डेढ दशक पैली कोई आ कल्पना भी नीं कर सकतौ के पर्यावरण प्रदूषण री समस्या मानव जाति रै अस्तित्व सारू तीन बडा खतरां में सूं अेक हो जासी। दूजा दोय बडा खतरा है—जुद्ध अर गरीबी। जे गहराई सूं देख्यौ जाय तो जुद्ध रौ खतरौ इतरौ गंभीर कोनी क्यूंकै आणविक शस्त्रां रौ जखीरौ राखण आळी महाशक्तियां वांरा विनाशकारी परिणाम जाणै अर वांरौ उपयोग करण सूं पैली वांनै खुद रै भविष्य री भी चिंता रैवै। इणी भांत गरीबी सूं भी त्रस्त सगळी दुनियां कोनी। अर केई लोगां रौ दावौ है के जे सुरक्षा मांय होवण आळौ भारी खरचौ कम कर दियौ जावै तो गरीबी मिटावणौ कोई समस्या कोनी रैय जावै। पण प्रदूषण तो अमीर अर गरीब सगळा देसां री समस्या है। मोटै तौर माथै उद्योग प्रधान धनी देसां री पर्यावरण प्रदूषण री मुख्य समस्या वायु प्रदूषण री है। इणसूं फगत आदमियां रै जीवणं सारू ई नीं, बल्कि प्राणी मात्र रै वास्तै खतरो पैदा होयगौ है। उद्योग प्रधान देसां में जका विकास रै सिखर माथै ऊभा है—पेड़ पौधां रौ जीवण तेजाबी बिरखा री वजह सूं संकट में है। सरूपोत आ बात मानीजती के तेजाबी बिरखा रौ कारण पड़ौसी देसां सूं आवण वाळी जहरीली गैसां है, पण अबै औ साबित होयगौ के हरेक देस खुद रै अठै ई जहरीली गैसां पैदा कर लेवै। तेजाबी बिरखा सारू तेजी सूं दौड़ती बहुसंख्य मोटर-कारां, जकां री संख्या केई देसां में प्रति दोय व्यक्ति रै लारै अेक है—मुख्यरूप सूं उत्तरदायी है। तेजाबी बिरखा सूं पुराणा जंगळ ई नष्ट कोनी होया, बल्कि मिट्टी रै तेजाबीकरण रै कारण नई उगण आळी वनस्पति नै ई परेसानी होसी।
आ झीलां री मौत रौ कारण भी बणी है। सबसूं ज्यादा प्रभावित स्वीडन है। जठै रै वन विशेषज्ञ रिमरोड़ वौंवी विश्व-वन कांग्रेस में कह्यौ के ‘म्हांरौ सामूहिक भविष्य दांव माथै है।’
वायु प्रदूषण रै मानव स्वास्थ्य माथै पड़ण आळै मारक प्रभाव रौ नमूनौ पश्चिमी बर्लिन में टाबरां री 'स्यूडो कूप' बीमारी है। जटै सरदियां रा दिनां में दूषित वायु कीं स्थानां माथै इत्ती घनीभूत होय जावै के बरदाश्त कोनी करीजै।
वायु प्रदूषण रा प्रकट कारणां में कारखाना सूं निकळण आळी रसायन-युक्त गैसा तो है ई, वांरै बारै मे औ दावौ ई करियौ जावै के तकनीकी उपायां सू वां माथै नियन्त्रण पाय लियौ है। फेरूं ई बगत-बगत मांय भोपाळ अर चेरनोबिल जैड़ी दुर्घटनावां होवती ई रैवै।
भारत अर दूजा कृषि प्रधान देसां में पर्यावरण री मुख्य समस्यावां है—जळ स्त्रोतां रौ सूखणौ अर मिट्टी रौ क्षरण। बिरखा अर आंधी रै कारण मिट्टी रौ क्षरण आज इतरौ भयावह है के भारत में आयै बरस 6 सौ करोड़ टन मिट्टी रौ क्षरण होवै। इणरै साथै 6 सौ करोड़ रुपियां री लागत रा उर्वरक ई चल्या जावै। अेक बार गयोड़ी उपजाऊ मिट्टी सदा सारू चली जावै।
मिट्टी रौ क्षरण हौळै-हौळै होवै, इण वास्तै उणरौ प्रभाव अेकाअेक कोनी दीखै। पण जमीं रौ उपजाऊपण जद घटण लागै तो लोग उखड़णा शुरू होय जावै। पहाड़ी अर सूखी खेती वाळा छेत्रां में औ ज्यादा स्पष्ट निगै आवै। मिट्टी रै क्षरण सूं ई ज्यादा पाणी रौ संकट आपां रै देश री तात्कालिक समस्या है। कुछ छेत्रां में अनाज री उपज ठीक होवण री वजह सूं अनाज पुगावणौ कठिन कोनी होवै, पण जद पाणी रा स्रोत ई सूख जावै तो मिनखां अर दाव-ढांढां पाणी पुगावणौ बेढब समस्या होय जावै। भारत रा केई प्रदेसां में लारला दोय बरस सूं सूखौ पड़ै। गुजरात में तो विशेष रेल गाडियां सूं पाणी पुगाइज्यौ अर दक्षिण में हैदराबाद जैड़ा नगरां में पाणी रौ राशनिंग करणौ पड़ियौ।
पाणी रै स्रोतां रौ सूखणौ कोई आकस्मिक घटना कोनी। औ तो आपां री वां विकास नितियां रौ नतीजौ है के ज्यां नै अपणाय’र आपां अनाज अर दूजी चीजां रौ उत्पादन तो बधाय लियौ पण औ भूलगा के तात्कालिक लाभ रै सारू स्थायी पूंजी रौ नाश कर्यौ हां। महाराष्ट्र में गन्नै री खेती इणरौ ज्वलंत प्रमाण है। भूमिगत जळ सूं गन्नै री फसल तो खूब होयगी पण बेरां रौ पाणी पताळां चल्यौ गयौ। अब वठै गन्नै री खेती अर मिनख री जरूरतां में सीधी लड़ाई चाल पड़ी। इणी भांत सिंचाई कर तुरंत लागण आळा युक्लिप्टिस अर बबूल जैड़ी बिरछ प्रजातियां नै प्रोत्साहन दिरीज रह्यौ है। राजस्थान रै बीकानेर जैड़ै रेगिस्तानी छेत्र में ऊंटगाडियां में पाणी लाद’र ल्यावै अर युक्लिप्टिस री सिंचाई करै।
मिट्टी रै क्षरण अर पाणी रै अभाव रौ विश्वव्यापी कारण वनां री तबाही है। व्यापार रै सारू वनां री कटाई रै अलावा खेती रै विस्तार रौ कारण दूजौ रह्यौ है। पण बौत कम लोग जाणै के प्राकृतिक वनां नै उजाड़’र वांरी ठौड़ अेक ई भांत रा पेड़ लगाईजै तो केई वळा उणरा ई खोटा नतीजा निकळै। अेक ई जात रा पेड़ धरती सूं अेक ई भांत रौ पोषक तत्व लेवै अर केई अैड़ा विरछ है जका आपरै नीचै कीं कोनी पनपण देवै। इणी भांत खनन, भूक्षरण अर पाणी रा स्रोतां रै सूखण रौ सबसूं बडौ कारण है। आ बात दून री घाटी में लारला अड़तीस बरसां सूं चूनै रौ खनन होवण सूं पतौ चाली। खनन रा छेत्रां में धरती रै ऊपर ऊभा पेड़ां री बजाय वांरै नीचै दबियोड़ै खनिज नै महताऊ मान्यौ जावै। राजस्थान जैड़ै सबसूं कम वन-छेत्र वाळै राज्य में खनन वन विनाश रौ अेक खास कारण है। इणरै सारू राज्य सरकार री तरफ सूं दियोड़ी स्वीकृति आत्मघाती है।
प्राय: आ बात कहीजै के पर्यावरण प्रदूषण रै वास्तै लोगां रौ अज्ञान उत्तरदायी है, पण किणरौ अज्ञान? कांई सामान्य लोगां सूं ज्यादा तथाकथित जागृत अर सुविज्ञ लोगां रौ अज्ञान उत्तरदायी है, जका विकास री रणनीति बणावै। यूरोप में औद्योगिक कान्ति रै पछै जलमी भोगवादी सभ्यता आज सगली दुनियां माथै राज करै। जिण सभ्यता री मान्यता है के जिण व्यक्ति के समाज कनै उपभोग री ज्यादा सूं ज्यादा चीजां है, वो ई सबसूं बेसी विकसित समझ्यौ जासी।
आ भोग री चीजां री प्राप्ति रौ अेक ई साधन है—प्रकृति रा भण्डार। विज्ञान अर तकनीकी री दिशा आं ई भंडारां नै नयै सूं नया तरीका लगा’र खाली करण री है। क्रांति मिनख रै सोचण-समझण में दोय बदळाव करिया। पैलौ प्रकृति अेक वस्तु है अर मिनख उणरौ धणी है। दूजौ समाज फगत मानवां रौ है।
जद प्रकृति फगत वस्तु बण जावै तो मिनख रौ उणरै साथै रिश्तौ बदळ जावै। वो उणरौ धणी अर क्रूर-शोषक बण जावै। इणी भांत समाज जद कोरौ मिनखां रौ बण जावै तो दूजा जीवधारियां रै जीवण री कोई चिंता कोनी रैवै। औ ई कारण है के आज आपां री धरती लारला सौ सालां रै मुकाबलै में साधनां अर जीवधारियां री संख्या में ज्यादा गरीब है... ज्यूं-ज्यूं भौतिक विकास री गति बधियां जावै आ गरीबी और बढण लागै।
भौतिक प्रगति रै शिखर माथै पूगियोड़ा देसां इण गरीबी नै पूरी दुनियां में फैलाय दी है। अब वै प्रदूषण अर साधनां रै हनन रै बारै में सतर्क होयगा है। इण वास्तै वांरै कनै अेक सूत्री कार्यकम रैयगौ है के इण प्रदूषण नै अविकसित देसां में निर्यात करौ अर वठै रा प्राकृतिक साधनां रौ—जकां में मिट्टी भी शामिल है—बिना रोकटोक शोषण करौ। इण वास्तै पर्यावरण रक्षा री चेतना रौ सबसूं बडौ कार्यकम है इण योगवादी सभ्यता रौ विनासयुक्त विकास रै खिलाफ जिहाद छेड़णौ। इणरा दोय स्वरूप होसी। अेक पसवाड़ै तो इणरै विनासकारी स्वरूप नै समझणौ अर दूजै पसवाड़ै खरै विकास रौ मारग अपणावणौ।
दुनियां में सगळी प्राचीन संस्कृतियां रौ आधार मिनख रौ प्रकृति साथै प्रेम अर आदर रौ रिश्तौ रह्यौ है। इण में सूं ई पेड़, पहाड़, नदी अर अठै तांई के अवतार रै रूप में मनुष्येतर प्राणियां री पूजा री परम्परा कायम हुई। भोगवादी सभ्यता रौ पैलौ हमलौ इण माथै होयौ। भारत आपरी आध्यात्मिक भूमिका रै कारण इण प्रहार नै सहग्यौ। अर आपरा सांस्कृतिक मूल्यां नै कायम राख लिया। भारत री संस्कृति रौ जलम अर पोषण अरण्यां में होयौ। अर इण संस्कृति प्रकृति में सब ठौड़ जीवन दर्शन, जीवण रै प्रति आदर पूजा री भावना राखी अर सादगी अर संयम री प्रतिष्ठा करी।
संस्कृति रौ जलम ई प्रकृति रै सुसंस्कार सूं उण बगत होवै जद मिनख खुद रै जीवण नै ज्यादा सुखी ज्यादा शांतिपूर्ण अर दूजा जीवधारियां रै कल्याण सारू प्रकृति रौ विज्ञान री मदद सूं सुसंस्कार करै। इणरै खिलाफ जद वो भोग रै सारू प्रकृति रौ शोषण करै तो उणसूं विकृति पैदा होवै। भोगवाद विकृति पैदा करै।
जद जद लोग सुसंस्कृत जीवण रै इण महान संदेश नै भूलण लागै तद-तद याद दिरावण नै महान शिक्षक पैदा होवै। वे सामान्य लोगां में सूं हा, जका खुद रै युग री सब अबखायां में सूं नीसर्या। जांभोजी महाराज इणी भांत री विभूति हा, जका भारत रै इतिहास में ‘संतयुग’ में पैदा हुया। भारतीय संस्कृति री विरासत वांरै कनै ही। सूखै अर अकाळ सूं लोगां नै कीकर मुक्ति मिळै। चिंतन रै पछै वे इण नतीजै माथै पूग्या के अैड़ी हालत रै वास्तै जिम्मेदार तो मिनख रौ प्रकृति रै साथै बलात्कार है। इण रै सारू वै सदव्यवहार रौ मारग ई बणाय दियौ के हरौ दरखत नहीं काटणौ, पशु-पक्षी नहीं मारणा। जांभौजी सीधा साधारण लोगां रै मन तांई पूगा।
इणी भांत गांधीजी दुनियां री दूजी संस्कृतियां री ज्यूं भारत री संस्कृति नै भोगवादी हमलै सूं बचायली। वे इण सभ्यता माथै प्रहार करता होया जीवण री अैड़ी शैली कायम करण री तजबीज बताई जिणसूं मिनख री जरूरतां उणरै आसै-पासै सूं ई पूरी होय जावै। उणनै भीमकाय कळ-कारखानां नीं पैदा करणा पड़ै।
आपां रै सामी पर्यावरण री राक्षसी समस्यावां रौ अेक ई उत्तर है अर वो है वन-वन... औ पेड़ां रौ अेक समूह मात्र कोनी बल्कि अेक जीवंत समुदाय है। जिण में विविध प्रजाति अर हर उमर रा पेड़, वनस्पति, वन्य-जंतु इत्याद है। इण भांत रह्या-सह्या वनां रै संरक्षण अर संवरधण सूं ई भारत रै जळसंकट अर भूक्षरण री समस्यावां रौ समाधान होसी।