरी ओर मोरचंग और घोरालिया के वादन में लय एवं कतिपय स्वरों का संयोजन भी होता है।

 

हमने देखा कि महिलाओं की परम्परा में स्वर-वाद्यों का मुख्यतया अभाव है। किन्तु कुछ लय-वाद्यों का प्रयोग उनके संगीत में प्राप्त होता है। जिस किसी गायन परम्परा में किसी भी वाद्य का प्रयोग होता है तो निश्चय ही उसकी संगीत रचना में एक वैशिष्ट्य उत्पन्न होगा और उस संगीत में योग्यता एवं कुशलता प्राप्त करने के लिए विशेष प्रयत्न भी करने पड़ेंगे।

 

लेकिन हम जिस विपुल रूप से गाये जाने वाले महिला गीतों की चर्चा कर रहे हैं, उन में किसी प्रकार के ‘वाद्य’ का प्रवेश नहीं है। यहाँ परिवारों की सामान्य महिलाओं का छोटा-बड़ा समूह गाने में प्रवृत्त होता है। चूँकि गीत में गाने की प्रक्रिया निहित है

 

अतः उसके संगीतात्मक स्वरूप को समझना आवश्यक है। इन गीतों में हमें तीन स्थितियाँ मिलती हैं, इन में से दो संगीत से सम्बन्धित हैं और एक भाषा या कविता से जुड़ी हुई है। संगीत की दृष्टि से स्वर एवं लय की दो स्थितियाँ आती हैं और छन्दोमय काव्य की परिस्थिति के कारण भाषा एवं भावों की अभिव्यञ्जना का विश्लेषण आवश्यक हो जाता है।

 

गत वर्षों में भारत के विभिन्न भागों से लोक-गीतों की स्वरलिपि बनाने का कार्य किया गया। स्वर लिपिकारों ने गीत को सरगम के माध्यम से भातखण्डे अथवा विष्णु दिगम्बर की स्वर-लिपि पद्धति के सहारे से लिखा। गेय रूप का यह एक पाठात्मक स्वरूप है। इन गीतों को लय की खड़ी पाइयों की सहायता से बांटा। 6 मात्रा, 7 मात्रा, 8 मात्रा या अधिक मात्राओं के ठेकों के सहारे गीतों की लय का स्वरूप बनाया। इस प्रकार के प्रयास से लोक-गीतों की धुन का पाठात्मक ढाँचा तैयार हुआ। इसके दो उपयोगी पक्ष हमारे सामने हैं। एक ओर इन स्वरलिपियों को पढ़ सकने वाले गायकों की धुनों को गाने व समझने का मौका मिला और दूसरी ओर लोक-गीतों के सांगीतिक विश्लेषण की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई। अनुभव बताता है कि इन स्वरलिपियों के आधार पर गीतों को गाने के प्रयास तो नहीं हो पाये लेकिन गीतों के अंतरंग सांगीतिक स्वरूप को समझने में बहुत सहायता मिली। साथ-ही-साथ हम यह भी नहीं भूल सकते कि आने वाले सौ-दो सौ वर्षों के बाद, हो सकता है कि इतिहास की दृष्टि से यही रूप नई पीढ़ी के पास रह जाए। मुझे इंग्लैंड एवं स्कॉटलैंड के लोक-गीतों के गायकों के साथ इस विषय पर बात करने का मौका मिला। उनके अनुसार लगभग पिछले सौ वर्षों से उनके देश में लोक-गीतों की परम्परा समाप्त-सी हो गई। लोक-वाद्य भी उनका साथ छोड़ गये। औद्योगिक क्रान्ति ने पूरी परम्परा को नष्ट ही कर दिया। तब नये लोक-गायकों के सामने स्वरलिपि में प्राप्त गीतों के माध्यम से ही परम्परा की पहिचान मिली। लोक-गीतों के पाठों का सहारा भी लोक गीतों के संग्रहों से प्राप्त हुआ। उन्हें पूर्वीय यूरोप के लोक-संगीत में प्राप्त लोक वाद्यों का सहारा भी लेना पड़ा। नये सिरे से उन्होंने अपने प्रदेश के लोक-संगीत को पुनः सजाया।

 

आधुनिक काल में टेपरिकॉर्डर एवं ध्वन्यांकन के अनेक स्थायी साधनों ने स्वरलिपि लिखने की आवश्यकता को बहुत कुछ निरर्थक कर दिया। अब तो केवल संगीतात्मक विश्लेषण की दृष्टि से ही उनका महत्त्व शेष रह गया। यह पक्ष कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेकिन जब कार्य का उद्देश्य संगीत की संश्लिष्ट अभिव्यक्ति का विश्लेषण हो गया तो स्वरलिपिकार का दायित्व बहुत बढ़ गया। उन्हें सांगीतिक रचना के तत्त्वों, तथ्यों और नियमों की गहराई में जाना जरूरी हो गया। इस स्थिति पर विचार करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक होगा कि हम स्वरलिपि को किस सीमा तक पहुँचा सकते हैं। भारतीय स्वरलिपि की तुलना यदि पाश्चात्य स्टाफ नोटेशन से करना चाहें तो हमें अनेक अभावों का आभास होने लगेगा। सामान्यतया लोक-गीतों की धुनों को हार्मोनियम या कभी-कभी बाँसुरी पर बजाकर स्वरलिपि तैयार की जाती है। आसान तरीका यही है। लेकिन हमें स्वरलिपि पुनः पढ़ते समय आधार-स्वर अर्थात् पिच का निर्धारण अन्दाज से करना पड़ता है। उसका संकेत हमें स्वरलिपि में प्राप्त नहीं होता। सांगीतिक विश्लेषण करते समय निश्चय ही यह स्थिति अनेक दुविधाएँ उत्पन्न करती है। साथ ही स्वरों के स्वरूप और लय के बँटवारों का आभास भी नहीं मिलता। स्वरलिपि की अवधारणा शास्त्रीय संगीत की स्वरोगत एवं लयगत पुष्ट मान्यताओं के आधार पर होती है, सम्भवतया लोक-संगीत अपनी बारीकियों में दूसरी बात भी कह सकता है। यहाँ ‘लिखित संगीत’ और ‘मौखिक संगीत’ की परम्पराओं का एक दूसरा अभाव उपस्थित हो जाता है। यही स्थिति हमें लय-रूप को प्रकट करने में मिलती है। यह तो निश्चय है कि प्रकृत रूप से लोक-गीत गायन में शास्त्रीय ठेके का शुद्ध रूप नहीं मिलता। खाली, भरी एवं रूप की स्थिति भी नहीं मिलती। लेकिन स्वरलिपिकार निश्चय ही ऐसी स्थिति को उत्पन्न कर देता है। ऐसी स्वरलिपि का अनुकरण करने पर गीत का रूप बहुत कुछ बदल जाता है। यह सभी तथ्य तब महत्त्वपूर्ण होने लगते हैं जब हम लोक-संगीत के वैज्ञानिक विश्लेषण में अग्रसर होते हैं।

 

महिला लोक-संगीत यों तो बहुत सहज, सरल एवं सामान्य-सा दिखने वाला स्वरूप है, जिस में सभी महिलाएँ भागीदार हो सकती हैं। लेकिन उनकी सांगीतिक विशिष्टताओं को समझने का उपक्रम करते हैं तो अनेक सैद्धान्तिक सोपानों से गुजरना पड़ता है। ऐसी स्थितियों के परीक्षण एवं अध्ययन की आवश्यकता पड़ने पर हमें एक ओर संगीत-वाद्यों की समस्या को देखना पड़ता है और दूसरी ओर धुनों के सृजन एवं गायन की प्रक्रिया पर विचार जरूरी हो जाता है। स्वर क्रम या सप्तक की वस्तुस्थिति के सैद्धान्तिक निर्धारण में वाद्यों का ही सहारा लेना पड़ता है। यहाँ स्वर को स्वयं-सिद्ध की तरह स्वीकार करना पड़ता है। अक्षर या वर्ण या किसी भी अर्थवान शब्द (या भाषांग) से परे हटकर स्थिर संगीतात्मक ध्वनि अथवा स्वर का ही महत्त्व रहता है। मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए सा, रे, ग, म जैसी समझ का निर्माण किया। अर्थात् स्वरों को नाम दिये अर्थात् स्वरों की वर्णमाला को स्थापित किया। यही वर्णमाला उत्तरोत्तर संश्लिष्ट संगीत की सृजनहार बनी। यो अक्षर/वर्ण की ध्वनियों का प्रस्फुरण भी कण्ठ में निहित है और स्वरों का निवास भी वहीं है किन्तु संगीत का उद्भव उच्चारित ध्वनि में निहित है और उसकी प्रवृत्ति सामान्य भाषागत स्थिति से भिन्न है। अतः सप्तक के स्वरों को मन्द्र, मध्य, तार या अतितार में समझते हुए भी उसे भाषागत कण्ठधर्म से भित्र ही कण्ठधर्म मानना पड़ता है। इस दृष्टि से जब महिलाओं के गीतों के संगीत को समझना चाहते हैं तो उनके मूल-स्वर या आधार-स्वर की स्थापना सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य बन जाता है। अर्थात् किसी गीत को गाने के लिए महिलाएँ अपने इस मूल-स्वर को किसके सहारे निर्धारित करती हैं। सामान्य गायन में कोई-न-कोई स्वर-वाद्य होता है या श्रुतिवाद्य होता है और उसी पर अपने मन चाहे मूल-स्वर की स्थापना कर ली जाती है। लेकिन सामान्यतया महिलाओं के गीतों के साथ वाद्य तो होता नहीं। ये गीत अधिकतर समूह में गाये जाते हैं। अतः समूह की सभी महिलाओं का मूल-स्वर अथवा षड़ज समान होना अनिवार्य है। यह सम्भव नहीं है कि विभिन्न महिलाओं के मूल-स्वर भिन्न-भिन्न हों। वस्तुतः राजस्थान की महिलाओं के गीतों को गाते समय एक महिला को ‘उगेरने वाली’ के रूप में चिह्नित किया जाता है। गीत को उगेरने वाली महिला ही मूल-स्वर की निर्धारक है। यह महिला एक स्वर-वाद्य की तरह संगीतात्मक स्वरूप का निर्धारण करती है; साथ-ही-साथ गीत के काव्य-पक्ष का नेतृत्व भी करती है। उगेरने वाली महिला का लोक-गीतों के अध्येताओं ने पाठगत स्थिति का आकलन तो किया है किन्तु उसके सांगीतिक नेतृत्व पर दृष्टि नहीं डाली। स्वरलिपि बनाते समय भी उस महिला की पहिचान नहीं मिलती। इस प्रकार से गाये जाने वाले गीतों की स्वरलिपि में प्रत्येक गीत के मूल-स्वर को सम्भवतया देखना आवश्यक है। क्यूँकि गीत की धुन के अनुरूप यह स्वर विभिन्नता लिये हुए हो सकता है अर्थात् उसका ‘सा’ तुलनात्मक दृष्टि से भिन्न हो सकता है। उसी प्रकार गाने वाले समूह की गा सकने की क्षमता पर भी उसे निर्भर होना पड़ेगा। वयोवृद्ध महिलाएँ हैं तो मूल स्वर को नीचा होना पड़ेगा कि यदि नवयुवतियाँ गा रही हैं तो वह ऊँचा हो सकता है। स्वर स्थापना के लिए यह भी जरूरी होगा कि धुन में ऊँचा-से-ऊँचा स्वर कहाँ पहुँच रहा है और उस तक पहुँचने की क्षमता सभी में है। हमने अपने हार्मोनियम की सुविधा के कारण एक मानक षड़ज की परिकल्पना बना ली है। लेकिन भारतीय संगीत के इतिहास में सप्तक के इस मानक रूप की स्वीकृति गत एक-डेढ़ शताब्दी से ही बनी है। मैं संगीत सम्बन्धी इन छोटी समस्याओं की ओर इशारा मात्र कर रहा हूँ क्योंकि ज्यों-ज्यों संगीत की विभिन्न जटिलताओं में पहुँचते जाएँगे त्यों-त्यों हमें स्वरागत समस्याओं से जूँझना पड़ेगा। सब कुछ होते हुए स्वरागत वर्णमाला से सम्बन्धी श्रुतियों की वस्तुस्थिति को किसी-न-किसी रूप में संभालना होता है। मूर्च्छनाओं सम्बन्धी तथ्यों का सहारा लिये बिना लोक-संगीत को समझना सम्भवतया अत्यन्त दुश्वार है।

 

वे लोकगीत जो सामान्य महिलाओं द्वारा गाये जाते हैं (बिना किसी वाद्य की संगत के), उनके लिए सभी स्वर लिपिकारों ने कहा है कि चार-पाँच स्वरों के बीच इन गीतों का संचरण होता है। लेकिन स्वरलिपियों के विश्लेषण से यह अवश्य पता लगता है कि इन चार-पाँच स्वरों में एक स्वर या दो स्वर हमें मंद्र सप्तक के मिलते हैं। अतः चार-पाँच स्वरों की गणना के साथ हमें दो सप्तकों की वस्तुस्थिति को भी अपने सामने रखना पड़ेगा। इन्हीं गीतों के माध्यम से यह भी स्पष्ट होता है कि इन में सप्तक के पूर्वांग का आभास मिलता है। क्या इसका अर्थ यह नहीं होगा कि पूर्वांग में ही उतरांग की श्रुतियों या स्वरों के अन्तराल के स्वरूप भी मौजूद हैं? यह उतरांग का स्वरूप भले ही गाया नहीं जा रहा है किन्तु उसका रूप संगीत की इसी परिकल्पना में निहित है। हमें इस समस्या का आभास नड़ जैसे सुषिर वाद्य में मिलता है। नड़ एक अन्तिम छोर से बजाये जाने वाला वाद्य है, उस में केवल चार छेद होते हैं किन्तु फूँक के वेग की भिन्न स्थितियों से उस में पूर्ण सप्तक का वादन सम्भव है और बजाया जा रहा है। यह स्थिति हमें उन सुषिर वाद्यों में नहीं मिलती जिन में पाँच छेद होते हैं। पुनः छह छेद वाले वाद्यों में पूर्ण सप्तक मिल जाता है। अर्थात् सांगीतिक रूप से सप्तक को पूर्वांग-उत्तरांग रूप में प्रयोग होना, वाद्य के माध्यम से स्थापित होता है। लगता है कि लोक-संगीत की चिन्तन-धारा पूर्वांग-उत्तरांग जैसी सैद्धान्तिक स्थिति को किसी-न-किसी रूप में अंगीकार करती है, चाहे वो उसे संगीत के व्याकरणगत नियमों में अभिव्यक्त नहीं भी कर सके।

 

इस प्रकार के लोकगीतों के पाठ की स्थिति के आधार पर धुनों में तीन प्रकार की प्रक्रियाएँ मिलती हैं। गीत में एक पंक्ति की जो धुन है, वही आने वाली प्रत्येक पंक्ति की धुन है। कभी-कभी यह धुन दो पंक्तियों में भी मिलती है। अगली आने वाली दो-दो पंक्तियों का छन्द एवं धुन भी समान रूप से चलेगा। तीसरी स्थिति में हमें एक पूरा पद (स्टेंजा) एक धुन में मिलेगा और आने वाले सभी पद उसी धुन में गाये जाएँगे। पद की धुन वाले गीतों में अनिवार्यतः हमें टेर (रेक्रेन) मिलेगी। किन्तु यह रेफ्रेन कभी भी एक पूरा पद ही होगा एक पंक्ति नहीं। जो गीत एक पंक्ति या दो पंक्तियों में चलते हैं, उन में भी टेर होगी किन्तु वो उसी धुन में गाई जाएगी। जहाँ तक केवल पाठ का प्रश्न है, टेर हम उसे कहेंगे जो बार-बार निश्चित स्थान पर समान शब्द क्रम के साथ पुनरावर्तित होती है। संगीत की दृष्टि से शब्दक्रम के साथ उसकी पुनरावर्तित धुन की स्थिति भी बन जाती है। गीतों के सांगीतिक विश्लेषण के समय पाठ एवं धुन की इन प्रवृत्तियों की पहिचान आवश्यक बन जाती है। अधिकांश स्वरलिपिकारों ने टेर एवं पद की ऐसी स्थितियों में स्थाई एवं अन्तरे का उल्लेख किया है। लेकिन यह सही स्थिति नहीं है। शास्त्रीय-संगीत की रचनाओं में स्थाई का संगीतगत प्रयोग मन्द्र-मध्य सप्तक में होता है जबकि अन्तरा मध्य से तार तक जाता है। अपवाद रूप में ही हमें महिलाओं के गीतों जैसी रचनाएँ प्राप्त हो सकती हैं। यह लोक-गीतों की प्रवृत्ति नहीं है। लोक-गीतों की ऐसी संरचना के कारण ही अनेकानेक नये गीतों को निरन्तरता एवं प्रचुरता मिलती है। एक धुन की प्रस्थापना हो जाने के बाद गीत का आकार पंक्तियों के माध्यम से निर्मित होता चलता है। अतः लोकगीतों का पाठात्मक या भाषागत रूप संगीत से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बन जाता है। गीत में रुचि बनी रहने का कारण सांगीतिक उपज व लयकारी की विभिन्नता नहीं होकर, पाठ का विकासात्मक रूप बन जाता है। भाषा के माध्यम से सृजित बिम्ब अनुपाततः सबल रूप ग्रहण कर लेते हैं। साधारण-से-साधारण धुन ही लोकगीत के कलेवर के सृजन की प्रक्रिया को प्रस्तुत करती है।

 

महिला गीतों के सांगीतिक पक्ष पर एक तथ्य की ओर इंगित करना चाहता हूँ। सामान्यतया ये गीत अकेली महिला द्वारा नहीं गाये जाते—एक समूह गाता है। चार-पाँच या इससे अधिक गायिकाएँ एक साथ गाती हैं। लेकिन ये सभी महिलाएँ गाते समय गीत की धुन में एक ही जगह स्वाँस नहीं लेतीं। इसीलिए यदि एक महिला को ही गाने के लिए कहें तो वह धुन को सही-सही नहीं गा पाती। उसका स्वाँस टूटता रहता है। लेकिन समूह में गाते समय इस तरह के स्वतन्त्र व्यवहार का आभास नहीं होता। क्योंकि कोई-न-कोई उस समय गीत को गा रही होती है। आज हम जिन सामूहिक गीतों को कोरस कहते हैं, उन में स्वाँस के नियम धुन में ही निहित होते हैं। आप भारत के राष्ट्रगीत को गुनगुना कर देखें और स्वाँस की प्रक्रिया पर ध्यान दें तो यह स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता (स्वाँस) और आगे आने वाली पंक्तियों में स्वाँस का सुनिश्चित बँटवारा मिलेगा जो सभी गायकों के लिए आवश्यक होंगे। ठीक यही नियम महिलाओं के गीतों में नहीं मिलता। लेकिन एक स्थिति अवश्य मिलती है कि महिला गीतों में जहाँ भी किसी स्वर या लय वाद्य का उपयोग हो रहा है तो धुन में स्वाँस के नियम को एक निश्चित स्थिति मिल गई है। सम्भव है कि विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों के गीतों में ऐसी अनेक प्रवृत्तियाँ मिलें। उनकी पहिचान होना बहुत आवश्यक लगता है। पठन-पाठन या सम्भाषण में भी स्वाँस लेने की स्थिति, अभिव्यक्ति की स्पष्टता के लिए अनिवार्य है। नाटकों में जहाँ संवादों को रटना आवश्यक होता है, उसकी अदायगी में कहाँ-कहाँ स्वाँस लिया जाय—यह अनिवार्य रूप से सिखाया जाता है। जहाँ छन्दोगत काव्यात्मक स्थिति है वहाँ तो स्पष्ट ही ऐसे तथ्यों को सहज रूप से स्वीकार करना पड़ता है। यदि हम अपने पारम्परिक छन्दों के पाठ के नियमों को विश्लेषक की दृष्टि से देखें तो स्वाँस के नियम महत्त्वपूर्ण दिखाई देने लगेंगे। पद की विभिन्न पंक्तियों को, यति नियमों के माध्यम से, उच्चारित करने पर ‘विश्राम’ की उपस्थिति अपने-आप मिल जाएगी। आधुनिक कविताओं ने पारम्परिक छन्दों से मुक्ति पाई किन्तु उन्हें पढ़ने की विधा ने स्वाँसों के महत्त्व को बहुत बढ़ा दिया। यह छन्द संकेत की नई दशा और दिशा है। लोक-गीतों की रचना और सृजन की स्थिति की पृष्ठभूमि में सभी सहज किन्तु स्पष्ट सिद्धान्त पूर्णतया उपयोग में आते हैं। इन मूल तथ्यों के अनेकानेक अन्तर्सम्बन्धों के कारण लोक-संगीत में अपार वैभित्र्य उत्पन्न होना सहज सम्भाव्य है।

 

लोक-गीतों के संगीत पक्ष के साथ उसके पाठ की संरचना के तत्त्वों की खोजबीन आवश्यक है। गीत के पाठ एवं काव्यगत विषय या अविछेद्य सम्बन्ध पूर्णतया गाने के अवसर पर अवलम्बित है। महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले गीतों के सम्बन्ध जनम, परण, मरण जैसे पारिवारिक अनुष्ठानों से जुड़े होते हैं और त्योहार-उत्सवों या मेलों के दौरान गाये जाते हैं। उत्सव-त्योहार का कालचक्र वर्ष एवं ऋतुओं से जुड़ा होता है। अतः ऐसे गीतों के सृजन में पारिवारिक नातेदारी, रिश्तेदारी के साथ-साथ सामाजिक क्रियाकलापों, विश्वासों एवं आस्थाओं से सम्बन्धी विषयों की श्रृंखला बनती है। इन सभी विषयों के विभिन्न पहलुओं को देखने का प्रयास करते हैं तो मानवीय जीवन के यथार्थ और अयथार्थ सभी संवेदनात्मक तथ्य उन में समाहित मिलते हैं।

 

उदाहरण के लिए ‘जनम’ जैसी एक स्थिति को समझने का उपक्रम करें। यह भूल जाएँ कि गीतों के माध्यम से क्या और कौन-से विषय प्राप्य हैं। शिशु जनम के मूल में दाम्पत्य रिश्ता पहली शर्त है। यहाँ एक ओर पति-पत्नी का सम्बन्ध है और ठीक वहीं माँ-बाप का रिश्ता भी है। गर्भधारण, गर्भकाल और शिशु-जन्म शारीरिक प्रक्रिया है। इसी काल में माँ के रूप में विभिन्न मानसिक उद्वेलन भी है। प्रारम्भिक दो-तीन महीनों में उल्टियाँ, कुछ विशिष्ट खाने की इच्छाएँ अनिच्छाएँ, गर्भ में पलते शिशु के लिए कुछ करने-न-करने की स्थितियाँ, जन्म देते समय दाई या ऐसी ही सहायता, जन्म के बाद माँ के खाने-पीने की मान्यताओं के अनुसार व्यवस्थाएँ और माँ व शिशु के रख-रखाव की चिन्ताएँ प्रमुख हैं। शरीर के बाद परिवार में सम्पन्न होने वाले वे कार्य जो सामान्यतया छोटे-बड़े अनुष्ठानों के माध्यम से मनाये जाते हैं। राजस्थान में छठे-सातवें महीने में ‘साथ पुराना’ एक महत्त्वपूर्ण अवसर आता है। जन्म के साथ माँ और शिशु की देख-रेख से सम्बन्धी अनेकों काम निपटाने होते हैं, जनम-घूंटी देना, बच्चे को नहलाना, मालिश करना, आटे के लोये से शरीर को मलना, एक तरफ होता है और दूसरी तरफ माँ के लिए सिर गूँथना, (घी, जायफल इत्यादि से), जापे के खाने की वस्तुओं में अजमा, लोद, जीरा, हल्दी, गूँद, सूँठ जैसे मसालों के साथ-साथ सुपारी, खाँड और घी या विशिष्ट तेलों की विपुल मात्रा का प्रयोग करना होता है। माथा नावण या सूरज पूजा के दिन पहली बार माँ-शिशु को आनुष्ठानिक रूप से बाहर लाना होता है। कुछ नियम ओढ़ने के रंग को लेकर होते हैं, माँडने चित्रित किये जाते हैं, नणद द्वारा माँ एवं शिशु की आरती उतारी जाती है। माँ के मेंहदी लगाई जाती है। परिवार के सदस्यों द्वारा बच्चे को रुपये, आभूषण, वस्त्र दिये जाते हैं। शिशु के पहिले ही वर्ष में झडूला होता है। परिवार में यदि कोई विवाह हो तो झडूले के लिए उचित अवसर माना जाता है। देवी-देवता के स्थान पर यात्रा की जा सकती है। पहिले साल नहीं हो पाये तो झडूला तीसरे वर्ष भी हो सकता है। झडूले का रातीजगा होता है। रातभर देवी-देवताओं के गीत गाये जाते हैं। ब्राह्मण द्वारा जन्म-पत्री बनाने का काम, जन्म-नाम, बोलता नाम और नजर से बचने के कितने उपाय किये जाते हैं। शिशु की आँखों में काजल, गाल पर काजल की टीकी, हाथों में काली चीढ़ों एवं मोती या सोने के दाने का नजरिया पहिनाया जाता है। जन्म से सम्बन्धित मुझे जो याद आता गया, उसे लिखता गया। लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि यह विवरण पूरा नहीं है। सैकड़ों छोटी-मोटी बातें इस में शेष रह गई हैं। और इससे भी अधिक महत्त्व की बात यह है कि विभिन्न जातियों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न नगरों एवं गाँवों में अपनी-अपनी मान्यताओं के अन्तर भी हैं। इन कार्यों की श्रृंखला में गरीब-अमीर और ऊँची-नीची जातियों के क्रियाकलापों में भी भेद है। ऐसी सभी स्थितियों का आकलन करने के बाद सम्भव हो सकता है कि हम एक तात्विक विवेचन प्रस्तुत कर सकें।

 

पुत्र एवं पुत्री के जन्म को लेकर पारिवारिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। यह जो बदलाव आता है वो हमें एक नवीन समस्या के सामने खड़ा कर देता है। प्रत्येक जन्म अपने साथ अनेक कानूनों से जुड़ी व्यवस्थाओं में उलझा देता है।

 

चल-अचल सम्पत्ति के वारिसों का क्या होगा, पुत्र-पुत्री किस तरह पाँती (जायदाद के बँटवारे) या हाँती (पुत्री को हाथ से दी जाने वाली वस्तुएँ) के हकदार होंगे। छोटे-से-छोट पुत्र एवं पुत्री के अधिकारों का क्रम प्रारम्भ हो जाता है। जन्म जैसे एक सत्य के साथ नातेदारी एवं रिश्तेदारी के कर्तव्यों की एक लम्बी सूची बन जाती है।

 

इस तरह जन्म जैसी सहज, सामान्य एवं साधारण दिखने वाली प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में अत्यन्त जटिल एवं संश्लिष्ट पारिवारिक रिश्तों-नातों, सामाजिक-आर्थिक कार्य-व्यापारों और अनुष्ठानों का संयोग बन जाता है। जन्म से सम्बन्धित इस प्रकार वर्णित एवं अवर्णित वस्तुस्थितियों से समाज का प्रत्येक परिवार भली-भाँति परिचित है और यह अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि कहाँ, क्या, कब, कैसे और किन कार्यों, साधनों एवं उपकरणों के सहारे किया जाना है। यह भी सत्य है कि महिलाओं को निश्चय ही महीन-से-महीन तत्त्वों एवं तथ्यों की जानकारी होती है। यही जानकारी जन्मगीतों की रचना में पहली भूमिका निभाती है।

 

लोक-गीतों के पाठ की रचना में उपरोक्त अनेकानेक तत्त्वों का प्रतीकात्मक प्रयोग निहित होता है। अवसर के अनुकूल कहीं आभूषण, कहीं वस्त्र, कहीं अनुष्ठानात्मक क्रिया-कलाप, कहीं रिश्तेदारी, कहीं नातेदारी, कहीं माँ, बाप, बहिन, बूवा, फूफा, दादा, दादी, नानी, कहीं पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, कहीं मेहँदी, धूप, दीप, कहीं देवी-देवता, कहीं दूध, दही, मक्खन, घी, कहीं घेवर, जलेबी, मालपुआ, लड्डू, कहीं इमली, केरी, नींबू, कहीं अजमा, सुँठ, जीरा, हल्दी, कहीं शुभाशुभ, सगुन और कहीं कार्य-कारण से उत्पन्न सम-विषम परिस्थितियाँ, कहीं घर, महल, झोंपड़ी, कहीं बधाई, तिलक, टीका और इसी तरह अवसर विशेष से जुड़े तथ्यों की क्रियाओं का सहज प्रयोग होता चलता है। एक गीत के विश्लेषण में कोई-न-कोई, एक या उससे अधिक विशिष्ट प्रवृत्ति या प्रवृत्तियाँ अवश्य मिल जाएँगी और ऐसी संख्यातीत प्रवृत्तियाँ हैं और हो सकती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी प्रवृत्तियाँ गहन एवं संश्लिष्ट परम्परा में स्वाँस की भाँति घुली-मिली हों। ऐसी आत्मसात परिस्थिति में गीतों की देह को प्रतीकात्मक एवं विवरणात्मक काव्यमय स्वरूप प्राप्त होता है।

 

महिलाओं के लोक-गीतों के इन्हीं संरचनागत तत्त्वों का पुष्टिकरण यों भी होता है कि सामान्यतया इन गीतों के पाठ को कभी कोई महिला कण्ठस्थ नहीं करती। किसी कविता को यदि कण्ठस्थ किया जाएगा तो उसका रूप, बहुत कुछ स्थिर हो जाएगा। शास्त्रीय या लिखित साहित्य की कविता है तो उस में किसी शब्द, शब्द के क्रम, उस में निहित यति एवं विश्राम को परिवर्तित नहीं किया जाएगा। यदि ऐसा कुछ हुआ है तो वह स्वीकार्य नहीं माना जाएगा। जयशंकर प्रसाद या सुमित्रानन्दन पंत या निराला की कविता को यदि पाठ करने का प्रयास करते हैं तो उसका कण्ठस्थ रूप शुद्धतम होना चाहिए। पंक्तियों एवं पद का क्रम भी ठीक मूल की भाँति ही रहना चाहिए। फिर कण्ठस्थ करने की अपनी ही क्रिया है। उसे बार-बार पढ़ना और बार-बार बोलकर या गुनगुनाकर याद करना आवश्यक है। यह भी एक सत्य है कि बहुत से लोगों को चीजें सहज ही कण्ठस्थ हो जाती हैं और बहुत से लोग कभी पूरी कविता याद ही नहीं कर सकते। आधुनिक शिक्षा की परीक्षा प्रणाली में इस तरह से याद कर लेना, एक गुण बन गया है। लोक-गीतों को कण्ठस्थ करने की स्थिति कभी नहीं मिलती। इसका परिणाम यह होता है कि एक समूह से एक ही गीत को दो-तीन घण्टे या चार-पाँच दिन के अन्तराल से ध्वन्यांकित करें तो पंक्तियों का क्रम बदला मिलेगा, कुछ नई पंक्तियाँ जुड़ जाएँगी, कुछ पंक्तियाँ पूरी तरह छूट जाएँगी। महिलाओं के गीतों में हमें प्रारम्भ, मध्य और अन्त जैसी वस्तुस्थिति प्रायः नहीं मिलती। ऐसी हालत में गीत की रचना का स्वरूप विशिष्ट सम्पन्न होने वाले कार्यों एवं विचारों के सहारे विकसित हो जाता है। लेकिन इस स्थिति में लोक-गीतों की रूढ़ियाँ एवं अभिप्राय विभिन्न फॉर्मूलों के रूप में गायिकाओं के स्मृति-कोश की भाँति उपस्थित हो जाते हैं। लगता है कि बोलचाल की भाषा (कथ्य रूप) के नियमों का परिपालन गीतों के पाठ की रचना में ज्यों-का-त्यों मौजूद है। विशिष्ट समुदाय अपनी मातृभाषा के व्याकरण एवं उसके नियम-कायदों को जाने बिना भी अपने-आपको सार्थक रूप से व्यक्त कर सकता है—ठीक उसी भाँति लोक-गीत के रचना-विधान की प्रक्रिया मिलती है। जिस प्रकार किसी भी भाषा को जानने का यह अर्थ नहीं होता कि उसके सम्पूर्ण शब्द भण्डार को कण्ठस्थ किया जाय, लेकिन इतना तो होता ही है कि स्मृतिकोश में शब्दों के समूह का अंकन होता है और उस कोश से अपनी अभिव्यक्ति की आवश्यकतानुसार व्याकरणगत नियमों का पालन करते हुए, सार्थक वाणी के रूप में प्रस्तुत हो सके। नियमबद्धता ही सम्प्रेषण की शक्ति का स्रोत है। बोलचाल की भाषा के शब्दों का स्थान लोक-गीतों में विभिन्न विषय एवं उनके प्रतीकात्मक बिम्ब ले लेते हैं।

 

सामूहिक लोक-गीतों की संरचना में, भाषा के माध्यम से एक अवलोकनीय चित्र बनता चलता है। उसका व्यक्त रूप मानो एक दृश्य को प्रस्तुत कर रहा है। उस में अमूर्त भावाभिव्यञ्जना का स्वरूप नहीं मिलता। एक विवाह सम्बन्धी गीत में विरहिणी भविष्यवेत्ता से जानना चाहती है कि उसके प्रियतम कब तक आ जाएँगे। भविष्यवेत्ता का उत्तर है कि वो जो सामने पीपल का पेड़ है, उसके पत्तों को गिन लो, उतने ही दिन बाद तुम्हारे प्रियतम आ जाएँगे। यह कथोपकथन एक चित्र की भाँति है। लोक-गीतों में मानसिक उद्वेलन, मनोवैज्ञानिक विवेक, और अमूर्त भावों के ऊहापोह का समावेश नहीं होता। ये गुण वस्तुतः उन कविताओं के हैं जो एक व्यक्ति की भावना-प्रवण कल्पना- शीलता से उपजते हैं। किसी-न-किसी रूप में काव्य व्यक्तिसापेक्ष है और उस में उत्तम पुरुष (व्याकरण) का अस्तित्व निरन्तर झाँकता रहता है। ऐसी कविता की रचना के लिए विशिष्ट कलात्मक कौशल को प्राप्त करना पड़ता है। व्यक्तिसापेक्ष के साथ-साथ वैयक्तिक अनुभूति एवं कल्पनाशील संवेदना से कविता अपना रूप लेती है। महिलाओं के गीतों में वैयक्तिकता का आभास नहीं मिलता। गीतों की उक्तियों में चित्रात्मकता या विवरणात्मकता का प्रामुख्य रहता है और वह भी सामूहिक या साधारणीकृत अनुभवों का सांवेगिक रूप होता है। इस प्रकार की काव्य-सर्जना में कहीं-न-कहीं हमें ‘व्यक्ति’ भी मिल सकता है अर्थात् विशिष्ट गीत को किसी विशिष्ट सदस्य ने सृजित किया हो लेकिन उसकी अनुभूति का आधार सामूहिकता में निहित होता है। घुमक्कड़ जातियों में अधिकांश गीत उनके समूह की विशिष्ट महिला द्वारा रचित होता है लेकिन वो शीघ्र ही पूरे समाज के कण्ठ में पहुँच जाता है। धीरे-धीरे वो गीत ज्ञात रचनाकार को भुला देता है और अज्ञात रचयिता की चीज बन जाता है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए, अनेक महिलाओं की अभिव्यक्तियाँ भी उस में प्रविष्ट हो जाती हैं। यह प्रवृत्ति परिवर्तन के आधार पर व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर हो जाती है।

 

गीत को जब कण्ठस्थ नहीं किया जाता है तो यह कैसे सम्भव है कि एक समूह किसी गीत को गा सके। गीत की अगली पंक्तियाँ कैसे अपना रूप ग्रहण करेंगी? इससे सम्बन्धित कोई व्यवस्था गीत के अन्दर ही मौजूद होनी चाहिए। वैसी व्यवस्था के अभाव में गीत कभी भी सामूहिकता का निभाव नहीं कर सकता। इस तथ्य को समझने के लिए पहली आवश्यकता है कि गाने वाला समूह विशिष्ट परम्पराओं, मान्यताओं, विश्वासों, रीति-रिवाजों, सामाजिक नियमों, संस्कारों, मातृभाषा और बहुतकर एक क्षेत्र से जुड़ा हो। निश्चय ही विभिन्न समाजों, जातियों और क्षेत्रों में गीतों की समानता ही अधिक जगह मिल सकती है। लेकिन जब एक ही गीत के अन्तरंग-संघटक तत्त्वों को पहिचानने का प्रयत्न करें तो यह स्पष्ट होने लगता है कि प्रत्येक गीत में एक ‘संकेतात्मक’ शब्द या स्थिति है जो आने वाली पंक्ति का निर्देश देती है। ये संकेत ‘स्मृति’ को उद्वेलित करते हैं। स्मृति को जागृत करने के अनेकानेक मनोवैज्ञानिक अथवा मानसिक संकेत मनुष्य की विशिष्ट सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक उपलब्धि है। इस अमूर्त मानवीय व्यवहार के परिणाम-स्वरूप गीतों को अपना अकण्ठस्थ स्वरूप मिलता है। जहाँ एक पाठ का शिथिल अस्तित्व भी है और फार्मूला-बद्ध एक घटक भी है। उसका एक सामान्य उदाहरण देना उचित होगा। विजयदान ने जिन गीतों का संकलन किया (डिक्टेशन की पद्धति से), उसकी हस्तलिखित प्रति को कहीं से खोलने पर जो गीत मिला, वो कुछ इस प्रकार का है:

 

चांदा थारै चांनणै
रमिया सगळी रात
रम खेल घरै सांचरिया

 

कोई पोळिया पोळ उघाड़
पोळियां सूता बाई पांवणा
चढ़ चौबारां आव

 

चढ़तां तिड़कियौ चूड़लौ
उत्तरतां तूटौ नवसर हार
मोती गमिया मूंगिया
लाल गमी लख च्यार

 

कुणजी दिवलौ संजोवियौ
कुणजी हेर्‌यौ नवसर हार
भाभी दिवलौ संजोवियौ
वीरौसा हेर्‌यौ नवसर हार

 

काकीजी दिवलौ संजोवियौ
काकौसा हेर्‌यौ नवसर हार
चित्त बिन सोध्यौ नवसर हार

 

माताजी दिवलौ संजोवियौ
वाभौसा हेर्‌यौ नवसर हार
मन कर दिवलौ संजोवियौ
चित्त कर हेर्‌यौ नवसर हार

 

मोती लाधा मूंगिया
लालां लाधी लख च्यार

 

इस गीत में एक चित्र है चाँदनी रात में मन भर खेलने गई तो गहरी रात को लौटी। घर के दरवाजे को खोलने के लिए कहा तो उत्तर मिला, दरवाजे के पास ही मेहमान सोये हुए हैं। तुम पिछवाड़े की दीवार को लांघ कर आ जाओ। दीवार पर चढ़ने के लिए हाथों को फैलाया तो चूड़ियाँ तड़क गईं और कूदकर नीचे उतरी तो नवसर हार बिखर गया। मूंगिया मोती बिखर गये, चार लाख की लालें छितर गई। उसी समय खोज शुरू हुई। भावज ने दीपक जलाया और भाई ने नवसर हार को ढूँढ़ने का प्रयत्न किया। काकी ने दीपक जलाया और काका ने हार को ढूँढ़ना चाहा। लेकिन वो कैसे ढूँढ़ते, मन के उपरान्त दीपक जलाया था, बिना चित्त के नवसर हार को ढूँढ़ रहे थे। अन्त में माता ने दीपक जलाया, पिताजी ने हार ढूँढ़ा। मन लगाकर माँ ने ढूँढ़ा, पिता ने ढूँढ़ा तो मूँगिया मोती मिल गये। चार लाख की लालें मिल गईं।

 

इस गीत के स्मृति संकेतों में रमिया, रम-खेल; पोळ-पोळिया, चढ़ना-उतरना, मोती, लाल, दीपक संजोना-हेरना (ढूँढ़ना) भाभी-भाई, काकी-काका, माता-पिता और दूसरे रिश्तेदारों के नाम के साथ गीत और कितना ही बढ़ सकता है। लेकिन हर हालत में खोई चीज को पाने का श्रेय माँ-बाप को ही मिलेगा। अन्य सभी रिश्तेदार ‘चित्त लगाये बिना’ ढूँढ़ने का नाटक करेंगे। भावनात्मक अर्थ में परिवार के रिश्तों का विवेचन भी किया जा सकता है किन्तु हमें गीतों के पाठ की संरचना के उन तत्त्वों को समझना है जो महिलाओं की इस प्रकार की व्यञ्जना के रूप को प्रकट करते हैं। यह बात अनेक गीतों के लिए कही जा सकती है लेकिन जहाँ भी पाठ को याद रखने की स्थिति आएगी—वहाँ स्मृति का एक अन्य रूप प्रस्तुत होगा।

 

उपरोक्त गीत को उद्धरित करते समय टेर की पंक्ति को हटा लिया था। टेर थी— डोर हीर रौ रे लाल। इस टेर के पुनः पुनः गायन से जहाँ पद की पूर्णता मिल जाती है, वहीं गीत के नये बन्द की तैयारी का अवकाश भी मिल जाता है। इसकी संगीतात्मक धुन एक ही पंक्ति के रूप में चलती है। अतः अन्य पंक्तियों के पुनर्कथन से भी धुन एवं लय का निभाव बना रहता है। यदि इसी गीत को पदों में विभक्त करें अर्थात् जहाँ एक बात पूर्ण हो जाती है तो हम देखेंगे कि चार-चार पंक्तियों का एक पद बनना चाहिए। लेकिन यहाँ गीत में कहीं तीन, कहीं चार और कहीं पाँच पंक्तियाँ मिल रही हैं। इनको एक रूप मिलता है—टेर की पंक्ति से या किसी भी पंक्ति के पुनरावर्तन से।

 

गीत के पाठ का बन्धेज इसकी लयपूर्ण धुन में निहित है। एक पंक्ति के भावपूर्ण कथन को उसी धुन के ‘काल विभाग’ में पिरोया जाना है—इसीलिए उस में सुनिश्चित छान्दसिकता का सृजन आवश्यक है। शब्दों के कम ज्यादा हो जाने पर ‘निरर्थक’ वर्णों, शब्दों, ध्वनियों के अलावा पर्यायवाची शब्द, जोड़े जा सकते हैं। इस कार्य के लिए ‘लय की बाँट’ का आधार लेना पड़ता है। गीत की ऐसी प्रवृत्तियों के कारण गीतों का लिखित रूप में विशिष्ट पैटर्न कभी-कभी ही मिलता है। पंक्तियाँ लम्बी-छोटी दिखने लगती हैं—लेकिन गेय रूप को सुनकर लिखने में यह व्याघात नहीं लगता। यहाँ निरर्थक वर्षों एवं शब्दों का उपयोग सांगीतिक आवश्यकता बन जाते हैं।

 

महिलाओं द्वारा पारम्परिक रूप से गाये जाने वाले गीतों की रचना महिलाओं द्वारा ही की जाती है। यह कभी नहीं होता कि पुरुषों ने गीत रचा हो और उसे महिलाएँ गा रही हों। इसका सहज अर्थ यह भी है कि इन गीतों के माध्यम से महिलाओं में विचारों, भावनाओं, आस्थाओं, विश्वासों एवं मान्यताओं का वृहत पुञ्ज हमें मिल जाता है। यों लिखित परम्परा के इतिहास में महिलाओं द्वारा सृजित साहित्य का नितान्त अभाव है। गत दो शताब्दियों में हमें महिला-साहित्य अवश्य प्राप्त होने लगा है लेकिन लोक-गीत एवं लोक-कथा, सम्भवतया एक ऐसा अद्भुत स्रोत है जहाँ महिलाओं ने स्वयं को व्यक्त करने का प्रयत्न किया है और जीवन के अनेकानेक पक्षों पर अपनी भाषाभिव्यक्ति के माध्यम से बहुत कुछ कहने का प्रयास किया है। लेकिन यहाँ एक नई समस्या ने भी दस्तक दी है। यह स्थिति तो स्पष्ट है कि महिलाएँ भाषा के सहारे अपने दैनिक क्रिया-कलापों और विचारों के आदान-प्रदान हेतु भाषा का प्रयोग करती हैं। भाषा की इस पहिचान के कारण उन में यह क्षमता तो आ सकती है कि कविता के रूप में स्वयं को व्यक्त करे। लेकिन धुन की रचना के लिए जिन सांगीतिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है या हो सकती है, उस ज्ञान या उसकी समझ का क्या और कौन-सा आधार है? सैकड़ों की संख्या में गाये जाने वाले गीत (लूर) ही इस प्रवृत्ति के मिलते हैं, जिन में धुन तो एक ही है और पाठ बदल जाता है। इनके अलावा एक ही धुन पर हमें दो गीत प्राप्त नहीं होते। इतनी धुनों के सांगीतिक सृजन की क्षमता किस माध्यम से उन्हें प्राप्त होती है, यह अभी एक रहस्यमयी गुत्थी है। इसका निदान तभी सम्पन्न होगा जब इन लोकगीतों के संगीत को निरपेक्ष रूप से विश्लेषित किया जाएगा। इस विश्लेषण हेतु पूरे मानदण्ड संगीत के शास्त्रीय एवं सैद्धान्तिक पक्ष से ग्रहण करने पड़ेंगे। यह कार्य ठीक उसी रूप से करना सम्भव होगा जब हम किसी अनजानी भाषा को समझने का प्रयत्न करते हैं, जिसका अपना व्याकरण या भाषा वैज्ञानिक स्वरूप, किसी स्तर पर प्राप्त नहीं हो। ऐसी भाषा के रूप को समझने के लिए हम जिस भाषा को जिन मानदण्डों एवं नियमों के द्वारा समझते हैं, उन्हीं का आरोपण करके अनजानी भाषा की समस्याओं में प्रवेश पाते हैं। किन्तु धीरे-धीरे यही विश्लेषित भाषा अपने नियमों एवं व्याकरण को प्रस्थापित करने लगती है। संगीत की इस जटिलता को सुलझाने के प्रयत्न अभी हमारे देश में प्रारम्भ नहीं हुए हैं। लेकिन महिलाओं की सृजनक्षमता के मूल्यांकन में यह प्रयास किया जाना एक महती उपलब्धि सिद्ध हो सकती है। इतना ही नहीं, हमें अपने शास्त्रीय-संगीत के मूल तत्त्वों और विकास की समस्याओं को समझने में भी बहुत सहायता मिल सकती है। 

 

सामान्यतः हम मानकर चलते हैं कि यदि कुछ गाया जाएगा तो उसको कोई सुनने वाला होगा ही। किसी भी अभिव्यक्ति की पूर्णता में तीन तत्त्व तो होंगे ही, अर्थात् रचयिता, रचना और उसका श्रोता। किसी भी प्रकार के सम्प्रेषण को ग्रहण करने वाला नहीं है तो निश्चय ही एक ‘अभाव’ बना रहेगा। पूर्णता तभी होगी जब उस संदेश को कोई सुने। लेकिन पारम्परिक अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों को महिलाएँ गाती तो हैं लेकिन उस समय उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता। जो गा रही हैं, वे ही श्रोता भी हैं। आदिवासी समाज के अधिकांश गायन एवं नर्तन में भी यही स्थिति होती है। जन्म एवं विवाह के अवसर पर पाँच-सात महिलाएँ एक समूह में गा रही होती हैं लेकिन उस समय उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता। त्योहार-उत्सव-मेले के दौरान गीत चलते हैं लेकिन उनके श्रोता नहीं होते। इस अनोखे सन्दर्भ के कारण जो अभिव्यक्ति रूप सृजित होता है-उस पर विचार करने की आवश्यकता है। यहाँ गीत को गाने का कारण अवसर की महत्ता है, जो बीस-पच्चीस आवश्यक कार्य हो रहे हैं, उन में गीत भी चल रहे हैं। उनका अनुष्ठानिक या मांगलिक महत्त्व है। एक प्रकार की भागीदारी है। श्रोता-विहीन संगीत की परिकल्पना का स्वरूप क्या श्रोता-युक्त संगीत से भिन्न होगा? श्रोताओं की उपस्थिति याद होगी तो गायक उन्हें प्रभावित या आकर्षित करने की दृष्टि से कला-कौशल का सहारा लेगा। परिणामस्वरूप उस में प्रभविष्णुता उत्पन्न करने के लिए सहज प्रयत्न स्वयंमेव उ‌द्भूत होने लगेंगे। यह स्थिति हमें पेशेवर लोक गायकों में थोड़ी सीमा तक मिलने लगती है और उसका चरम शास्त्रीय-संगीत तक पहुँचते हुए स्पष्ट होने लगता है। आधुनिक परिवेश में यदि हम परेड हेतु बजने वाले बैंड-संगीत की स्थिति को देखें तो स्थिति का अन्दाज़ होने लगता है। लम्बी सड़क पर लम्बे समय तक बजाये जाने वाले संगीत का श्रोता तो होता ही है लेकिन सुनने का काल सीमित होता है। बैंड-संगीत को कभी भी किसी बैठक या सभा के संगीत का रूप प्राप्त नहीं हो सकता। बैंड में बजने पाले वाद्य और बजाने वाले संगीतकारों में भी ‘कौशल’ के अन्तर को हम सहज ही स्वीकार कर लेते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उन सभी महिलाओं के गीतों की सांगीतिक अभिव्यक्ति के पीछे इस सन्दर्भ की पहचान आवश्यक है। इन्हीं महिलाओं के उन गीतों की पहिचान की जा सकती है जहाँ सुनने वालों की उपस्थिति है, वहाँ निश्चय ही गीत के पाठ और संगीत के रूप का भिन्न स्वरूप भी प्राप्त हो जाएगा। विवाह के अवसर पर गाई जाने वाली गालियाँ (या सीठने) निश्चय ही सुनाने की क्रिया से जुड़े हैं। इन गीतों के पाठ एवं गेय रूप का स्वरूप सामान्य गीतों की तुलना में बहुत कुछ भिन्त्र है।

 

महिलाओं के गीतों को जब हम सहज कहते हैं तो उसका अर्थ हम किस रूप में ग्रहण करें? यह सहजता गीत के पाठ से सम्बन्धित हो सकती है और गेय रूप की भी हो सकती है। गेय रूप की सहजता से, सम्भवतया हमारा तुलनात्मक अर्थ यही होगा कि गीतों में स्वर के विस्तार, तान, मुर्की, लयकारी के प्रभावी-स्वरूप एवं अलंकारों आदि का प्रयोग नहीं होगा। अर्थ-व्यञ्जना की प्रक्रिया में भिन्न-भिन्न संगीत के आयामों द्वारा रचना को सज्जित नहीं किया जाएगा। सहज एवं सरल शब्दों को जटिल एवं संश्लिष्ट जैसी स्थितियों की तुलना में ही समझ सकते हैं। इस द्वैत की स्थापना हमें करनी ही पड़ेगी। लोक-गीतों की सहजता को स्थापित करने के लिए हम उन्हें चार-पाँच स्वरों तक सीमित रहने के तथ्य के द्वारा भी प्रस्थापित करते हैं। यह ऐसा संगीत है जो पूरे सप्तक का प्रयोग भी नहीं करना चाहता। इस समस्या के मूल में लोक-गीतों का अपना संगीत-दर्शन निहित है। इस संगीत को सामूहिकता का धर्म निभाना है जिस में समाज के प्रत्येक प्राणी का भाग लेना एक अनिवार्य शर्त है। अर्थात् सामान्य-से-सामान्य जन-संगीत के कितने स्वरों तक, अपनी सहज वाणी के धर्म सहित, पहुँच सकता है। कण्ठ की यह प्राकृतिक प्रवृत्ति लोक-गीतों को एक सीमा रेखा में बद्ध कर देती है। यह अनायास नहीं है कि लोक-गीतों की रचनाओं को इस धर्म का पालन करना पड़ता है। इस सहजता से बाहर निकलने के लिए प्राणी को नये अभ्यास के साथ स्वयं को तैयार करना होता है। यहाँ संगीत की शिक्षा या प्रशिक्षण की स्थिति बनती है। बिना तैयारी के शास्त्रीय संगीत के इस क्षेत्र में सहज ही नहीं पहुँचा जा सकता। परिणामस्वरूप लोक-गीतों के संगीत को सामूहिकता के धर्म को निभाने के लिए यह भी करना आवश्यक हो जाता है कि लोक-गीत को कोई भी, प्रयत्न करके, संगीत को किसी भी रूप में अलंकृत न करे। उसे उपज और आकार, तान, मुर्की से सज्जित न करे। वैयक्तिक कुशलता के प्रयोग से परहेज करे। यदि कोई भी महिला ऐसा प्रयल करेगी तो उस में सबकी भागीदारी सम्भव नहीं होगी। इसका दूसरा अर्थ यह भी होगा कि लोक-गीत में कौशल-प्रदर्शन की प्रवृत्ति को नकारा जाएगा, उसे स्वीकृति नहीं मिलेगी। इसके विपरीत कलात्मक संगीत की रचना में व्यक्ति का कौशल प्रमुख कसौटी बन जाएगा। समूहवाची संगीत का स्थान व्यक्ति की विशिष्ट साधना को मिल जाएगा। 

 

और जब संगीत व्यक्तिनिष्ठ, शिक्षानिष्ठ और रियाजनिष्ठ बनता जाएगा तो निश्चय ही सामूहिक अभिव्यक्ति का आँचल छोड़ने के लिए बाध्य हो जाएगा। इसका एक परिणाम विश्व के प्रत्येक भाग में हुआ। लोक-संगीत में तो पूरे समाज की भागीदारी किसी-न-किसी रूप में मौजूद रही है और रहती है। सब मिलकर गाएँ, सब मिलकर नाचें, सब मिलकर अपने साधारणीकृत आनन्द एवं मंगल की कामना करें, यह तो एक बात हुई और दूसरी बात हुई आप बहुत अच्छा गाएँ, खूब सुन्दर और मनमोहक रूप से संगीत को अलंकृत करें। आप गाएँ और उस में हम आनन्द लें, हम आपके कौशल की सूक्ष्मताओं को समझने के योग्य बनें, कला के क्षितिजों का विस्तार हो। लेकिन मुझे न कहें कि मैं गाऊँ, मैं नाचूँ और अपनी तरह आनन्द ग्रहण करूँ। संगीत या अन्य किसी भी ललित-कलाओं के साथ व सामान्य वैशिष्ट्य का यह स्वरूप निश्चय ही मिलता है। इनके दो पृथक उद्देश्य हैं, दो भिन्न रूप-स्वरूप हैं और दोनों का अपना-अपना पथ है, मार्ग है और लक्ष्य है। मानवमात्र के लिए दोनों प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं, भिन्न और अभिन्न दोनों हैं। आवश्यकता निश्चित रूप से इस बात की है कि लोक-संगीत से कला-संगीत के क्षेत्र ने अद्भुत क्रान्ति उत्पन्न कर दी है। अब सामाजिक आवश्यकता के रूप में लोक-संगीत को प्रभविष्णु एवं प्रभावी रूप से काम में लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और फलस्वरूप लोक-संगीत को यह एक नई जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है।

स्रोत
  • पोथी : गीतों की फुलवाड़ी ,
  • सिरजक : कोमल कोठारी ,
  • संपादक : विजयदान देथा ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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