रंगरूड़ौ राजस्थान

 

रंगरूड़ौ राजस्थान कुदरत री कंजूसी रै वजै सूं विरंगौ भलांई दीसौ पण तीज-तिवारां अर विशेष अवसरां माथै तो अठै रंग री छोळां फूटै। इण धरती माथै परंपरा सूं गढ कोटां अर ढालां तलवारां रै धणियां केसरिया बागा धारण करनै तातै लोही सूं रातै रंग री होळी रमण री रीत निभाई। घणा रंग हैं इण धरती रा रूड़ा रंगारां नै। इणीज भांत अठै रंग रै हथळेवै रचियै हाथां सतियां अर शीळवंतियां अगन री झळां होळी मंगळाई। इण कारण इण धरती रा सपूतां नै राग-रंग रा उच्छब-अेढा अर अमल मनवारां रै मौकै रंग दिरीजै। लाडकोड रै अवसरां माथै रंग बांटीजै अर रंग रा मांडणा मांडीजै। पांवणा-पैईयां, सगा-गिनायतां, हितु-मिजमानां अर भाई सैणां रै रंग रा छांटणा करीजै। अठै री केसरवरणी गोरड़ियां केसरिया कसूमल ओढ्यां, मींढै पाड़्यां, लड़ाझूम हुयौड़ी चूड़ौ भळकाती झीणै घूंघटै में इंद्रधनुष री दाईं सतरंगी-सी लागै। रंग इण धरती रै रग-रग में रम्योड़ौ।

 

फागण में भगवान

 

बसंत पांचम रै दिन मंदिरां में आरती उतारीजै, पंजरी बांटीजै अर गुलाल सूं भगवान नै फाग रमाईजै। आंपणै अठै इण दिन सूं होळी रौ प्रारंभ मानीजै। बसंत पांचम अणबूझ्यौ सावौ। इण दिन हजारूं चंवर्‌यां मंडै। बसंत में वनराय फूलीजै। फागणियौ फरफरै तो धूड़ रा भतूळिया ऊपड़ै जाणै भगवान फाग रमै। चांदणी दटूड़ रात में झीणी झीणी फूल गुलाबी सरदी पड़ै। गांव रै गौर, गुवाड़ अर चौवटां में चंगां माथै थाप पड़ै अर तीखी राग में फाग गाईजै—‘उठ हर मिळले भरतै भाई, हर आयौ रे उठ मिळले।’ मीठै कंठ सूं राधा-किसन री धमालां गाईजै—

 

मानत ना है जसोदा थारौ गिरधारी
घरां तो है रमण नै मोहन म्हैल माळिया
आ गूजरी री टपरी लागत प्यारी
मानत ना है जसोदा थारौ गिरधारी

घरां तो है पोढण नै मोहन सीरख पथरणा।
आ गूजरी री गूदड़ी लागत प्यारी
ओ मानत ना है जसोदा थारौ गिरधारी।

 

चंग री थाप सागै ऊंची राग में गायौडी अे धमालां दूर-दूर तांई सुणीजै तो ढोळियां, मांचां अर डेलां माथै सूता लोग बैठा होय जावै। इण में जिकौ रस है, वो तो गावण वाळा अर सुणण वाळा ई जाण सकै। यूं अेक जणौ थाकै के दूजौ गावण लाग जावै।

 

होळी लाई रे फूलां री झोळी

 

फागण महीनै नैना मोटा, टाबर टोळी अर बूढा ठाडा होळी रे रंग में रंगीज्यौड़ा आधी-आधी रात तांई चंग री थाप माथै धमालां बोलै। कठैई तांबड़ै ढोल री चिन्पी माथै डंडिया गैर री घमक ऊपड़ै। ज्यूं-ज्यूं रात ढळै तर-तर गैर रौ रंग जमतौ जावै। घेरदार बागा पेहर्‌यां, तलवारां लटकायां, चूनड़ी, लेरिया अर पचरंगी मोळिया साफा बांध्यां, फूटरी जोड़ रा मोट्यार जद घूघरां री रणकार सागै झुक झुक घूमर घालै अर ढोल रै डाकै सागै डंडियां रौ कड़ाकौ मिळावै तो अेक अजबी समा-सौ बाध जावै। नित नुंवै भेष में सुरंगी गैर रमै तो देख’र मन री कळी-कळी खिल जावै। मानीती कोटड़ियां अर तिबारियां में गैर नै तेड़ीजै अर आधी रात ढळै जितरै रमाईजै। कानाना (बाड़मेर) री गैर अर शेखावाटी री गींदड़ तो मुलकां में चावी है। लोग देस दिसावरां सूं यांनै देखण नै आवै। बीकानेर में इण मौकै कई दूजा ख्याल ई खेलीजै।

 

उठीनै लुगायां आपरी भावनावां लूहर में दरसावै। दो पाळा बणाय अेक पाळै री लुगायां ताळियां बजावती अर अेक राग सूं लूहर (लूर) री कड़ियां बोलती आगै बढै तो दूजोड़ै पाळै री लुगायां लूहर री कड़ियां बोलती वां नै पाछ पगलियै पुगावै। मन रै खूणा में दब्यौड़ी काम भावना लूहर रै मिस गीतां में दरसावै—‘खेत तो खड़ियोड़ौ पड़ियौ, धरती धान मांगै रे!’ इणी’ज भांत सांवळै होठां रा छोकरा गांव सूं अळगा जाय फीट गावै अर मन री बाफ काढै।

 

होळी रौ चंग बाजणौ

 

होळी सू कई दिनां पैली होळका लागै अर होळी रौ डांडौ रुपै। डांडौ रुपियां पछै होळका में कोई आणौ-टाणौ, गांव-गांवतरौ के शुभ काम नीं करीजै। लुगायां घर बार लीप पोत नै साखिया काढण रौ काम करै।

 

खीजिया तळीजै, गुळिया लाडु सांधीजै अर शक्करपारा काढीजै।

 

घरबार रौ काम काज बेगौ निवेड़’र सिझ्यारा लुगायां भेळी होय गीत गावै। गीतेरण लुगायां री विशेष पूछ होवै। इण मौकै नुंवै दिन रै अवसर माथै नुंवा परणईज्यौड़ा पांवणां नै ई बुलाईजै अर वां रा लाडकोड करीजै। बास-गुवाड़ री लुगायां भेळी होय होळी रा गीत गावणा सरू करै—

 

होळी रौ चंग बाजणौ!
चंग आंगळियै बाजवै
चंग चिट्टू रै बळ बाजै ओ
होळी रौ चंग बाजणो!
चंग हथाळी बजावै
चंग चिरमी रै लगावै
चंग अेडी रै फणकार ओ
होळी रौ चंग बाजणौ!

 

गीतां में मोट्यारां री गैर फिरती-घिरती रावळै आय पूगै। हिंगळू ढोलियै पोढतै पिवजी रै चंवर हुळाती नै नकड़ी नाजू अरज करै—

 

गैर ऊभी रावळै सायब जी
चंवर डुळै लख च्यार
दड़िंदौ बाज रह्यौ!
गैरिया ऊभा यूं कहै
भंवरजी बारै आव
दड़िंदौ बाज रह्यौ!

 

गैर रमता गैरियां रै बागां री घुमेर, पगां रै ठमकार अर घुरतै ढोल रै दड़िंदै सागै

गीतेरणां गीत उगेरै—

गैरिया गैर रमै!
पगल्यां सूं पगल्यां जोड़
ढोल री घमक उठै
डंडियां सूं डंडिया जोड़
हाथां री लळक पड़ै
ढोलीजी ढोल बजाव
गैरिया गैर रमै!

 

होळी री धमाल अर फाग री राग इतरी लोकप्रिय हुयगी के इतिहास प्रसिद्ध जस कीरत री बातां ई इण लोकशैली में गाईजण लागी। सन सत्तावन रै स्वतंत्रता संग्राम रै सेनानी आऊवै ठाकर खुशालसिंह री वीरतारा वखान ई गीतां में होवण लाग्या—

ढोल बाजै थाळी बाजै
भेळौ बाजै बांकियौ
अेजैट नै मारनै, दरवाजै नांखियौ
झल्लै आऊवौ
आऊवौ मुलकां चावो रे! झल्लै आऊवौ!

 

होळी मंगळावणी

 

शुभ मोहरत देख नै होळी मंगळाईजै। शहरां में बळीतौ, छाणा अर थेपड़ियां भेळी करनै गळी मोहलां में न्यारी न्यारी होळी मंगळाईजै पण गांवड़ां में आदू रिवाज मुजब लांगेरां री होळी मंगळाईजै। मोहरत री वखत सगळां जणा चंग बजावता होळी रै थान पूगै। पूजा पाठ हुयां ढोली ढोल बजावै अर पछै होळी मंगळाईजै। होळी रै बिचाळै रोप्योड़ी खेजड़ी रौ नीलौ ठूंठ प्रहलाद मानीजै। मोट्यार हिम्मत करनै बळतै प्रहलाद नै बारै काढै। मानता है कि जिकौ कुंवारौ मोट्यार प्रहलाद नै बळती होळी सूं बारै काढै, आगली होळी सूं पैली उणरौ ब्याव खरौ। होळी री झाळ देख’र सुगन विचारीजै। जिण दिस में झाळ जावै उण दिस में जमानौ चोखौ पाकै। लोगड़ा होळी रा खीरां माथै पापड़ खीचिया सेकै अर वांनै साल भर तांई संभाळ नै राखै। इणां सूं टाबरां रै खुलखुलियौ ठीक होवण रो विस्वास मानीजै। झांझरकै भाग फाट्यां कन्यावां बेगी आय’र होळी री राख रा पिंडोळिया बणावै अर गवर री पूजा करै। सगळां लोग होळी रै थान सूं नुंवी अगनी आपरै घरा लिजावै अर चूल्हा चेतावै। इण भांत होळी मंगळावण रौ काम विधि-विधान सागै मोहरत सूं पूरौ करीजै।

 

होळी रौ हुड़दंग

 

होळी रै दूजोड़ै दिन घूळैड़ी खेलीजै। लोग दिन उगतांई भेळा होवण लागै अर नाचता-गावता भांत भांत रा सांग बणायां घर-घर गैर बणाय’र जावै। चंग री थापां अर झींझां री झणकार सागै मोट्यार नाचै। ठौड़-ठौड़ वांरी अमल तमाखू सूं मनवार करीजै। मिठाईयां बांटीजै। कठैई दारू रौ गुटकौ ई दिरीजै। टाबरिया रंगां री पिचकारियां छोड़ै। कोई छात माथै चढ’र तार लटकाय बैवता लोगां रा टोपी, साफा उचकावै अर पैसा मिळ्यां पाछा देवै। कई लोगा कादौ कीच उछाळै अर फूहड़ बोलै। इणसूं तिवार री महत्ता मोळी पड़ै। लारली होळी पछै ज्यांरै टाबर जनम्योड़ौ होय, बीं री ढूंढ उतारीजै।

 

घणकरा मोहल्लां रा गुवाडियां में रंग रा कड़ाव भरीजै। ज्यांरै च्यारूं मेर बीनणियां हाथां में बट्यौड़ा कोरड़ा लियां अर कमर में ओढणौ खोस्यां ताचक्यौड़ी ऊभी रैवै। देवरिया डील नै करड़ौ कर नै हिम्मत रै पाण कड़ाव सूं बाल्टी, डोलची अर पिचकारी भर भाभियां माथै रंग नांखै। इण भांत दोपैर तांई खेल चालतौ रैवै।

 

अकन कुंवारा ईलोजी

 

राजा हिरणाकुश री बैन होळका री सगाई राजकुंवर ईलोजी सागै हुयौड़ी। होळका तपसा कर अगन देवता सूं अगन सिनान रौ वरदान लियोड़ौ। रोजीना चंदण री लकड़ियां भेळी कर नित अगन सिनान करणै सूं होळका रौ रूप चमाचम करै। बसंत पांचम रै सागण दिन होळका रौ ब्याव मंड्यौ। राजा हिरणाकश आपरै बेटै प्रहलाद सूं घणौ दुखी। वो दुस्मी विष्णु रौ भगत बण्यौ कठैई ब्याव में भंज नीं नांखदे इण कारण योजना बणी के होळका प्रहलाद नै गोदी में लेय अगन सिनान करै, जिणसूं प्रहलाद बळ नै भस्म हुय जासी।

 

पण वरदान तो अेकली रै अगनसिनान रौ हो सो भगवान री माया सूं होळका तो बळनै भस्म हुयगी अर प्रहलाद बचग्यौ। इण घटना री याद में होळी रौ तिंवार मनाईजै।

 

अठीनै राजकुंवर ईलोजी जान लेयनै पूगा अर उठीनै होळका बळनै भस्म हुयगी। अे समाचार सुण’र इलौजी चेता चूक होयग्या। वो होळका री राख में लुट’र विलाप करण लाग्या। लोगां ईलोजी माथै रंग गुलाल फेंक्यौ अर वांरी मसखरी करण लाग्या।

 

ईलेजी तो होळका रै वियोग में जीवण भर अकन कुंवारा रैवण रौ व्रत लेय लियौ अर वे लोक देवता बणग्या। अेकर ईलेजी अेक सेठ नै बेटौ होवण रौ वरदान दियौ, तो सेठ ईलेजी नै पाडौ चढावण री मानता मानी। नवमै महीनै बेटो हुयां सेठ पाडौ लिजायनै ईलेजी री पूतळी रै काठौ बांध दियौ। थोड़ीक ताल में पाडौ इलेजी नै उखेड़ नै ठिरड़तौ थकौ रवानै हुयौ। मारग में शीतळा माता रौ थान पड़तौ। शीतळा इलेजी री आ हालत देख’र हंसवा लागी तो ईलोजी नाराज होयग्या। शीतळा बोली ईलोजी महाराज नाराज मत होवौ। लोग थांनै होळी पछै धूळैटी रै दिन पूजसी अर थै वांरा कारज सारसौ। बीं दिन सूं ईलोजी री पूजा सरु हुई अर गांव-गांव में वांरा थान थरपीजगा। धूळैटी रौ दिन ब्याव सावां खातर अण पूछ्यौ मोहरत मानीजै।

 

रजवाड़ां री होळी

 

पुराणै जमानै में कोई पण तीज तिंवार घणै हरख उमाव सागै मनायौ जावतौ। साधारण जनता ई उणमे घणौ रस लेवती तो पछै राजा-महाराजावां, ठाकर-ठेठरां अर सेठ-साहूकारां रौ तो कैवणौ ई कांई। होळी माथै राजा-महाराजावां री सवारियां निकळती, राजाजी हाथी रै होदै बिराज’र रैयत सूं मुजरौ निजराणौ कबूल करता। सड़क माथै गुलाल री चादर सी बिछ जावती। मुट्ठियां भर-भर नै राजाजी माथै रुपियां अर मोहरां री निछरावळ होवती। राजाजी रा हाथी रै आगै घोड़ां चढ्या जागीरदार, ताजीमदार, ठिकाणैदार, अमीर-उमराव अर खास-खास अफसरां रौ पूरौ लवाजमौ रैवतौ। जरी सितारां, सोनै चांदी अर हीरा मोतियां रा पळका पड़ता। आगै-आगै नाच गाणौ होवतौ। जलसै में भाग लेवण वालां नै माजूम बरफी बांटीजती। लारै-लारै गाडियां में गुलाल गोटा भर्‌या रैवता। चालतां-चालतां गोटा फैंकीजता तो चपड़ी फूट जावती अर रंग रा फव्वारा सा छूटता। सागै चालती रंग री टंकी सूं रंग री तुर्रियां छूटती रैवती। जनता ढोल, चंग अर मजीरा बजावती नाचती-गावती रैवती।

 

जनानी ढ्योढी में केसर घुळती, गुलाल छणती अर देव पूजा कर होळी मनाईजती। सिंझ्या रा अंगूरी मेहफल सजती। आसौ-दुवारौ अर केसर किस्तूरी री दपटां उडती। रात री वखत कलावंत पातरां रौ नाच गाणौ होवतौ।

 

ठाकर ठेठरां अर जागीरदार भोमियां री रावळी ओळ में ई गांव रा लोग रामा-स्यामा करण नै ढूकता। चौक में जाजमां ढळती अर अमल री मनवारां होवती। मेवौ मिसरी अर खारक-सिंघोड़ा बंटीजता। आथण रा मेहफल जमती अर डोढी मनवारा होवती।

 

सेठ साहूकारां री होळी ई ठसकै वाळी ही। चौक में रंग रा कड़ाव भर्‌या रैवता। कोई पण आवौ अर खेलौ। रसोवड़ै ताता भोजन त्यार। बैठौ अर जीमौ।

 

मुसलमानां री होळी

 

मुसलमानां री भारतीयता ई हिंदूवां रै सैजोड़ रही। दोनूं कौमां अेक दूजै रा तिंवार घणै हरख अर उमाव सागै मनावती। होळी री रंगीनी, मस्ती अर राग-रंग सूं रीझ’र मुगल बादशाहां आपरै दरबार में होळी मनावण री परंपरा सरू करी। राजम्हैल में दिन रा रंग-रमण री छूट अर रात नै गामै री मेहफल जुड़ती। अकबर रै शाही दरबार में सरू कियौड़ी होळी कई पीढियां तांई बराबर चालती रही अर खूब ठाट बाट सागै मनाईजती रही। बहादुर शाह जफर री बणायौड़ी होळी संबंधी रचनावां घणी चावी हुई—‘क्यूं मोरे रंग की मारी पिचकारी, देखौ कुंवरजी म्हैं दूंगी गारी।’ औरंगजेब जिसै कट्टर बादशाह रै वखत में ई होळी मनाईजती। उणरै सेनापति शाइस्तखां रौ होळी रमतां रौ चित्राम दिल्ली रा राष्ट्रीय संग्रहालय में मौजूद है। काशी रै हाकम पीर रुस्तम अली ‘बुढवा मंगल’ रै संगीत मेहफल री सरूआत कीनी। उणरै कैद हुयां गणिकावां गायौ—“कहां गये मेरै होळी के खिलैया? सिपाही रुस्तमअली बांकै सिपहैया।”

 

मुसलमान कवियां होळी माथै घणी ई कलम चलाई। अेक रचना इण भांत है—

 

“खेलत बसंत पिया प्यारी संग
भर-भर पिचकारी मारत अंग
केसर रंग छिटकत अंग-अंग।”

 

अेक औरूं मुसलमान शायर कह्यौ है—

“मियां तू हमसे न रख गुवार होली में।
कि रूठे मिलते हैं यार होली में।
मस्ती है रंग की, कैसी बहार होली में?
हुआ है जोर चमन आसकार होली में।”

 

परदेसां में होळी

 

हंसी-खुसी रा कई तिंवार दुनिया रा कई देसां में भांत-भांत सूं मनाईजै। बर्मा में च्यार दिनां तांई टाबर रंग री पिचकारियां फेंकै अर पाणी री बाल्टियां भर-भर नै ढोळै। अमेरिका में 31 अगस्त री रात नै लोग नाच-गाणौ, खेल-कूद अर हंसी मसखरी करता तरै-तरै रा सांग बणावै। इटली मे चौरस्तै जाय नाचै-गावै अर बळीतो भेळौ करनै बाळै। फ्रांस में ई लोग हुड़दंग मचावै, काळा मूंडा करनै सींगड़ा लगावै अर घास-फूस री मूरतां बणाय नै बाळै। साईबेरिया में टाबर घर-घर सूं लकड़ियां भेळी करनै लावै अर बाळै। चेकोस्लोवाकिया में लोग नाचै-गावै अर इत्र छिड़कै। लंका में पूजा पाठ करै अर पछै रंग सूं रमै।

 

इण भांत होळी रै ज्यूं हंसी-खुशी अर मौज मस्ती रा तिंवार न्यारै-न्यारै नामां सूं आखें संसार में मनईजै।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : मूळदान देपावत ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मार्च 1987
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