राजस्थानी में गद्य नै पद्य रै बीचलै रास री रचनावां भी केई लिखीजी ज्यां नै चंपू काव्य भी कह्यौ जा सकै। अै रचनावां लयात्मक नै तुकांत गद्य शैली में लिखी गई है नै इणां में वर्ण्य विषय अलंकृत ढंग सूं पेस कियौ गयौ है। जिण तरै पद्य री रचना नै याद करणो आसान हुवै इणी तरै अैड़ी रचनावां नै भी याद राखण में सहूलियत रेवै नै पद्य री एकरसता तोड़ उण में नवीनता रौ आभास देवण रौ भी प्रयास वचनिका रै माध्यम सूं करीजै। इणी खातर राजरूपक नै सूरज प्रकास जैड़ा महाकाव्यां में भी वचनिका रा टुकड़ा मिळै।

 

पण वचनिका रै नांव सूं हीज राजस्थानी में आ न्यारी विधा पनपी नै उण में इण तरै रा गद्य खंडां रौ प्रमुख स्थान है। सिवदास गाडण कृत 'अचलदास खीची री वचनिका', जगा खिड़िया कृत 'रतन महेसदासोत री वचनिका' नै जैचंद कृत 'माता जी री वचनिका' इण ढंग री नांमी रचनावां है। इण वचनिकावां रै अध्ययन सूं मालम पड़ै कै कवि पद्य में वर्णन करतौ-करतौ उण ठौड़ वचनिका माथै उतर आवै जठै वौ तथ्यगत बातां नै प्रमुखता देवणी चावै—ज्यूं कै वीरां रा नाम, वीरां रा संवाद, सेना रौ वर्णन, सतियां रौ वर्णन आदि। इण तरै वचनिका एक तरै सूं कथा नै विस्तार भी देवती चालै नै ठहराव भी। क्यूंकै इण वचनिकावां रौ प्रमुख विषय वीर रसात्मक है इण खातर इण तरै री शैलीगत व्यंजना पाठक रै हिय में एक तरै रौ समुद्र आन्दोलित करै नै वचनिका री ओळियां उण में लैरां ज्यू तरंगित होती लागै। राजस्थानी रै इतरै विसाळ पद्य साहित्य में इणी खातर वचनिकावां रौ न्यारौ निरवाळौ नै विसेस स्थान मानीजै नै उपरोक्त वचनिकावां राजस्थानी री पैली दर्जे री रचनावां में गिणीजै। इणां में कवि आपरै गद्य नै पद्य दोनूं ही शैलियां माथै अधिकार नै प्रमाणित कर सकै है नै वस्तु वर्णन री बारीकी भी प्रकट कर सकै है।

 

जैन वचनिकावां इणां सूं भिन्न मानी जा सकै है क्यूंकै उणां में ओज नै कसावट री मात्रा में कमी लखावै। ज्यादातर जैन लेखकां टीका रै रूप में वचनिका लिखी है, वे वचनिकावां मात्र पद्य नै अरथावण खातर है जिण सूं नांम साम्य होतां थकां ही वांरौ मकसद नै रचना स्वरूप दोनूं ही भिन्न है। स्वतंत्र मौलिक रचना रै रूप में अैड़ी रचनावां नै स्थान नहीं दियौ जा सकै। भासा री द्रस्टि सूं वांरो अध्ययन उपयोगी हो सकै है।

 

राजस्थानी रौ विसाळ साहित्य हाल तक ग्रंथ भंडारां में दबियोड़ौ पड़ियौ है। इण तरै री जो भी रचनावां प्रकास में आई है उणां में तीन वचनिकावां प्रमुख है वांरौ संक्षेप में परिचय नै विसेसतावां इण भांत है—

 

अचलदास खाची रा वचनिका : गाडण सिवदास रचित

 

आ वचनिका गागरोन रै खीची सासक अचलदास नै माळवै (मांडू) रै सुलतांन होसंगसाह रै बीच हुयोड़ै जुद्ध माथै लिखी गई है। ओ जुद्ध संवत 1480 में हुयौ मांनीजै नै इण भयंकर जुद्ध में अचलदास वीरगति प्राप्त करै तथा राणियां सती हुवै। अचलदास मेवाड़ रै रांणै मोकळ रौ बहनोई हुवै नै रांणौ इण विपदा में मदत माथै आवणी चावतां थकां भी नहीं आ सकै, इण सूं अचलदास रौ अेकलापै री स्थिति में थोड़ा-सा वीरों साथै जूंझणौ बतायौ गयो है। वचनिका री साख रै आधार माथै आ बात प्रमाणित मांनी जावै कै कवि खुद उण मौके माथै मौजूद हौ नै आपरै स्वामी री कीरत गाथा गावण खातर ही जीवतौ रह्यौ नीतर इण महाजग्य में वो आपरा प्राण होम देवतौ। उण इण जुद्ध रौ वर्णन इतरौ जीवंत नै सांगोपांग करियौ है जिण सूं भी आ बात सांच लखावै।

 

इण रचना में सुल्तान री फौज रौ बिसाळपणौ दरसावतां थकां कवि उण स्थिति नै घणै ओज नै गुमेज सूं चित्रांमी है। उण आपरै वर्णन में बतायौ है कै घणा गढां नै जीतनै इण सुल्तांन धकै कुण टिक सकै है, किण री मां अैड़ौ दूध पियौ है जो इण री तलवार रै पांणी आगै उभ्भौ रह नै झाट झेलै। आज न सातल सोम जैड़ा बीर रह्या न कान्हड़दै जैड़ा बात रा घणी नै न हमीर जैड़ा हठी पण धरती में नास्ती नहीं है क्यूँकै अचलदास खींची जैड़ौ वीरता रौ वरण करण वाळा गुमेज रा धणी हाल लंका सूँ होड लेवणिया गढ ढाबियां बैठौ है जिण माथै सूं निकळतौ चंद्रमा भी संकै नै जिणारौ छत्री पणौ च्यारू कूँटां में चावौ है। सुल्तांन री फौज खातर लिखियौ है—

 

साहण लाख न सार पैदल पार न प्रामियइ
गुड़ियइ गोरि राव-कह मई दळ सबळ अपार

 

कवि दोनां पखां रौ संघरस जोर सोर सूं संखेप में बतायौ है, पण साथै ही अचळदास नै उणारी रांणी पुस्पा रा संवाद उण बखत री वीरतापूर्ण पृस्टभूमि में हेम रेखां ज्यूं चमकता दीसै। जीवण नै मरण सूं इधकी मान मरजादा नै गढ़ नी त्यागण री भावना राजपूत समाज री परम्परागत विसेसतावां नै उजागर करै। अचलदास री राणियां रै सिवाय दूजा जोद्धावां री रांणियां रौ भी उत्साह वर्णन कवि घणै उत्साह सूं करियो है। सुल्तांन री विसाळ सेना आगै आखिर अचलदास लड़तौ-लड़तौ आखतौ हो जावै जणां मरजादा री आखरी माठ माथै आय जौहर रौ रूपक बणै जिको राजस्थानी साहित्य में एक बिरळौ रूप है। राणियां री धारणा है कै कथीर साथै सोनो कींयां मिळै, मुगलां रै हाथ में पड़ण सूं तौ प्रांणां नै पवीत्र अगनी में होमणा ही श्रेष्ठ है, औ विचार नै वे जौहर करै। उठी नै किलै रा द्वार खोल वीर केसरिया कर आखरी हाथ बतावण तळेटी में उतरै नै घमसांण जुद्ध में लोही रा खैगाळ बेवै। अचलदास नै एक ही चिंता सतावै के उणरै कुळ री रछा खातर उण रा राजकुमार धीरज नै पाल्हणसी इण घमसांण सूँ बारै निकळ जावै। इण मोकै अचलदास रै हियै री उथल-पुथल कवि आपरी सबळ लेखणी सूं आंकी है नै अचलदास री आन राखतां थकां पाल्हणसी नै जुद्ध सूं विरत कियौ है। इण तरै रा प्रसंगां में एक नाटकीयता रौ उभार कवि घणी सावचेती नै खूबी सूं कियौ है नै पाल्हणसी रै चरित नै भी उजाळियौ है। इतरौ विध्वंस होतां थकां ही जीवते जीव अचलदास गढ नीं छोडियो—'आपण दुरग न अप्पिअइ जीवत जाइल राइ'। इण तरै जूँझतां थकां अचलदास प्राण देय अमरता रौ वरण करियौ—

 

‘संसार नांम आतम सरगि अचल बेवि कीधा अचल।‘

 

डिंगल री प्राचीन रचनावां में आ रचना जितरी ओजपूर्ण मानी जावै उतरी ही सहज भाव-व्यंजना री दीठ सूँ महत्त्व राखै। इण कृति में न तौ लांबां रूपक है न लांठा उपमावां रा उछाळा अर न अणूतौ बात बणाव । इण री भाव-व्यंजना जितरी सीधी उतरी ही गैरी उतरण वाळी नै घणी असरदार है। इण रचना रौ प्रचार उण समै रा चारण समाज में तौ रह्यौ ही हुवैला पण बाद में भी इण नै एक आदर्स रचना मान कवि प्रभावित होता रह्या है। राजस्थानी री दूजी ऐतिहासिक महत्व री वचनिका, जिकी राठौड़ रतन सिंह माथै घणा बरसां पछै लिखीजी, में भी इण रौ प्रभाव झळकै। आ रचना प्राचीन चारण सैली रौ एक अध्ययन जोग उदाहरण है।

 

राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री वचनिका 

 

आ दूजी वचनिका भारत री घणी महताऊ ऐतिहासिक घटना माथै लिखियोड़ी है। इण रौ लेखक जगौ खिड़ियौ रतलाम राज रै संस्थापक राठौड़ रतन सिंह रौ आश्रित हौ। साहजहां बादसा री मांदगी जद मोटी असमाघ में बदलगी तौ उण रा बेटां रै बीच राजगद्दी दाबण री होड माची। औरंगजेब दिखण रै सूबे रौ सासक नै सगळा भायां में राजनीति रौ मोटो खेलाड़। उण आपरै भाई मुराद नै साथै ले दिल्ली दाबण रौ मतौ कियौ। अठी ने साहजहां जोधपुर रै महाराजा जसवंत सिंह नै बुलाय मुगल फौज रा प्रधान सैनापति बणाया नै वांनै सप्तहजारी मनसब देय औरंगजेब रै खिलाफ रवानै किया। उजैन खनै घरमाट नांव री जागा माथै दोनां दळां बीच जुद्ध हुयौ। इण बीच जसवंत सिंह सागे केई राजपूत राजा आप-आप री फौजां लेय भेळा हुआ जिकां में राठौड़ रतन सिंह भी एक नांवजद सासक है।

 

औ जुद्ध घणौ भयंकर हुयौ नै इण में दोनूं तरफ रा अणगिणत जोधा काम आया। अेन बखत माथै जसवंत सिंह रौ अेक मुगल सेनापति भी औरंगजेब सूं मिळ गयौ जिण सूं हालत बड़ी विकट होगी। जसवंत सिंह इण जुद्ध में मरण रौ मतौ कर जूझतौ रह्यौ पण साथियां देख्यौ कै इण मरण में भी सार कोनी, जसवंत सिंह नै बचावणौ जरूरी समझ वां घोड़ै री बाग झेल जसवंत सिंह नै घणै हठ सूं रण खेतर बारै काढियौ नै उणां री जागां जुद्ध रौ भार आपरै माथै लेय मरण रौ मौड़ बांधियौ। रतन सिंह रण सूं नहीं हट'र राजपूत रौ धरम कायम राखियौ। इणी खातर इण घटना नै लेय रतन सिंह अमर होग्यौ। इण अखाड़ सिंघ वीर प्रांण प्रण सूं जूझणौ नै करतब बांका साथी जोधारां रै सूरापणौ रौ इण वचनिका में आपरै आंख देख्यौ वर्णन कवि जगै करियौ है।

 

इण ग्रंथ री कथा वस्तु छोटी-तो है पण इण में केई जोधारां रा नांवठांव नै ऐतिहासिक तथ्यां रौ विवरण सांगोपांग ढंग सूँ हुयौ है।

 

कवि जठै सेनावां री हलचल रौ वर्णन करण में निपुण है उठै ही वीरां री विसेसतावां नै वांरै मुख सूं निकळती वीरोक्तियां रौ वर्णन भी साचमाच उण बातावरण नै जीवतौ कर देवण री खिमता राखै। बातावरण री जीवन्तता खातर अठै दो उदाहरण देवणा ही काफी हुवैला—

 

जुद्ध वर्णन—

 

खगां चढ़िधार हुअे बि खंड
पड़े धार हिन्दु मलेछ प्रचंड
रळतळि नीर जिहां रुहिराळ
खळाहळ जाणि कि भाद्रव खाळ॥

 

संवाद री सजीवता—

 

रिण रामाइण जिसौ रचावां, लड़े मरां चंद नांव लिखावा
जसवंत अेम बोलियो ज्यांरा, तण महेस अरज की त्यांरां
जोधां धणी घणा दिन जीबौ, दळसिंणगार वेस चौ दीवौ
दे सोबो पतसाह मूझ दल, सबळी लाज मरणछळि सब्बळ॥

 

सरूपोत सूं लेय आखिर तक कवि ओज रौ अेक सो निर्वाह करियौ है नै डिंगल भाषा री परम्परावां नै आप में अंगेज नै आखरां में उतारतौ रह्यौ है। उण रौ नाद सौंदर्य भी देखण जोग है—

 

रळतळि नीर जीहां रुहिराळ
खळाहळ जाणि कि भाद्रव खाळ।

 

इण रचना रौ अंत रतन सिंह री राणियां रै सती होवणै रै प्रसंग सूं हुवै जिको परम्परागत होतां थकां ही ओपतौ लखावै।

 

भासा भाव अर सैली री भव्यता में आ रचना मध्यकालीन राजस्थानी में बेजोड़ गिणीजै, इणी खातर चारण समाज में इण रो घणौ प्रचार रह्यो नै माळवा नै राजस्थान रै कवि समाज इण नै घणै आदर सूँ अंगेजी।

 

आ रचना जठै उण वखत री संस्कृति नै राजनीति नै उजासै साथै ही डिंगल भासा रै विकास री गत नै भी ओळखांण देवै।

 

माताजी रो वचनिका: जयचद जती कृत

 

आ रचना किणी ऐतिहासिक घटना सूं सम्बन्ध नीं राखै। इण में शक्ति रै अवतार नै दुर्गापाठ री पृष्ठभूमि में बखाणियो गयौ है। इण में आदि शक्ति रौ प्रभाव समस्त प्रकृति तथा चराचर माथै बतायौ गयौ है तथा देवी नै देवतावां री सर्जक नै रक्षक बतायीं गई है। इणी खातर देवी रौ रूप जितरौ भव्य नै समर्थ है उतरौ ही आकरसक है। इण रचना रौ सर्जण जैचंद जती उण बखत में करियौ है, जद धर्मान्धता रै कारण मुगल साम्राज्य रौ पतन होतां थकां ही हिन्दू धर्म माथै मोटी आफत आयोड़ी ही। रोजीना मिंदर ध्वस्त होवता नै गायां खातर बाहर चढती। अेड़ी परिस्थितियां में कवि शक्ति रौ त्वरित बखाण-जनचेतना में आपौ संचरण री कोसीस करी है। कवि जैन धर्म सूं संबधित है पण उण धार्मिक संकीर्णता सूं ऊपर उठ शक्ति रौ सांगोपांग काव्यमय-वर्णन करियौ है।

 

इण रचना में मूळ कथा सुंभ-निसुंभ रै अत्याचारां सूं देवतावां नै मुक्त करावणौ है। देवी इणां दुस्टां रौ संहार कर देवतावां नै उबारै नै घरती रौ संकट मेटे। देवी इण संघर्ष री प्रेरणा उण काळ रै धार्मिक संघर्ष रै वातावरण सूं लेवै—

 

मांडै असुर मसीत देव भवन छांडै दुरस
पछिम मांडै पारसी अे ही ग्रही अनीत।

 

कवि रो गद्य तथा पद्य दोनों पर समान रूप सूँ अधिकार है। देवतावां री विनती माथै इन्द्र रा वचन उदाहरण जोग हैं—'इतरौ सांभळ विळकुळतै वदन पुरंदर बोलियो—

 

''जांणै कर उजाळ, अमोलक मोताहल रा वचन झड़ै। तठै कह्यो—बधेज री वारता करौ, म्हे कहां तिकुं मन धरौ। घुरा आदि करतां, पुरस सिस्ट रचना कीधी। तठै जोड़ौ पैदास कियौ। धरती नै आकास चंद्र नै सूरज, पवन नै पांणी, दिन नै रैण, तौ देव नै दांणव पैदास किया।''

 

इणी तरै गद्य में देवी री स्तुति भी बड़ी मार्मिक बण पड़ी हैं—खमा खमा खेचरी, जैत जैत जुग जणणी तूं करता तूं आदि, तूं ही पतिंतां उधरणी सुणि बोले संकरी, भणौं कारज कुण भ्रातां चिंतातुरां दुचिंत, विगत सुध दाखौ वातां पुण इंद करग जोड़े प्रमण, कहर कळह किसणा कियां वर जोर सुरां थापै अवन, पांणि न पोहचै किण बियां॥

 

जुद्ध खातर आखता, रण रसिया सिंभ-निसंभ री पौरस भरी वाणी भी पढण जोग है जिण में डिंगल री परम्परागत ओजस्विता री पांण छळकती निजर आवै—

 

'तो घणा पीठांण मांहै हैवरां नै ताता करि खुरी करावां, रुद्रमाळ रचावां, पहाड़ां जळ चढावां, इतरौ सांभळी नै संभ नै निसंभ बेऊ भाई बोलिया—उवाह-उवाह। अणी रा बींद, रिण में बावळा। बांकी मूछळा। कळिया वैरां रा बाहरू। दलां री ढाल। अमरपति रा साल, भुजां रा भांमणा लीजै, अखियात कीजै। कलहगारी रा हाथ देखीजै।'

 

पैली वाळी दो वचनिकावां ज्यूं इण रौ ऐतिहासिक महत्व नीं होता थकां ही इण रौ सामाजिक नै मोटौ साहित्यिक महत्व भाव भासा नै वर्णन री खूबी रै कारण सूं है। इण में जुद्ध वर्णन रै अलावा नारी सौंदर्य नै प्रकृति रौ भी घणौ ओपतौ वर्णन कियो गयौ है नै वार्तालाप में सजीवता बण पड़ी है। कवि री सैली सूं आ बात प्रकट हुवै कै वो डिंगल री परम्परा में भी आछी तरै रंगियोड़ौ भिदियोड़ौ है।

 

यां इणी गिणी वचनिकावां रै उदाहरणां सूं इण विधा री विसेसतावां जठै भाळे पड़ै उठै ही आ बात भी प्रमाणीजै कै आंपां री भासा में पुरांणै बखत में भी बराबर प्रयोग होवता रह्या है नै वे अभिव्यक्ति रा अेक सफळ माध्यम रै रूप में साहित्य में आदर पावता रह्या है।

 

वचनिका ज्यूं ही राजस्थानी में तुकांत नै लयात्मक गद्य री दूजी विधा दवावेत मानीजै। रघुनाथरूपक में कवि मंछ इण रा दो भेद—पद्यबंध नै गद्यबंध किया है। पहली में 24 मात्राओं रौ क्रम निबाहिजै नै दूजी में मात्रावां रौ कोई नेम कोनी। केई पिंडतां दवावेत री उतपत फारसी रै वेत छंद सूं मानी है। दवावेतां में उर्दू-फारसी री शब्दावळी रौ भी प्रभाव घणौ लखावै जिण सूं उण में खड़ी बोली रौ लैजौ भी आवै।

 

न्यारा-न्यारा ग्रंथ भंडारां में हाल तांई जिकी दवाबेतां मिली है, उणां में महाराज अजीत सिंह री दवावेत, ठाकुर रघुनाथ सिंह री दवावेत, महारारणा जवान सिंह री दवावेत, अक्षय सिंह देवड़ा भी दवावेत वगेरा महत्वपूर्ण है। राजस्थानी रै गद्य लेखण रै विस्तार में इण रचनावां रौ आपरौ निरवाळौ स्थान है।

स्रोत
  • पोथी : परंपरा (राजस्थानी गद्य री परंपरा नै आधुनिक विकास) ,
  • सिरजक : नारायण सिह भाटी ,
  • संपादक : हुकम सिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर
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