माणक रै जून 1982 रै अंक में कवि सम्मेलनां री यादां बाबत राजस्थानी कवियां रा कीं सस्मरण छप्पा हा। बीं री आगली कड़ी में मायड़ भाषा रा जूना अर जाणीता कवि रेवतदानजी चारण, गणपतचदजी भंडारी अर लक्ष्मणसिंघजी रसवंत आपरा खाटा-मीठा अनुभव ‘माणक’ रा पाठकां सांमी पेस करै।
प्रस्तुति : नृसिंह राजपुरोहित
अठै रातवासौ लियां मौत खावणी पड़सी : रैवतदानजी री आपबीती
प्रसंग-१
मोकळा बरसां पैली री बात। चित्तौड़ में महासती रै मेळै रै मौकै कवि सम्मेलन रौ न्यूंतौ आयौ। जावणौ जरूरी हौ, सो जाय पूगौ। कवि सम्मेलन सरू हुयौ। कविता पाठ री बारी आई। श्रोतावां माथै निजर पड़ी तौ ठाट लाग्यौ थकौ। मेवाड़ी आंटै रा पेचा बांध्यां अर मूंछा रै वट दियां च्यारूंमेर ठाकर-ई-ठाकर निजर आया। कई क तो सस्तर-पाटी सूं लैस जाणै रण छेतर में जावण सारू त्यार। म्हारी सगळी कवितावां सामंतवाद अर पूंजीवाद रै विरोध री ही। श्रोतावां नै निरख’र मन में सोच्यौ रेवत, आज तौ भूंडा फंस्या। इण माहौल में जे इंकलाबी कवितावां बोली तौ कूटीजण रौ सरंजाम त्यार अर जे डरनै नीं बोली तौ आज थारौ कविपणौ लाजसी। मोट्यार औस्था ही अर खून में ही गरमी। आभौ टोपाळी जितरौ निगै आवतौ। सो डर-भौ आगौ नांख्यौ अर हरावळ री सेना काटक पड़ै ज्यूं निडर होय नै कविता-पाठ करण लाग्यौ। इंकलाब री आंधी में गढ कोट अर बंगळा झपाटै सागै उडाया, सिंघासण अर राजमुगट ठोकरां में रड़बड़ता गिणाया तौ लखपतणियां लड़थड़ती मरती बताई, लिछमी नै गाळियां काढी अर सामंतवाद नै बुरी तरियां भूंडियौ। श्रोतावां माथै काव्य पाठ री सांपरतीक असर निगै आवण लाग्यौ। दीन-दुखी जठै आ कवितावां नै आपरै पीड़ री अभिव्यक्ति समझ’र राजी होवण लाग्या तौ मोटै लोगां रा मूंडा थाप खावण लाग्या। म्हारी निजर बरौबर श्रोतावां माथै ही। ताळियां री गड़गड़ाट सागै पैलडौ दौर खत्म हुयौ।
दूजोड़ै दौर में बारी आयां फेरूं काव्य पाठ सारू ऊभौ हुयौ अर ‘भवर नै नित आवै भटका’ कविता बोलण लाग्यौ तो अेकूकी झड़ माथै वातावरण बदळतौ लखायौ—‘चरका-फरका मांस कठै वे दारू रा गुटका', 'सौ-सौ डावड़ियां कठै गई जो नित कती लटका।' इत्याद झडां माथै सामंती आंख्यां में भैरूं खिवता निंगै आया। आयो-जकां माहौल देख’र कवि सम्मेलन बेगौ इज खतम कर दियौ। मंच सूं नीचै उतरतां ईं म्हारै च्यारूंमेर च्यार पांच जणां घेरौ घाल दियौ और कान में कैयौ—कविराजा फुरती करौ, थांनै टेसण पुगाय दां। अठै रातवासौ लियां मौत खावणी पड़सी अर म्हांरौ काळौ मूंडौ होय जासी। इतराक में अेक कांनी सूं आवाज आई—“कविजी! याद राखजौ इण लखणां सूं तो कोई गोळी मार देसी” म्है हंसनै पडूत्तर दियौ—“कवियां नै मारै जिसी गोलियां हाल बणी कोनीं अर जे कोई नै मारसी तो कविया रै आखरां रा बाण ई मारसी।”
अेक साथी म्हारौ बाहुड़ौ खांच’र अेक कांनी लिजावतां कैयौ—“अठै झौड़ करणौ उचित कोनी आप म्हारै सागै चालौ।” अर म्हनै उठै सूं जावणौ पड़्यौ।
बळतै में पूळौ नांखणौ ठीक कोनीं।
प्रसंग-२
मारवाड़ी सम्मेलन दिक्खण हैदराबाद में कवि सम्मेलन आयोजित कियौ। जोधपुर सूं कीं साथियां सागै कवि रै रूप में म्है ई उठै गयौ। रेल यात्रा में कीं दूजै प्रांत रै जात्रियां रौ साथ हुयौ। बातचीत रै दौरान जद वांनै इण बात री जाण पड़ी के म्हैं मारवाड़ी हां तो वांनै घणौ अचूंभौ हुयौ। वां तो मारवाड़ी रौ दूजौ रूप इज देख्योड़ौ हौ। वे बोल्या—थैं मारवाड़ी हौ तौ थांनै पै’ली श्रेणी में जातरा करणी चाहिजै। लखपति-करोड़पति होय नै म्हां भेळी कियां जातरा करौ? म्है वांनै समझाया के हरेक मारवाड़ी लखपति-करोड़पति कोनीं होवै। मारवाड़ तो धोरा-धरती रौ मुलक है, उठै पीवण रै पाणी रा ई सांसा पड़ै। लखपति करोड़पति तौ आंगळियां माथै गिणै जितरा, बाकी तौ सगळा थांरा भाई-बंध। मारवाड़ निजरां देखलौ तौ थांनै पतियारौ आय जावै।
खैर, सोरा-दोरा किंयां ईं करनै हैदराबाद पूगा। सिंझ्या रा अेक मोटै हाल में कवि सम्मेलन रौ आयोजन हुयौ। आगली पंगत में मोटा-मोटा सेठ साहूकार अर तथा कथित बड़ा आदमी बैठ्या हा अर लारली कानी आम जनता। कवि सम्मेलन सरू हुयौ। म्हारै काव्यपाठ री बारी आयां म्है ‘लिछमी’ अर ‘इंकलाव री आंधी’ कवितावां पढ़ी। आगली पंगत कसमसावती थकी पसवाड़ा फेरती रही अर पाछला लोग आणंद री अनुभूति में ताळियां बजावता रैया।
तीजौ दौर सरू हुयां म्हैं कविता पढी ‘अे’ साहूकार जे चोर नीं तौ जग रा काळा चोर कुण?’ अबकाळै सेठां सूं बात सहन नी हुई अर वै उठ-उठ नै वहीर होवण लाग्या। पण लारै बैटी आम जनता आभौ माथै ले लियौ। मंच माथै बैठ्या अेक सज्जन होळैसीक बोल्या— “क्यूं सामी छाती भाठा बावौ हौ, बेटी का बापां? थांनै इण वास्तै नूंत्या हा के?”
दूजै दिन सेठ समान री सभा हुई। म्हनै ई उठै बुलायौ। सेठां मीठौ ओळमौ देवतां कैयौ—“आप कविराज हौ, आपरी जबान माथै कोई प्रकार रौ बंधण कोनी पण आपनै विचार करणौ हौ के अठै दक्खण में च्यारूं मेर यूं ईं मारवाड़ियां रौ विरोध होय रैयौ है अर जीवणौ ई दोरौ होवण लागौ है। इसी हालत में आपरौ बळतै में पूळौ नांखणौ ठीक कोनीं हौ। अपणायत रै नातै आपनै अरज करी है सो भविष्य में तौ ध्यान रखाईजौ।
गणपतचंदजी भडारी री यादां : राखी रौ गान
प्रसंग-१
सन 1944 रै लगै-टगै री बात। 43 में दीनाजपुर में मारवाड़ी सम्मेलन रौ जल्सौ हुयौ, जिण में मुकुलजी आपरी ‘सैनाणी’ नांव री अमर कविता सुणाय नै वा धाक जमाई के च्यारूंमेर बीं री’ज चरचा होवण लागी। उणीं’ज बरस राजस्थान साहित्य सम्मेलन उदैपुर रौ अेक विसेस अधिवेसन अजमेर में हुयौ। उठै मुकुलजी री आ कविता सुणबा रौ म्हनै ई मौकौ मिळ्यौ। कविता सुणी तौ रूंगटा ऊभा होयग्या अर मन आणंद में मगन होयग्यौ। जीवन में पैली बार आ अनुभूति हुई के काव्यानंद मिनख नै खुद रौ आपौ भुलाय’र किंया ‘मधुमति भूमिका’ में पुगाय देवै। म्हारै मन मे जोधपुर रा साथियां नै मुकुलजी री कवितावां सुणबा री प्रबल इच्छा जागी अर म्हैं वां नै जोधपुर आवण रौ नूंतौ दियौ। वै जोधपुर पधार्या अर म्हारै अठै ई ठैरिया। रात नै गोष्ठी जमी। श्रोतावां में अेक आर्यसमाजी परिवार ई हौ। वां दूजै दिन मुकुलजी नै आपरै घरां नूंत्या। म्हैं दोन्यूं जणा वां रै अठै गया। नास्तै-पाणी पछै कवितावां सुणावण री मीठी मनवार चाली। मोकळी लुगायां भेळी होयगी। मुकुलजी री कवितावां सुण’र मेजबान रो दो मोट्यार बेटियां इतरी प्रभावित हुई के जद वै जावण री इजाजत मांगी तौ वै जोर-जोर सूं रोवण लागी। आपरी साड़ी झाड’र मुकुलजी रै राखी बांधी, पण रोवती ढबै ई नीं। सगळां ई घणी समझाई पण वै तौ समझै इज नीं। म्हैं वहीर हुया तौ औरूं ई जोर सूं रोवण लागी। अजब हालत होयगी मुकुलजी अेक औरूं कविता सुण’र जाणै बळतै में पळौ पड़्यौ। अबै वा नै कुण छुट्टी देवतौ। सेवट आ तौ हुई के मुकुलजी दूजै दिन वां रै घरां ई ठैरसी अर उठै इज जीमसी। मुकुलजी नै वां बैनडियां रौ मन राखणौ इज पड्यौ अर वां नै जोधपुर में अेक दिन वत्तौ रुकणौ पड्यौ।
मंच माथै नोटां री बरसात
प्रसंग-२
आज सूं लगै-टगै तीसेक बरसां पैल री बात। कलकत्तै में मारवाडी सम्मेलन रौ अधिवेसन। लूंठै पंडाळ में कोई 10-15 हजार श्रोतावां रौ जमघट अर मंच माथै राजस्थानी रा 10-12 कवियां सागै प्रमुख उद्योगपित अर वां रा प्रतिनिधि। अध्यक्ष हा बंगाल सरकार रा मंत्री ईश्वरदासजी जालान अर संयोजन चावा समाजसेवी भंवरमलजी सिंधी। म्हैं अेकर पैली ई कलकत्तै जाय आयौ हौ। जोधपुर सूं रेवतदान जी चारण इत्याद पैलड़ी वार म्हारै सागै कलकत्तै चाल्या हा। कवि सम्मेलन रै दूजै दौर में रेवतजी काव्य पाठ सरू कियौ के श्रोतावां कानी सूं वां री ताजी कविता ‘नेहरूजी नै ओळबौ’ सारू मांग आवण लागी, फाग री राग में आ वां री चावी कविता ही अर बी में बिड़लाजी बाबत कीं बोल इण भांत ह’—
मन रै माडै आजादी,
बिड़ला रै पूगी आंगणियै
ठालै-भूलै छींक कीधी
बैरी बामणियै
के सुगन बिगडग्या...
अर
चौकै रै चौमासै महीनै,
चंवरी चढगी आजादी
बूढौ बींद मिळ्यौ बिड़लौ
माडै परणादी
के फेरा दिल्ली में...
कविता सुणतां ईं मंच माथै हा-हू मचगी। हाकौ होवण लाग्यौ—“म्हांरै पईसां सूं म्हांनै इज गाळियां कढावौ, आ बरदास्त नीं होवै!'' कविगण वां नै समझावण लाग्या तौ हाथा-पाई री नौवत आयगी। जैपुर रा कवि इँदुशेखरजी रौ तौ कमीज ई लीरमलीर होयग्यौ।
सभापति रेवतजी नै सलाह दीवी के बे माईक माथै इण बात नै स्पष्ट कर दे के कविता में ‘बिड़ला’ सबद व्यक्तिगत नीं होय’र पूंजीपतियां रौ प्रतीक है। रैवतजी पाछौ माईक थाम्यौ तौ श्रोता समझ्या के यांरै कनै माफी मंगावै दीसै। पछै तौ कुण कैवै ब्याव भूंडौ। पंडाळ में जोर कौ हाकी होवण लागयौ—“मत मांगौ माफी! ठुकराय दो इण पूंजीपतिया रा पईसा नै!” अर श्रोता मंच माथै सिक्का फैंकण लाग्या। देखतां-देखतां रुपियां री बरसात होयगी अब वां नै कुण रोकै अर कुण समझावै।
सेवट रेवतजी बात स्पष्ट करी अर पूरी कविता सुणाई तौ ताळियां री गड़गड़ाट सूं आभौ गूंजण लाग्यौ। कवि सम्मेलन तो जम्यौ तौ पछै वौ जम्यौ के क्यूं पूछौ बात।
दूजै दिन सेठां रा दो अेक प्रतिनिधि म्हांनै मिळ्या अर कैयौ के म्है तौ रेवतजी माथै मानहानि रौ दावौ करस्यां। म्हे कैया आप जरूर करौ रेवतजी तौ समाजवादी दळ रा छेत्रीय मंत्री है। इणसूं वांरौ तो प्रचार ई होसी। वे चुप होयग्या। इण पछै सुबै सूं लगाय नै रात रा दस बज्या तांईं ठौड़-ठौड़ कवि गोष्ठियां हुई अर सब जगै रेवतजी वा ई कविता बार-बार सुणाई।
लक्ष्मणसिंघजी रसवंत जबरा ई फंस्या
प्रसंग-१
खासा बरसां पैली रूपायन संस्थान बोरूंदा ई बंबई महानगरी में कवि सम्मेलन आयोजित कियौ। न्यूंतौ मिळ्यां बंबंई सेंट्रल रेल्वे टेसण माथै उतर्यौ तौ संयोजन श्री सत्यप्रकाश जोशी रौ पतौ- ठिकाणौ भूलग्यौ। अेक कागदियै माथै लिख राख्यौ हौ, पण वो कागद गुमग्यौ। टैक्सी वाळै नै कैयौ—“भाया, कोई चोखैसीक होटल में ले चाल।” वो म्हनै जिण होटल में लेयग्यौ वीं रौ नांव हो-'रामभरोसै हिंदू होटल।' रातवासौ उठै लेवणौ ई हौ। पण रात पड़तां ई बीं होटल रौ खाकौ देख्यौ तौ घणौ अचूंभौ हुयौ। च्यारूंमेर सुरा-सुंदरी रौ वातावरण, होटल रौ मालिक ई अेक गुंडा टाईप आदमी हौ अर वीं री सगळी हरकतां काबिले-गौर ही। मन में सोच्यौ जबरा फंस्या। पण अबै हेम्मत हार हुयां कियां पार पड़णौ।
थोड़ीक ताळ में होटल रौ मालिक म्हारै कनै आयौ अर कैवण लाग्यौ— अठै चोरी-चपाटी रौ डर घणौ है, इण वास्तै वांरै कनै कीं जोखमी चीज होवै तौ दफ्तर में जमा कराय दो, नीं तौ पछै कीं होयग्यौ तौ होटल बीं रौ जिम्मेवार नीं है। म्हैं वीं री मंसा समझग्यौ। मन में सोच्यौ अबै तौ हिम्मत अर हुंस्यारी ई काम आसी। म्हैं वीं नै कैयौ—“भाया, म्हारै कनै कीं जोखम कै नगदी कोनीं। कीमती चीज फगत अेक है, अर वा है पांच राउंड री भरियोड़ी पिस्तौल। वा आपरी हिफाजत खुद ई कर लेसी। म्हूं राजस्थान रौ वासी राजपूत हूं अर खुद री रक्षा करणी आछी तरियां जाणूं। म्हारी कड़क अर रौबदार आवाज रौ मैनेजर माथै पूरौ असर पड़्यौ अर वौ चुपचाप रवानै होयग्यौ।” बीं रै गयां पछै म्हारी अटेची फेरूं नेहचै सूं संभाळी तौ सत्यप्रकाशजी रौ ठिकाणौ लाधग्यौ। म्हैं लारै जाय’र जोशीजी नै फोन कियौ। पनरै बीसेक मिनट में गाडी आयगी। जद वां नै सगळी घटना सुणाई तौ वै खूब हंस्या अर कैवण लाग्या जबरा ई फंस्या।
कवि के खिलाड़ी?
प्रसंग-२
सन् 1955 री बात। म्हैं बीं वखत मेड़ता में अध्यापक हौ। राजस्थानी कवितावां लिखण रै सागै म्है वालीबाल रौ ई ठीक-ठाक खिलाडी हौ। नागौर रै पशु मेळै में हर बरस नागौर अर मेड़ता री टीमां रौ मैच होवतौ। इण वास्तै घणखरा लोग म्हनै खिलाड़ी रै रूप में ईं ओळखता।
बीं बरस सांतरौ मैच हुयौ अर दोन्यूं टीमां रै बिचाळै थोड़ी तणातणी होयगी। बीं रात मेळै में कवि सम्मेलन ई हौ, जिण में म्हनै ई भाग लेवणौ हौ। म्हैं कवियां भेळौ मंच माथै जाय’र बैठग्यौ। कवि सम्मेलन रा संयोजन श्री रामकृष्णजी कल्ला नागौर रा मानीता वकील हा। वां म्हनै मंच माथै बैठौ देख्यौ तौ नेड़ै आय नै कान में कैयौ “ओ मंच तौ कवियां वास्तै है, श्रोतावां रै बैठण री व्यवस्था तौ नीचै जाजम माथै है!” म्हैं कैयौ—“म्हैं ईं कवि हूं अर न्यूत्योड़ौ आयौ हूं।” वै बोल्या—“आप चुपचाप नीचै उतरौ के पुलिस नै बुलावूं?” म्हैं समझग्यौ के वै भूल सूं आ बात कैय रैया है। सो म्हैं जाय’र नीचै श्रोतावां भेळौ बैठग्यौ।
कवि सम्मेलन सरू हुयौ। म्हारी बारी आयां नांव री घोषणा हुई। म्हूं उठनै मंच माथै पूगौ तौ संयोजकजी नै आपरी भूल रौ अेहसास हुयौ। म्हारी कविता ‘बाड़ खेत नै खाय’ श्रोतावां माथै इसौ रंग जमायौ के ताळियां सूं वातावरण गूंजण लाग्यौ अर ‘वंस-मोर’-‘वंस-मोर’ री आवाजां च्यारूंमेर सूं आवण लागी। कविता दो-तीन बार सुणावणी पडी। अध्यक्ष कानी सूं आवाज आई—इसा सांतरा कवि नै इत्ती देर कठै छिपाय नै राख्यौ हौ?
म्हैं कविता-पाठ करनै पाछौ श्रोतावां भेळौ बैठण सारू जावण लाग्यौ के संयोजक जी म्हनै छाती रै चेपतां थकां मन सूं माफी मांगी अर कैयौ—म्हनै आपरौ खेल रै मैदान वाळौ रूप ई ध्यान में हौ। आ कल्पना ई नीं ही के अेक खिलाड़ी इतरौ सांतरौ कवि ई होय सकै।
बड़ौ बड़ाई नीं तजै
प्रसंग-४
बूंदी में महाकवि सूर्यमल्ल मीसण रौ जनमशती समारोह हौ। बीं मौकै राजस्थानी कवि सम्मेलन राखीज्यौ। म्हनै ई न्यूंतौ मिळ्यौ, बृजसुंदरजी शर्मा लिख्यौ के म्हैं जरूर पूगूं।
वखतसर कवि सम्मेलन सरू हुयौ। म्हैं कवियां भेळौ मंच माथै ई बैठौ हौ। पैलड़ौ दौर खतम हुयौ अर दूजौ दौर सरू हुयौ। नवा-जूना सगळा कवियां काव्य-पाठ कर लियौ, पण म्हारौ कठै ई नांव नीं आयौ।
म्हैं मंच सूं उठ’र जाजम माथै नीची श्रोतावां भेळौ बैठग्यौ। जितरै अेक वयोवृद्ध कविजी री निजर म्हारै माथै पड़ी अर उणां बात नै ताड़ ली। उणां संयोजकजी सूं बात करी। जद शर्माजी नै इण बात री ठा पड़ी तौ उणां घणै प्रेम सूं म्हनै आपरै कनै बुलायौ अर संयोजकजी सूं हुई इण भूल सारू माफी मांगी। काव्य-पाठ ठीक जम्यौ श्रोतावां रै आग्रह रै कारण म्हनै दो तीन रचनावां बोलणी पड़ी।
मंच माथै डा. रघुवीरसिंघजी सीतामऊ ई बिराज्या हा। वां म्हारी पीठ थापोटी अर कनै बैठ्या शिवचरणजी माथुर (तत्कालीन शिक्षामंत्री) नै कैयौ के आ आपरै विभाग री’ज उपज है। माथुर सा ई म्हारै कवितावां री सरावणा करी। म्हारी सगळी कवितावां सत्ता रै खिलाफ ही, पण इण सज्जनां री उदारता देख’र म्हारौ मन सिरधा सूं भरीजग्यौ। सोचण लाग्यौ ‘बड़ौ बड़ाई नीं तजै।'