(आज रै आदमी री ओळखाण री कोसीस में)
कहाणी जीवण री जरूरत है। इणी कारण जद सूं सृष्टि बणी, बीं बगत सूं ई कहाणी री सरूआत हुयगी। सृष्टि रो बणणो खुद एक कहाणी है। कहाणी रै विकास नै लगातार गति देवण रो काम कर्यो भाषा। भाषा रै जरियै कहाणी समाज में चावी हुई। सरू में इण रो रूप जबानी रैयो अर होळै-होळै इण आपरो लिखित रूप अख्तियार कर्यो।
जीवण कदैई एक जागा माथै थिर कोनी रैवै। जीवण रा मूल्य पण थिर कोनी रैवै। बदळतै जीवण अर जीवण मूल्यां रै प्रसंगां री पळेट कहाणी रो रुप-रचाव अर बुणगट ई बदळती रैवै। ओ बदलाव जरुरी है, कारण कै बदळाब री प्रक्रिया (Process of Changing) ई जिनगाणी है अर कहाणी जिनगाणी सूं अलग कोनी हुय सकै।
आपणै जीवण रै बदळावां नै कठै सूं रेखांकित करां, ओ सवाल जद सामैं आवै तो मैं अेक ई उथळी देवणी चावूं कै आंपां नै इस री सरुआत आजादी रै बगत सूं करणी चाईजै। कारण कै किणी भी जात, समाज अर देस रै बदळावां री असली सरुआत बां री आजादी सागै ई जुड़योड़ी हुया करै है। अठै ई आ बात कैवणी चावूं कै गुलामी री कैद सूं मुगत हुवण खातर लोगां जिकी कोसीसां करी, बां री चर्चा अकारथ कोनी।
राजस्थानी कहाणी री बात आजादी पछै सूं करण रो अेक कारण औ भी है कै अठै री कथा जात्रा री सरूआत सन् 1650 रै अेड़ै-गेड़ै ई सरू हुवै।
आजादी मिलतांई समूचै देस अर देस रै लोगां री आंख्यां आगै भविष्य रा फूठरा चितराम घूमण लाग्या। नूँवा-नूँवा सुपना सजावण री कामनावां जागण लागी। जवाहर लाल नेहरु सूं लेय'र इन्दिरा गाँधी तक रै शासनकाळ रा कड़वा-मीठा अणभव हुया। सरू में जठै लोगां आजादी रो अर्थ पोपांबाई रो राज समझ्यो अर दावै जियां ई अणूतायां करी बठै ई आं दो बरसां में अेक नूँवी दीठ रो विकास हुयो अर आजादी नै लूंठी जिम्मेवारी रूप कबूलण री बात सामैं आयी। अधिकारां सागै कर्त्तव्यां री बात जुड़ी। कर्त्तव्य-बिहूणँ अधिकारां माथै आंकस लगाइज्यो। अव्यवस्था, अराजकता अर भ्रष्टाचार रै खिलाफ आजाद देस रो सांवठो पांवडो उठ्यो, जिण रै परिणाम रूप अेमरजेन्सी सामैं आयी।
आं बदळतै राजनीतिक हालातां रो असर आदमी रै सामाजिक अर आर्थिक जीवण माथै पड्यो। बदळतै सामाजिक अर आर्थिक हालातां सूं मिनख रा मूळ सम्बन्ध तकात आं बदळावां री चपेट में आयग्या। आपणै सामाजिक जीवण रो मूळ ढांचो हो संयुक्त परिवार। संयुक्त परिवार समाजवादी रब ढब रो सांतरो नमूनो हुय सकै हो, पण इण में अलेखूँ दोष घर करग्या अर इण री जड़ता, घुटण अर जेळ सो रंग-ढंग इण रै टूटण-बिखरण रो कारण बण्यो। इण नै तोड़ण-बिखेरण लारै कळू-बदळवां रो ई पूरो-पूरो हाथ रैयौ। कळू-बदलावां रै कारण समाज में लोगां रै समूण्डै रोजगार रा नूँवा मारग खुल्या। रोजगार रो नूंतो अर सैरां री चमक-दमक सूं गांवां रा लोग सैरां कांनी उमड़्या। गांवां रा मारग सैरां री सड़कों सूं जुड़ग्या अर झूँपड्यां हेठै रोटी खाय'र धोरां माथै खुली हवा में रमती सांसां संकड़ै कमरां में आय'र कळ-कारखानां रै धूंवै अर दपतरां री फाइलां हेठै दबण-घुटण लागी।
आपणै सामाजिक सम्बन्धां रो मिठास पण आं बदळावां सूं अछूतो कोनी रैयो। बाप-बेटा, मां-बेटी, भाई-भाई, भाई-बैन अर धणी-लुगाई रै मूळ सम्बन्धां में बदळाव रा दरसाव परतख निगै आवण लाग्या है। आं रो परम्परागत मोह अर महत्व जिण दिखावै रूप रैयग्यो है, बीं में आपणी कित्तीक आस्था है, आ बात अछांनी कोनी! सैंग सम्बन्ध 'अर्थ' री जमीन माथै आय'र टिकग्या है।
बदळाव री इण प्रक्रिया सूं जीवण री आस्था अर विश्वास भी जुड्या। जूनी आस्थावां टूटी। अेक बगत हो जद पांच अर सात बेटां रो बाप हुवणो गरब री बात ही, रजस्वला हुयां पैली बेटी रो ब्याव करणो पुन्न रो काम हो, बगतसर बेटै नै परणा देवणो फरज हो, अर लुगायां खातर बेटा जिण'र नित पीळो ओढणो जीवण री सार्थकता रो प्रतीक हो। पण आज अै सैंग विश्वास बदळग्या। 'दूधां न्हावौ, पूतां फळो' जिसा आसीस वचन आज गाळ अर श्राप स्वरूप लागै! आं सब बातां रो अकारथ अर अरथहीण हुवणो अकारण कोनी।
समाज में हुवण आलै आं बदळावां रो सै नाऊं बत्तो समर्थन अर विरोध मध्यवर्ग रै लोगों में देखण में आवै। ओ वर्ग बातां सूं प्रगतिवादी दीखै अर व्यवहार में रुढीवादी हुवै। इण वर्ग रो ओ सुभाव ई इण री कई तकलीफां रो कारण है।
आज रा घणखरा लेखक मध्यवर्ग अर निम्नमध्यवर्ग सूं आयोड़ा है। मध्यवर्ग अर निम्नमध्यवर्ग रै जीवण रो कहाणी में अंकित हुवणो अर बां पात्रां रै सुख-दुख री मनगत सागै लेखक रो जुड़ाव ई नूंवी कहाणी री सरुआत है।
आदमी नै आपरी दीठ रै सांचै में ढाळ'र नई, बींनै बीरै ई रूप में बो जेङो भी है भलो या माड़ो, सरावण जोग या घ्रिणा जोग, पाठकां सामैं राखणौ नूँवो पांवडो है।
आज री कहाणी रो पात्र आज रो आदमी है। आज रो ओ आदमी रोजमर्रा री जरूरतां रो मार्योड़ो है। ओ आदमी कणाई तो राजनीति री चकाचौंध में चमगूंगै जट्टू सो ऊभो दीखै अर कणाई बगत रो रूख आपरै पख में देख'र डोढ स्याणो बणण री कोसीस करतो दीखै, कणाई सिद्धान्तां री रिछपाल खातर मरण-मिटण री तेवड़'र ऊभो दीखै अर कणाई मामूली स्वार्थ नै आंव नी पूगै, इण खातर समझौतो करतो लाधै, कणाई इण भावनां सूं ग्रस्त लाधै कै आं दुखां रै कोई कारी कोनी लागै अर लड़णो बिरथा है अर करणाई बीं में आ भावना भर्योड़ी हुवै कै उजस खातरै छेली सांस तांई लड़णो है।
आपरै असवाड़ै-पसवाड़ै रै परिवेश री सांची ओळखांण नूँवी कहाणी में ई लाधै। लेखक आपरै असवाड़ै-पसवाड़ै सूं बै सांच संजोवै, जिणा रो साँच हुवणो खाली बीं रै खुदताई'ज नीं हुवै; ओ सांच दूजै लोगां नै भी लखावै। खुद रै सांच सूं दूजां रै सांच रो ओ जुड़ाव ई नूंवी कहाणी रो मूळ सुर है। आज लेखक री तकलीफां सूं पाठक रै जुड़ाव रो कारण ओ ई है। रचना रै माध्यम सूं पाठक आपरै अेड़ै-छेड़ै रै संसार नै ओळखै! नूँवी कहाणियां रा अै घणखरा पात्र जिका 'मैं' या 'बीं' रै रूप में आया है, कई दफै तो पाठक आं सूं इत्ता जुड़ जावै कै बै खुद नै ई कहाणी रो पात्र समझण लागै।
आपरै परिवेश अर जीवण री तकलीफां सूं असली जुड़ाव रो ई परिणाम है कै आज जिकी कहाणियां लिखीज रैयी है, बीं रै पात्रां री ओळखण सहजता सूं करीज सकै है। म्हारै ख्याल सूँ आज सूं पैली रै कहाणीकारां कनै इसा कागद सायद ई हुवैला जिका में ओ लिस्योड़ो हुवै कै इण कहाणी रै जीबत पात्र नै मैं पिछणग्यो हूँ या आ कहाणी तो फलाणी आदमी री है या आ कहाणी तो थांरै खुद रै ई घर री लागै...आदि। हुय सकै, इण साख सूं कोई कहाणी 'महान' नीं बणती हुवै, पण महानता खातर जिकी जरूरी शर्ता हुया करै है, बिन्नै बधण री सरुआत अठै सूं ई हुया करै है। आ बात लेखक री ईमानदारी री साख भरै अर बीं नै भरोसो देवै कै वो आप बगत तू जुड्योड़ो है।
केई जूना लेखक अतीत सूं इण कदर जुङयोड़ा हा कै बांरी दीठ इण सांच सूं आगै कोनी बधै कै राजस्थान रो इतिहास खड़कती तलवार, कड़कती ललकार अर बळबळती झाळां में होमीजती कंचन सरीसी काया रो इतिहास है। मैं सोचू कै ओ इतिहास हो, अबै कठै है?
दूजै कानी बै लेखक है जिकां ने लखावै कै समाज में चौफेर असूतायो, अनीतायां, बेईमानी अर कूड़ रो राज है। सांच अर सुख खाली सुपनो है। जिनगाणी दुखां रो दरियाव है। अेड़ै माहौल में जीवणो बिरथा है। आ जिनगाणी जीवन जोगी ई कोनी। बां री इण गूगळी दीठ रा शिकार हुय'र जिका पात्र सांमैं आवै बै गळ्योड़ै हाडमांस रा पुतळा सा लागै।
पण नूँवी कहाणी आं दोनूं ई तरह री दीठ सूं परै, आदमी नै बीं रै परिवेश अर सही सन्दर्भों में कबूलै। बीं रो जीवण जिसो भी है, भलो या माड़ो-बीं नै कबूल र जीवण में जित्ती गन्दगी है, बीं नै बारै काढ'र एक साफ सुथरै जीवण री उम्मीद लियां लूँठै बदळाव री उडीक में पूरी हिम्मत अर विश्वास सूँ जीवतै आदमी री कहाणी है।
आज रो लेखक आदमी रै दुखां रै कारणां रै कारणां री पड़ताल में लाग्योड़ो हैं। बो जाणै कै आखी दुनियां मोटै रूप सूँ दो खेमां में बंट्योड़ी है—पूँजीवादी अर समाजवादी। एक तीजी दुनियां भळै है—गुट निरपेख देसां री दुनियां। आं दोनूं गुटां री आंख तीजी दुनियां रै देसां माथै टिक्योड़ी है। तीजी दुनिया नै आपरै पख में करण खातर दोनूं ताकतां लाग्योड़ी है। इणी कारण जुद्धां रो डर आदमी रै माथै कांवला दांई मण्डरा रैयी है। सीतजुद्ध रा कांवला आदमी नै तिल-तिल कर'र मारै। झटकै सूँ मरणो घणो सोरो हुवै पण होळै-होळै हलाल हुय'र मरणो कित्तो तकलीफ भर्यो है, हुलाल हुवणिया ई जाणै। सीतजुद्ध रो डर आदमी नै हलाल कर रैयो है।
औ तो हुयो ऊपरी डर। इण रै अलावा आज रो आदमी आपरै माँय रो माँय हलाल हुय रैयो है। बीं रा सुपना, बीं री मनस्यावाँ, बीं री उम्मीदां...अै सै टूट रैयी है। जीवण री तीन मूल जरूरततां—रोटी, कपड़ो अर मकान री चिन्ता में डूब्योड़ो आदमी...आर्थिक तणावां बिच्चै पीसीजतो-कूटीजतो आदमी...रीत रा रायता कर र 'नाक' ऊंची राखण री चिंता में डूब्योड़ो आदमी...अनिस्चै रै अंधारै में डूब्योड़ो भविष्य लीयां जीवतो आदमी..।
आं सैंग प्रसंगा नै उजागर करण आळी कहाणियां री साख खातर दाखलै स्वरूप अै नांव गिण सकां हां—ओजू बसन्त, जुड़या-कट्या, गली बणता घर, सुकड़ीजता आंगणा (सांवर दइया), ठस्योड़ो मून, अकाळ मौत, मंझधार कानी (नन्द भारद्वाज), लालबत्ती (रामेश्वर दयाल श्रीमाली), वातां, दिनचर्या (भंवरलाल भ्रमर), उडीक, बुद्धिजीवी (मोहन आलोक), ताम्र पत्तर (कृष्ण कल्पित), भींत (हनुमान पारीक), भारत भाग्य विधाता (नृसिंह राजपुरोहित)...नावाँ री आ फेहरिस्त अंतिम कोनी।
नूंवी कहाणियां नै सांमैं लावण रो काम हरावळ, दीठ अर हेलो रै जरिये हुयो, बो सरावण जोग है। मरुवाणी री सेवाबां घणी है, पण बीं में छपण आळी रचनावाँ लारै पुख्ता दीठ रो अभाव लखावै।
नूंवी कहाणी माथै नूंवी-नूंवी थरपणावाँ अर घोषणावाँ करण सूं बत्ती जरूरत इण बात री है कै ज्यादा सूं ज्यादा सृजनात्मक काम सांमैं आवै। नूंवी कहाणी री सरूआत हुई है अर इण सरुआत नै बीं पुराणै काम सूं जोड़ण री है, जिको कै सर्वश्री मुरलीधर व्यास, नृसिंह राजपुरोहित, नानूराम संस्कर्ता, दामोदरप्रसाद शर्मा, डॉ० मनोहर शर्मा, मूलचन्द प्राणेश, श्रीलाल नथमल जोशी, वियजदान देथा कर्यो है। अन्नाराम सुदामा इणी पीढी रा है, पण बाँ कनै भाषा अर भाव रा जिका मोड़-मिजाज है, बां नै आं सगलां सूं निरवाला दिखावै।
मुरलीधर व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, मूलचन्द प्राणेश, मनोहर शर्मा आदि री कहाणियां मांय सूं बै कहाणिया टाली जावै जिकां में आदमी 'आपरै ई' रूप में आयो हैं अर जीवण री तकलीफां नै झेलतो-भोगतो वां सूं जूझण भरी खिमता राखै। वो किणी 'सुधारवादी दीठ' रै सांचै में नीं ढल्योड़ो हुवै।
इण जुड़ाव पछै ई एक सिलसिलै वार कथा जात्रा रो रूप सामैं आ सकै है।
अंत में आ बात कैवणी चावूँ कै कहाणी रो सम्बन्ध आदमी सूं है अर आदमी रो सम्बन्ध समाज सूं। समाज री समझ सारू समाज शास्त्रीय दीठ री जरूरैत हुवै। इणी सन्दर्भ में आ बात सांमैं आवै कै समाज आदमियां री भीड़ रो नांव कोनी...। आदमी अर आदमी रै बिच्चै जिका सम्बन्ध हुवै, बां नै समझणी ई समाज नै समझणो है। अै सम्बन्ध बणता रैवै, टूटता रैवै अर नूंवा रूप धारण करता रैवै। हरख री बात है कै यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, मणिमधुकर, सांवर दइया, दीनदयाल कुन्दन, नन्द भारद्वाज, रामेश्वर दयाल श्रीमाली, कृष्ण कल्पित, हरमन चौहान, मोहन आलोक, भंवरलाल सुथार 'भ्रमर' अर हनुमान पारीक आदि आं बदळतै- टूटतै सम्बन्धां बिच्चै जीवण नै उजागरै करण में पाग्योड़ा है।