[‘तूफानी हिंदू’ अर ‘हिंदू नेपोलियन’ जिसा इधका विशेषणां सूं विभूषित स्वामी विवेकानंद रौ नाम लेवतां ई अेक अैड़ी तेजस्वी मूरत आंख्यां सामी आवै, जिण मायड़-भोम री सेवा नै सै सूं ऊंचौ धरम बतायौ। जद देश में अंगांई नबळाई वापरण सूं आत्मगौरव कपूर रै ज्यूं उड़ग्यौ हो, उण अबखी पुळ में वे देशवासियां नै माथौ ऊंचौ करनै चालणौ सिखायौ। पण वांरै इण अजरा अमर काम रै अथ सूं इति तांई राजस्थान रौ कैड़ौ लांठौ पीठबळ रैयौ, इणरी जाणकारी लोगां नै नीं रै बरौबर है। स्वामीजी री जै-जै कार करती वखत उण पुण्यात्मा अर धोरा धरती रौ कितराक लोगां नै ध्यान आवै ,जिणांरै पुत्र प्रताप सूं विवेकानंदजी हिमाळा री ऊंचाई तांई पूगा। इण लेख रौ मकसद इण तथ्य नै उजागर करणौ है।]
आपरा गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस रै देवलोक हुयां पछै स्वामीजी रमता जोगी बणनै आत्मबोध अर राष्ट्रबोध जिसा ऊरधमुखी कामां री हूस हिवड़ै लियां छ: बरसां तांई सगळै भारत रौ भ्रमण करता रैया। रमता राम नै भांत-भांत रा अनुभव हुया। ठौड़-ठौड़ संत महात्मावां सूं ज्ञानचर्चा, तीरथां रा दरसण, शास्त्रां रौ पारायण अर कठण जपतप इण बोधयात्रा री खास खूबियां रैयी।
इण भ्रमण में भमता-भमता वे माऊंट-आबू पूगा। उठै सताजोग सूं वांरी भेंट खेतड़ी नरेश अजीतसिंहजी सूं हुई। आ भेंट कांई ही, जाणै सिद्ध नै साधक री जोड़ी बणगी। स्वामीजी रै महत ध्येय नै पूरौ करण खातर वे राम रा हड़मान बणग्या। यूं तो खेतड़ी राजस्थान री नैनीसी'क रियासता ही पण उठारा गुणनिधान शासक बीं रौ नाम दीपायौ। उदार मना, प्रबुद्ध अर मिनखां रा पारखू अजीतसिंहजी रा दरबार में गुणीजनां नै ओपतौ आदरमान मिळतौ।
माऊंट आबू माथै स्वामीजी री राजाजी सूं भेट रौ वर्णन वांरी प्रामाणिक जीवनी ‘द लाइफ आफ स्वामी विवेकानंद बाई हिज ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल्स’ में मिळै। आबू री अेक गुफा में साधना करता स्वामी जी री मुळाकात अेक रजवाड़ा रा वकील सूं हुई। वे इण तेजस्वी सन्यासी रा भावीक बणग्या। उणां खेतड़ी रा दीवाण मुंशी जगमोहनलाल आगळ स्वामीजी री बात काढी। पछै मुंशीजी रा मूंडा सूं स्वामीजी रा वखाण सुणनै राजाजी वा सूं मिळण नै आखता हुयग्या। स्वामीजी नै जद इणरी ठा पड़ी तो वे खुद चलायनै उणांसूं मिळण नै खेतड़ी हाऊस गया, जठै वांरी मोत्यां मूंघी मनवार हुई। आं महान आत्मावां री इण भांत पैली भेंट 4 जून 1891 नै हुयी।
पैली मुलाकात में ई नरेश री पारखी नजर स्वामीजी में छिप्यौड़ी प्रतिभा अर तेज नै पिछाण लियौ। अेक वैरागी अर दूजो राजवी—पण हिवड़ा री वीणा ने संगीत रा सुर अेक जिसा। इण खातर अजीतसिंहजी आबू सूं खेतड़ी व्हीर होवती टेम स्वामीजी नै सागै चालण री घणी मनवार कीधी, राजाजी रौ निर्मळ प्रेम अर भक्ति देखनै वांनै हूंकारौ भरणौ पड़्यौ।
खेतड़ी रियासत रा वाकयात नवीसां री लिख्यौड़ी बहियां सूं स्वामीजी रै खेतड़ी प्रवास रौ प्रामाणिक वर्णन मिळै। इण बहियां में स्वामीजी री राजाजी सूं मुलाकातां अर बात बंतळ मोकळी बातां इन्द्राज कीधौड़ी है। स्वामीजी पांच महीनां तांई खेतड़ी में मुकाम कीधौ। उठा सूं जुड़्योड़ा निरा ई इसा प्रसंग है, जिकौ इण बात री साख भरै के राजस्थान री माटी रा बेटा अजीतसिहजौ रै सपूतपणै सूं देश अर हिंदू धरम नै विवेकानंदजी जिसौ जोगौ अर नामी सेवक मिळ्यौ। खेतड़ी में स्वामीजी आपरौ विख्ताय नाम धारण कीधौ। खुद नै अज्ञात राखण सारू भारतखंड रौ भ्रमण करती वखत वे न्यारा-न्यारा नाम सूं आपरी ओळखाण देवता। कदैई सच्चिदानंद तो कदैई विविदिषानंद। खेतड़ी नरेश वांनै अमरीका सिधावण रै मौके विवेकानंद नाम राखण रौ सुझाव दीधौ। चावा फ्रांसीसी चिंतक रोमारोलां री पोथी ‘लाइफ एंड गोस्पेल ऑफ विवेकानंद’ (पृ.8) पं. झाबरमल्लजी शर्मा री कृति ‘खेतड़ी नरेश और विवेकानंद’ (पृ. 10-11), स्वामी गंभीरानंद री पुस्तक ‘द अेपोसल्स ऑफ श्री रामकृष्ण’ (पृ. 38-39) में इणीज बात री ताईद हुई है। ‘इस्टर्न अर वेस्टर्न डिसाइपल्स’ ई आ बात लिखी है कि स्वामीजी खेतड़ी राजाजी रै आग्रह सूं ई विवेकानंद नाम धारण कीधौ।
स्वामीजी आपरी पोशाक रौ खास अंग साफौ अजीतसिंहजी री सलाह अर मार्गदर्शन सूं ई बांधणौ सरू कीधौ। वे खेतड़ी रा राजपंडित नारायणदासजी सूं पतंजलि रै महाभाष्यम् रौ अध्ययन कीधौ। स्वामीजी उणां नै गुरूजी संबोधन सूं ई बतळावता। सै सूं सिरै बात आ के खेतड़ी ई वां रै वास्तै बोधिस्थळ बण्यौ। सृष्टि रा सगळा प्राणियां सूं अेकत्व अर समसंबुद्ध भाव उठै ई जागृत हुयौ। खेतड़ी दरबार री अेक नर्तकी रा गायौड़ा भजन सूं (प्रभु मेरे औगुन चित न धरौ) वां नै ओ बोध हुयौ।
आ घणै रंज री बात के स्वामीजी रा सगळा भारतीय जीवणी लेखक इण बात री गिनरत ई कीनी कीधी के विश्व धर्म महासभा में वांनै भेजण में अतीजसिंह कितरौ लांठौ योगदान दीधौ। स्वामीजी जद मद्रास में आपरी आ मंशा प्रकट कीवी, तो उठै वांरा चेलाचांटी इण काम वास्तै नीठ पांच सौ रु. टीपणी सूं भेळा कीधा। इतरी मामूली रकम सूं कांई होवतौ? स्वामीजी कह्यौ—ओ पइसौ गरीब गुरबां में बांट दो। अमरीका जावण खातर रकम अर दूजी सगळी बातां री जोगवाई खेतड़ी में हुयी। मद्रास में चंदा सूं भेळी हुयौड़ी साव मामूली रकम तथा मैसूर अर रामनाडु रा राजावां री फगत फरफरी बातां अर अेन मौकै पाणी में बैठण सूं स्वामी घणा निराश हुया।
अठीनै खेतड़ी नरेश रै दो बायां पछै कुंवर रौ जलम होवण सूं वांरी अंतस सूं अभिलाषा ही के स्वामीजी जन्मोत्सव में पधारनै टाबर नै आशीर्वाद देवै। स्वामीजी रै मद्रास में होवण रो वावड़ मिळतां ई वे आपरा दीवाण नै वां नै खेतड़ी तेड़ण खातर भेज्यौ। स्वामीजी रौ कांई मन हो, पण मुंशीजी रा नोहरा अर अमरीका जात्रा वास्तै खेतड़ी पूगां पछै सगळी व्यवस्था रौ वायदौ करण सूं वे उठै गया। वाकयात रजिस्टर रै मुजब वे 21 अप्रैल सूं 10 मई तांई खेतड़ी मे ठैर्या। पछै अमरीका जावण वास्तै व्हीर हुयग्या। इण यात्रा खातर स्वामीजी नै पेला दरजा रौ टिकट (तीन हजार रु. रौ) अर खासी भली नकद रकम खेतड़ी राजाजी नजर कीधी। दीवाण ठेठ बंबई तक वांनै पूगावण नै गया। खरची वास्तै रकम ट्रेवल अेजंट टॉमस कुक अेंड संस रै मार्फत सर्कुलर नोटां में तब्दील करनै भेंट करीजी। पण सताजोग सूं अे नोट गुमग्या। जद राजाजी नै आ बात ठा पडी तो वे तुरत टॉमस कुक नै तार देयनै स्वामी जी नै पांच सौ रु. केबल सूं भेजण री ताकीद कीधी। परदेस में नोट गुम जावण री अबखी पुळ में अजीतसिंहजी वां री सगळी चिंता मेट दी। पुळ में।
अमरीका पूग्यां पछै स्वामीजी री खेतड़ी नरेश सूं बराबर चिट्ठी पतरी होवती रैयी। राजाजी वां री रवानगी जरूरतां पूरी करण खातर भांत-भांत री चीजां रा पार्सल टेमो-टेम मेलबौ करता। 4 मार्च 1895 नै वे अेक खास दरबार करनै स्वामीजी नै अमरीका में कीधौड़ै नामी काम वास्तै घणा रंग दीधा। आपरा गुरुदेव रौ संदेश संसार में फैलावण रौ स्वामीजी रौ मनचिंतवियौ काम अजीतसिंहजी रा पीठबळ सूं ई पार पड़्यौ। मुंशी जगमोहनलाल रै नाम 11 अक्टूबर 1897 नै लिख्यौड़ी चिट्ठी में स्वामीजी खुद लिख्यौ— ''म्हैं अर अजीतसिंह जी संसार री भलाई रा महान काम में अेक दूजा री मदद खातर जलम्योड़ी आत्मावां हां। म्हैं दोनूं अेक दूजा रा पूरक अर सहयोगी हां।'' बैनड़ निवेदिता रै नाम 23 जुलाई 1897 नै लिख्यौड़ी चिट्ठी में वे उणां नै ‘म्हारा सर्वोत्तम कार्यकतावां मांय सूं अेक’ रौ अभिधान दीधौ अर कह्यौ—''वे म्हारा मिशन में घणा मददगार होसी, इण में कोई शक कोनीं।''
स्वामीजी रै वास्तै राजाजी री श्रद्धाभक्ति रौ दरियौ अथाग हो। इणरौ प्रमाण इण बात सूं मिळै के जद वांनै आ ठा पड़ी के स्वामीजी री परिव्राजक अवस्था (रमता जोगी) में अेक मोची वां री सेवा कीधी ही (तीन दिनां सूं निरणा नै भोजन करायौ) तो बीं नै बुलाय नै जागीर बख्श दी।
स्वामीजी काळजा री कोर सूं मायड़ भोम रा पुजारी हा पण संन्यासी बण्यां पछै ई आपरी मावड़ वास्तै उणां रौ प्रेमभाव अचळ रह्यौ। अजीतसिंहजी इण वास्तै स्वामीजी री प्रेम डोर सूं बंध्यौ पछै वांरै पूर्वाश्रम रै सगा व्हालां री जिम्मेदारी खुशी खुशी ओढ़ी। वे अंतस सूं चावता के स्वामी जी अमरीका जावै। पण वांनै आ ई ठा ही के वांरै मन में लारली कोई बात री चिंता फिकर नीं रह्यां ई ओ मिशन ढंग सूं पार पड़ैला। इण खातर वे स्वामीजी रा माताश्री नै सौ रुपिया हर महीनै भेजण री व्यवस्था तुरत कीधी।
इण बाबत स्वामी रामकृष्णानंद राजा जी नै 13 जून 1893 नै लिख्यौड़ी चिट्ठी में लिख्यौ—''म्हनै इण बात री घणी खुशी है के आप श्री नै स्वामी विवेकानंद रै सगां व्हाला री इतरी काळजो है। म्हनै पक्कौ धीजौ है के अबै वांरी तकलीफां मिट जासी। स्वामी शिवानंद री 20 जुलाई 1893 री चिट्ठी इण बात री साख भरै के अजीतसिंह जी स्वामी रै पूर्वाश्रम रै घरू मामलां रौ कितरौ ध्यान राखता।
राजाजी रै नाम 22 नवंबर 1818 नै लिख्यौड़ी चिट्ठी में विवेकानंदजी इण भांत आपरै मन री बात कैयी—''आपरै सामी मन री बात कैवतां म्हूं रत्तीभर ई कोनीं संकीजूं। इण जुवाजूण में म्है फगत आपनै ई म्हारा मित्र अर बंधु मानूं।'' उण दिनां स्वामीजी री तबियत अंगांई नरम चालती। वीं रौ जिक्र करनै आगै लिख्यौ—''म्है म्हारा मातुश्री रै सागै रैवणौ अर छोटोड़ा भाई रौ ब्याव करणो चावूं, जिणसूं वंश री वेलड़ी लीली रैवै। म्हारी आ ई चावना है के माताजी वास्तै नैनोसी'क घर बणाय दूं। आपनै छोड़ नै इण बाबत दूजा नै किणनै अरज करूं? विलायत में भेळौ हुयोड़ौ पईसौ तो मायड़ भोम रै काम वास्तै हो अर बीं री पाई-पाई उण में नेक लागगी है। म्हारा घरू मामलां में सगळी बातां म्हैं आपरै सामी खोलनै राख दी है। म्हैं काठौ कायौ हुयग्यौ हूं, डील म्हारौ जाए थाकौ है अर म्हारौ अंतकाळ नेड़ौ है। म्हारी आपनै आ अरज है के म्हारै ऊपर छेली मेहरबानी कराईजौ। आप श्री री कृपा सूं म्हारौ पाछेपौ सुधर जासी।
हिया री आ वराळ स्वामीजी अर अजीतसिंह जी रै अंतस रै प्रेम रौ पक्कौ सबूत है।
1 दिसंबर 1898 नै लिख्यौड़ै अेक दूजै पत्र में स्वामीजी लिख्यौ—''जे सौ रु. महीनै म्हारै बैठा थकां म्हारा खरचपाणी सारू—जिण में मांदगी री वजह सूं वधारो हुयग्यौ है, औरूं भेळ नै भिजावण री सगवड़ करावौ तो घणी कृपा हुसी। आपनै घणा दिनां तांई फोड़ा नीं घालूंला। म्हनै लागै म्है नीठ कीं बरसां रौ पांवणौ हू। अेक अरज औरूं है। जे संभव हुवै तो म्हारा माताजी नै सौ रु. महीनै भेजण रौ प्रबंध कायम खातै कर दिरावौ। जिणसूं म्हारै गयां पछै ई वांनै बराबर पूगता रैवै। म्हैं संसार में जकौ कीं हूं, आपरी मदद रै पाण हूं। आप म्हारी सगळी चिंता मिटायनै संसार रौ मुकाबलौ अर कीं काम करण री हिम्मत अर हौसलौ बख्शियौ।''
जद कदैई स्वामीजी नै रवानगी खरच अर दूजा छोटा-मोटा कामां वास्तै पईसां री जरूरत होवती, वे नि:संकोच हुयनै राजाजी नै लिखता। कश्मीर प्रवास में वे जद बीमार हुयग्या तो 17 सितंबर 1898 नै लिख्यौ— ''लारला पनरै दिनां सूं म्हारौ शरीर ठीक कोनीं। म्हनै पईसां री जरूरत है। यूं तो म्हारा अमरीकन मित्र हाथ रै हेलै ऊभा है पण नित-रोज वांनै तकलीफ देवतौ लाजां मरूं। मांदीवाड़ में अणचिंत्यौ खरचौ करणौ पड़ै। म्हनै संसार में फगत अेक धणी, आप श्री सूं मांगतां शर्म कोनी आवै...!'' अर अजीतसिंहजी स्वामीजी रै इण धीजा अर विश्वास री ज्योति नै कदैई मगसी नीं पड़ण दी। जद कदैई स्वामीजी नै पइसा टक्कां री जरूरत पड़ती, वे तुरत आपरा अेजेंट अर बैंकर कलकत्ता रा नामी वैपारी सेठ दुलीचंद कांकरियां रै मार्फत पूगता कर दैवता।
राजाजी री तबियत नरम होवण री ठा पड़्यां, स्वामीजी वांरी कुशलक्षेम री चिट्ठी लिखी अर खुद रौ शरीर ठीक नीं होवतां थकां ई खेतड़ी जावण नै संभग्या। उणांरै ‘कल्याण’ खातर आपरौ ‘जीवन होमण’ री बात वे चिट्ठी में लिखी। इण चिट्ठियां सूं स्वामीजी अर अजीतसिंहजी रै अंतरंग प्रेम अर धरोबा रै अलावा आ ई ठा पड़ै के स्वामीजी रा माताजी नै सौ रु. नेम सूं भेजीजता। दोनूं रै सुरगवासी हुयां पछै ई सन 1911 तांई माताजी रै जीवता थकां इण में कदैई मीनमेख नी आयी।
स्वामीजी विलायत में रैया उठा तांई राजाजी वांरा प्रतिनिधि अर सचिव रौ फर्ज निभायौ। वे आथूणा मुलकां में रैया उण तांई स्वामीजी बाबत सगळी पूछताछ खेतड़ी सूं होवती। इणी भांत वां रै सम्बन्ध में किणी गुरुभाई अर भावीक नै कोई जाणकारी मिळती तो खेतड़ी भेजीजती। इण बात री पुष्टि मुंशी जगमोहनलाल नाम स्वामी ब्रह्मानंद जैपुर सूं 11 जुलाई 1893 नै, हरिदास मित्र री बेळगांव सूं 14 अगस्त 1893 नै, स्वामी रामकृष्णानंद री कलकत्ता सूं 14 अगस्त 1893 नै अर भूपेंद्रनाथदत्त री 7 जुलाई 1898 नै लिख्यौड़ी चिट्ठियां सूं हुवै। खेतड़ी स्वामी बाबत जाणकारी भेजण अर पावण रौ सूचना केंद्र हो।
विलायत सूं आयां पछै स्वामीजी खेतड़ी पधार्या। राजाजी नवकोस आगै जायनै वांरी अगवाणी कीधी अर पछै घोड़ागाड़ी में बिठायनै आदरमान सूं खेतड़ी लेयग्या। उठै स्वामीजी रा अभिनंदन सारू हाईस्कूल में महती सभा हुई। इण सभा में उणां कह्यौ— ''जे म्हनै राजाजी नीं मिळता तो भारतवर्ष री उन्नति खातर कीं करणौ संभव नीं हौ। उणीज सभा में राजाजी रामकृष्ण मिशन री थरपणा वास्तै तीन हजार रु. स्वामीजी नै नजर कीधा।
जद घरेलू विपदावां री मार सूं खेतड़ी नरेश हिम्मतहार हुयगा, उण मोकै वां री हिम्मत वधावतां थकां स्वामीजी उणां नै ‘होल्ड आंन यट अ वाइल, ब्रेव हार्ट’ शीर्षक सूं कविता लिखनै भेजी। जिण रौ भाव हौ—शूर हृदय सेंठौ रहीजै, कदैई होणी दाव मती दीजै। स्वामीजी अमरीका सूं राजाजी नै अेक फोनोग्राफ अर आपरी आवाज में रिकार्ड कीधौड़ा राजधरम रा उपदेश रै रिकार्ड री सौगात ई भेजी ही। गाजा बाजा सागै अेक विशेष दरबार रौ आयोजन करनै ओ रिकार्ड सगळां नै सुणाईज्यौ।
भावी प्रबळ है। अजीतसिंहजी सन 1909 में सुरग सिधारग्या। स्वामीजी नै इण पुण्यात्मा नखतधारी नरेश स्वामीजी री कामयाबी खातर की करण में पाछ नीं राखी, राजस्थान री आ धरती इसा सपूतां माथै घणो अंजस करै।