यह वाद्य तत्-वाद्य (जिनमें तारों से ध्वनि उत्पन्न हो) की श्रेणी में आता है। रावण हत्था वायलिन का पूर्वज माना जाता है। इसकी उत्पत्ति श्रीलंका की 'हेला' सभ्यता से हुई है। लोक में प्रवाद प्रचलित है कि इसका संबंध रावण से है और इसे ऊँटों के देवता पाबूजी राठौड़ अपने साथ लंका से राजस्थान लेकर आए थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण भगवान शिव का प्रतापी भक्त था। वह शास्त्र के साथ संगीत में भी पारंगत था। भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए उसने अपनी साधना में रावणहत्थे का भी उपयोग किया था।

 

यह सामान्यतः 9 तारों का वाद्य है। बाँस की डांड के एक सिरे पर नारियल की कटोरी लगी होती है जिस पर खाल मढ़कर इसे बनाया जाता है। डंडे की लंबाई ढाई से तीन फीट होती है। इसका मुख्य तार घुड़च से एक कोण बनाता हुआ वाद्य के बायीं ओर निकलकर लंबी डांड पर लगी खूँटी से कस दिया जाता है। कुल नौ खूँटियाँ लगी होती हैं, जिस पर बंधे तारों का दूसरा सिरा नारियल की तूंबी की तरफ जाता है। ये तार लोहे और तांबे से निर्मित होते हैं और इन पर गज रगड़कर ध्वनि उत्पन्न की जाती है। इसका गज घोड़े की पूँछ के बालों से बनाया जाता है, जिस पर घुंघरू बंधे होते हैं। ये घुंघरू रिदम या ताल का काम करते हैं। सुर बदलने के लिए उँगलियों से तारों को दबाया या छोड़ा जाता है। तुंबे वाला हिस्सा कंधे की तरफ़ रखा जाता है।

 

राजस्थान में रामदेव जी व पाबूजी की फड़ वादन में इस वाद्य यंत्र का उपयोग भोपा समुदाय के लोग करते हैं।

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