अतीत री इतिहास जातरा में मौजूदा राजस्थान आपरी न्यारी-न्यारी रियासतां रै नांव सूं ओळखीजतो रह्यो है। घणी दफै राज-सत्तावां री अदळा-बदळी, सींवां री घटत-बधत अर दूजा इतिहास कारणां सूं आं रियासतां रा सरूप बदळता रह्या। प्रदेस रो उतराधो हलको जठै जांगळ नांव सूं जाणीजतो, पूरबी हलको मत्स्य रै नांव सूं, दिखणाद अरबुद, मेवाड़ वागड़ अर माळवै रै नांव सूं, बीचलो हलको मेरवाड़ा तो आथूणो बडो मरुस्थलीय हलको मरू अर माढ रै नांव सूं ओळखीजतो। आं सगळा हलकां री अेकठ इकाई रै रूप में पैली सूं चालतै नांव राजपुताना, जिको सन् 1800 में जॉर्ज थॉमस दियो हो, उणरी जग्यां राजस्थान नांव पैली दफै इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड सन् 1829 में आपरी इतिहास री किताब एनल्स एंड एण्टीसक्विटीज ऑफ राजस्थान में दियो, जिणनै सन् 1949 में प्रदेस रै गठण अर सन् 1956 में पुनरगठण में अंतिम रूप सूं कबूल करीज लियो अर इण प्रदेस में बोलीजण वाळी भासा नै राजस्थानी, जिणरै साहित्य अर संस्कृति री न्यारी पिछाण री हजार बरसां रो आपरो इतिहास है।
इण भासा रै इतिहास विगसाव में व्याकरण रो निरमाण पण अेक जरूरी मसलो रह्यो। इण मसलै माथै भासा अर साहित्य रा मौजीज बडेरां प्राचीन अध्यन नै बरोबर हवालै में राख्यो अर वांरा नतीजां नै आपरी खोज-बीण में पूरो आदर-माण दियो। व्याकरण निरमाण रै इण महताऊ काम में ईसाई मिसनरियां सूं जुड़योड़ा विद्वानां पण गैराई अर लगन सूं काम कियो अर भासा री व्याकरण त्यार करण में आपरो लगाव दरसायो। इतिहासू सिलसिलै सूं बात करां तो अेच.अेस.कैलौग रो नांव सगळां सूं पैली आवै, जिकां सन् 1873 में पैली दफै आपरी पोथी 'ग्रामर ऑफ द हिन्दी लैंग्वेज' में राजपुताना री बोलियां री व्याकरण त्यार करण में गाढी रूचि दरसाई पण शिकागो विश्वविद्यालय री विद्वान ड़ॉ. कालिचरण बहल आपरै भासाई अध्यन में इण बात रो खुलासो कियो कै कैलौग री आ यूरोपीय धारणा सही कोनी ही कै भासा रै टकसाळी सरूप निरधारण में लोकभासा री बजाय अभिजात साहित्य रो भासाई सरूप बधीक पुराणो अर सही हो अर इण भांत वां राजस्थानी री बोलियां नै उण अभिजात हिंदी री न्यारी-न्यारी साखावां मान'नै आपरा अधपाक्या नतीजा साम्हीं राख्या, जिका सही नी हा।
उण बगत मारवाड़ रियासत रा खास मंत्री अर भासा रा नामी विद्वान पं रामकरण आसोपा पैला भारतीय हा, जिकां सन् 1896 में मारवाड़ी व्याकरण नांव री पोथी त्यार करी, जिणमें वां इण भासा री खसियतां अर बुणगट री विस्तार सूं चरचा करी। आ व्याकरण अेक तरै सूं उण बगत री स्कूलां में भासा री भणाई रै मकसद सूं ई त्यार करीजी ही। जॉर्ज ग्रियसन वै पैला विद्वान हा, जिकां राजस्थान रा न्यारा-न्यारा हलकां री बोलियां (मारवाड़ी, मेवाड़ी, वागड़ी, हाडौती, ढूंढाड़ी अर मेवाती) नै अेकठ सरूप में राजस्थानी भासा रो नांव दियो, जिणमें निस्चै ई मारवाड़ी साहित्य-सिरजण, भौगोलिक विस्तार अर बोलणवाळां री तादाद री दीठ सूं सगळां सूं लूंठी बोली ही। ग्रियर्सन बीसवीं सदी रै सरूआती बरस सन् 1908 में प्रकासित आपरै भासाई अध्यन 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में राजस्थान री सगळी बोलियां रै समूह राजस्थानी नै हिन्दी सूं न्यारी मान नीं फगत उणरौ फरक समझायो, वां राजस्थानी अर गुजराती रै लांबै साथ री विस्तार सूं चरचा करतां वां दोन्यां नै गुर्जरी अपभ्रंस सूं उपज्योड़ी आथूणै भारत री अेक लूंठी भासा रौ दरजो पण दियो। ग्रियर्सन रै बगत में ई अठै इतालवी विद्वान लुईजी पिओ टैस्सीटरो पण बीकानरे में ई आपरो डेरो जमाय राजस्थानी भासा में लूंठो काम करै हा। वां खास तौर सूं आथूणै हलकै री इण जूनी भासा रै साहित्य री गैरी छाणबीण कीवी अर आम जीवण में भासा रै व्यवहार नै लेय आपरो महताऊ काम साम्हीं राख्यो, जिको बरस 1916 में 'नोट्स ऑन दी ग्रामर ऑफ दी वैस्टर्न राजस्थानी' नांव सूं प्रकासित हुयो। राजस्थानी भासा रै महत्व री दीठ सूं आ बात पण उल्लेखजोग जाणीजै कै बांग्ला रा नामी विद्वान सुनीतिकुमार चटर्जी सन् 1947 में उदयपुर में राजस्थानी भासा रै इतिहास, उणरी निकेवळी खूबियां अर इणरै निजू सरूप री विस्तार सूं चरचा करी। राजस्थान विद्यापीठ रा मुनि जिनविजयजी री देखरेख में बाद रा बरसां में राजस्थानी भासा अर बीकानर में ई राजस्थानी रा केई सोध संस्थान बण्या अर वांरै मारफत उल्लेखजोग काम हुया। आं कामां में खासतौर सूं भासाविद डॉ. सीताराम लालस अर नरोत्तम दास स्वामी रो अवदान घणो महत्व राखै। भासा रै विगसाव री दीठ सूं सन् 1960 में छपी नरोत्तमदास स्वामी री राजस्थानी व्याकरण, रो खास महत्व मानीजै। सीताराम लालस पण अेक व्याकरण तो त्यार करी ई, पण वांरो लूंठो अर इतिहासू अवदान राजस्थानी सबद कोस, जिकौ नव जिल्दां में पूरो हुयो अर वो सबद कोस री दुनिया में आपरो न्यारो महत्व राखै।
राजस्थानी भासा री हजार बरसां री लूंठी साहित्य-परम्परा में कविता अर कथा हरेक जुग में उणरी केन्द्रीय विधावां रही। आ ई कविता अर कथा आपरै मौजूदा सरूप में आधुनिक, नुंवी कै आज री कविता-कथा रै नांव सूं ओळकीजै। इण आधुनिक राजस्थानी साहित्य रै विगसाव में हिन्दी कै दूजी भासावां रै उनमान छायावाद, स्वच्छंदतावाद, प्रगातिवाद सरीखा-आन्दोलंना रौ असर नीं बरोबर रह्यो। आ बात जाणतां थकां कै दूजा हलकां री बनिस्पत अठै आपरी भासा में लिखण वाळां रै साम्हीं अबखायां अर चुणौतियां कदैई कमती नीं रही, अपरंच वांरो मनोबल पण कदैई काचो नीं पड़ियो। अठै आ बात म्हैं अखरावणी चावूं कै साहित्य-सिरजण री इण विकास-जातरा में मुलक रा दूजा हलकां री भांत राजस्थानी लिखांरा रो साहित्यिक अवदान किणी भांत कमती नीं गिणीजणो चाईजै।
इण अबखाई री जड़ में जावतां म्हनै फेरूं अेकर आ बात अखरावणी जरूरी लागै कै आजादी मिळियां पछै राजपुताना री सगळी रियासतां नै अेकठ कर जिण राजस्थान प्रांत रो गठण हुयो, उणरै साथै सगळां सूं मोटी विडंबना आ रही कै उणरा रैवास्यां नै आपरै काम-काज, विकास अर राज रै साथै संचार-संवाद सारू आपरी मातृभासा नै बरतण रो इधकार अर सुविधा नीं हासल व्ही। वांनै आ समझावण री कोसीस करीजी कै शिक्षा, विकास अर राज-काज में आपरी भागीदारी बधावण सारू वांनै उण संपर्क भासा नै ई आपरी मातृ भासा अंगीकार कर लेवणी चाहीजै, जिणरो राष्ट्रभासा रूप में वै पूरो आव-आदर करै अर उणनै आगै बधावै। पण उणमें वांरी मातृभासा कठै आडी आवै अर उणसूं विकास में कांई फांटो पड़ै, इण बात रो उथळो वांनै किणी नीं दियो। वांनै इण बात रो गाढो अफसोस रह्यो कै वां अंगरेजी हकूमत अर देसी राजावां रै जुलम सूं लड़ती बगत अर आपरी जीवारी सारू जिण भासा माथै अथाग भरोसो राख्यो, वांरो इतिहास, संस्कृति, रीति-रिवाज, साहित्य, गीत-संगीत, बिणज- बौपार अर चिट्ठी-पत्री सगळो कीं आपरी उणी भासा में संज आवतो, वा भासा आजादी मिळंता ई राज री निजर में इत्ती अकारथ अर अणखावणी किण भांत व्हैगी? नूंवै राज री इण नीती रो म्यानो भला कुण तो बूझतो अर किणसूं बूझतो, जद फैसलो लेवणवाळां में वांरा ई आगीवाण भेळो हूंकारो भरियो व्है? राजस्थान री सगळी बोलियां रै रूप-गुणां रै मेळ सूं बण्योड़ी राजस्थानी भासा रै मानक सरूप रौ बैवार सन् 1857 री लड़ाई सूं ई मोकळा बरस पैली सूं अठा रै साहित्य अर कळा-रूपां में बखूबी देखण नै मिळै अर उणी मानक सरूप में लिख्योड़ी अथाग साहित्य अर दूजा कळा-रूप राजस्थानी री लूंठी विरासत मानीजै। (तीन बीसी पार री भूमिका सूं)
आजादी सूं पैली जलमी अर आपरो आपो सांभती पीढ़ी में आपरी न्यारी पिछाण बणावणवाळा लिखारां जिण भांत इण अबखै बगत में राजस्थानी रो गुमेज बणायां राख्यो, उणरी अणदेखी करणवाळां नै अबै आ बात समझ में आवणी चाहीजै कै भासा कोई रै हलायां नीं हालै अर नीं उणरी सार-संभाल छोड्यां वा नीवड़ै। अेक जागरूक समाज अर राज रो फरज अवस बणै कै वो मुलक री तमाम भासावां अर वांरी संस्कृति रै विकास सारू कीं जरूरी सुभीता जुटावै। हरेक रचनाकार री आ पैली जरूरत व्है कै वो आपरै अणभव अर सोच नै आकार देवणवाळी भासा सारू खुद नै त्यार करै अर उणमें लिखण-पढण रो गाढो अभ्यास राखै, जिणसूं खुद री बात आपरी भासा में पूरी ऊरमां सूं अंवेर-अरथाय सकै।
राजस्थानी कविता री जातरा डिंगळ अर लोक-काव्य परंपरा नै अंगेजती थकी आजादी पछै रा आं बरसां में जिका पड़ाव पार करती आपरै मौजूदा सरूप तांई पूगी, उणरौ मोल-महत्व आंकण री गुंजायस भलांई कोई नै कमती दीखती व्हो, उणरी रचनाभोम अर चौफेर नै जाणण-समझण री जरूत निस्चै ई बधगी है। इण बात माथै वाद करणो बिरथा है कै अठै आधुनिक री धारणा पण बदळती रही है। कळा अर संस्कृति में आवणवाळा बदळाव यूं ई इत्ता अपरतख अर सूछम धरातळ माथै घटित व्है कै वांनै आंको-आंक जाण लेवणा सोरा नीं व्है।
आधुनिक साहित्य-सिरजण रै खास पख जीवण नै देखण-समझण री वैग्यनिक दीठ अर जथारवादी निजरियै सूं देखां तो कवि ऊमरदान री सिरजणा में इणरा सरुआती संकेत बखूबी पिछाण सकां, जठै वै छप्पनियै काळ में जीवण री दोजखी रो मारमिक चित्रण करतां अर पाखंडी साधुवां री पोल खोलतां आम लोगां नै वांसूं सावचेत रैवण री सीख देवता निगै आवै। उण बगत री समाजू कमजोरियां माथै चोट करतां ऊमरदान अलेखूं कवितावां सिरजी। यूं वांसूं ई पैली अंगरेजी हकूमत रै विरोध में रियासती राजावां नै आपरो आपो अर आतमबळ चेतै करावण अर आम लोगां रै साथै हमदरदी दरसावण में जिका राजस्थानी कवि आगीवण रह्या, वां में कविराजा बांकीदास, सूर्यमल्ल मीसण अर शंकरदान सामोर रो नांव घणै आदर सूं लिरीजै, जिका वासिन्दा भलांई राजपुताना रा रह्या व्हो, पण वांरी चिंतावां अर सरोकार आखै मुलक सूं जुड़ियोडा रह्या।
अठै आ बात पण म्हैं अखराय नै कैवणी चावूं के इणी काव्य-परम्परा नै आगै बधावतां अठै रा कवियां जिण भांत जनजागरण री जोत जगायां राखी, वा निस्चै ई हिन्दी अर भारतीय भासावां री कविता सांम्ही एक ओपती मिसाल मानीजै। बीसवीं सदी रै दूजै दसक में हिन्दी कविता जिण भांत जूंना आख्यानां, छायवाद, रहस्यवाद अर नूंवै छंद-विधान में आपरी पिछाण सोधै ही, राजस्थानी रा जूझारू कवियां आपरा पारंपरिक छंदां में ई जन-जागरण रो अलख जगावण में आपरै कवि-कर्म री सारथकता समझी। आजादी री लड़ाई रा आगीवाण कवियां में केसरीसिंह बारहठ, विजयसिंह पथिक, जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री, मणिक्यलाल वर्मा, जनकवि उस्ताद सरीखा कवियां इण लड़ाई में आपरी कविता नै अेक कारगर हथियार बणाय नै बरती।
सन् 1960-65 तांई री आधुनिक कविता रै इण सरुआती दौर में तादाद अर गुण री दीठ सूं खूब गंभीर साहित्य रो निरमाण हुयो। भासा अर संस्कृति रै विकास में तमाम तरै रा विरोधी हालात रै बिच्चै जिकां रचनाकारां कविता, कथा अर साहित्य री न्यारी-न्यारी विधावां रै जरियै सिरजण रै पाण भासा रो संघर्स जारी राख्यो, वो निस्चै ई वांरी जागरूकता अर जीवण सूं वांरै मांयलै जुड़ाव रो ई नतीजो कहीजै अर इणी अरथ में इण दौर रै साहित्य रो अेक इतिहासू महत्व बणै।
इणी दरम्यान राजस्थानी में छपण वाळी नूंवी-जूनी पत्रिकावां मरुवाणी, जलमभोम, जाणकारी, ओळमो, लाडेसर, हरावळ, राजस्थानी, ईसरलाट, राजस्थानी अेक, हेलो, दीठ चामळ, अपरंच इत्याद रै मारफत केई नूंवा रचनाकार साम्हीं आया, जिणां री अमूझ अर आफळ इण अतीत सूं साव न्यारी अर नुंवादी ही। मुलक री बदळती राजनीत, समाजू ढांचै री अबखायां, च्यारूंमेर उळझता हालात, भासा अर संस्कृति सूं जुड़ी आपरी पिछाण अर अणबूझ आगोतर नै लेय वांरै मांय अेक अजब-अमूझ बापरती जावै ही। आछै साहित्य रो पठन-पाठन अर नूंवो सिरजण वांरै मन संवेदन अर ऊरजा नै कीं संतोख अर सुख अवस देवतो। उणी अमूझ, आफळ अर असंतोख नै वाणी देवण सारू कविता अेक विस्वासू जरियो बणती जावै ही, पण गीतां अर छंदां री कोरणी अर बुणगट अबै मगसी पड़सी ही। दूजी भासावां री भांत मुक्त-छंद में कविता लिखणी जरूत-सी बणती जावै ही अर मावो-मांय छंद तोड़ण री ठावी समझ ई विगसती जावै ही, जिणरो ओपतो असर आं युवा कवियां री कविता लेखै निस्चै ई निरणाऊ रह्यो।
सातवैं दसक री सरुआत तांई मुलक अर खासकर गांवां रा हालात खासा बदळग्या हा। गांवां में पंचायतीराज कायम व्हेग्यो। लोकतंत्र नै लेय कीं जाग्रति ई आई। आम जनता में बरसां सूं राज रै बाबत वापरियोड़ी उदासीनता कीं कमती व्ही। सड़क अर रेल यातायत में बधोतरी व्ही। कस्बां में बिजळी पूगी, अखबार, रेडियो, टेलीविजन अर संचार-प्रसार रा साधन पूग्या। आपरै मुलक अर दुनिया सूं लोगां री पिछाण बधी गांव-गळी, आड़ोस-पाड़ोस अर मुलक री मोटी अबखायां नै लेय’र लोग सवाल उठावण लाग्या। गिणती री सुविधावां रै साथै सार्वजनिक जीवण में अबखायां बधी आम जरूत री चीजां मूंघी व्हैती रही, बेरुजगारी दिन-दूणी बधी, भ्रस्टाचार अर बेईमान समाज री नींवां तांई जाय पूगी। इणी समचै वोट री राजनीति करणवाळां अणफैम में ई केई बातां आं बरसां में आम मतदाता नै समझाय दीवी, जिणरो कुल नचीजो औ हुयो कै लोग आपरी निजू हालत अर मुलक रा हालात नै लेय कीं सोचण विचारण लाग्या अर वांरी बधती चिंतावां अेक हद पूग्यां पछै असंतोख में तब्दील होवण लागी। इणी असंतोख रै कारण भणिया-गुणिया अर हालात सूं पीड़ित लोगां में रोस भरीजण लाग्यो ओ असंतोख अर रोस ई जीवण रा तमाम दूजा छेत्रां में आपरै ढंग सूं साम्हीं आवण लाग्यो। आं ई लोगां में कीं संवेदणसील कवि अर कथाकार हा, जिकां रै सिरजण में हालात अर अबखायां मुखर व्ही। साहित्य रा पाठकां री मनगत ई बदळण लागी अर वां मांय सूं जिका नूंवां रचनाकार साम्हीं आया वांरी संवेदणा में औ गाढो असंतोख एक तीखी प्रतिक्रिया रै रूप में परगट हुयो।
भासा अर साहित्य रै हलकै में काम करण वाळा सिरजणधर्मियां रै साम्हीं आज सगळां सूं मोटी चिंता आ है कै भासा अर साहित्य री साख नै किण भांत कायम राखीजै। जीवण री जरूरतां अर लोगां री रुचियां में इत्ती तब्दीली आयगी कै खुद साहित्य री प्रासंगिकता आज चरचा रै घेरै में आयगी-सी लखावै। अैड़ै बगत में किणी भासा रै सिरजणहार रै काम नै समझणो अर उणरी कूंत करणी निस्चै ई जोखम रो काम लागै, जिणरी अंवेर-परख करतां लूंठा-लूंठा री ऊरमा निठ जावे। जोखम इण बात रो कै कोई रै साथै अणजाण्यां अन्याव नीं व्है जावै। केई लोगां नै इण बात रो भारी गुमान व्है कै बगत अर सगळी कायनात वांरै ई हलायां हालै अर वै नीं चावै तो किणी रूंखड़ै रो पत्तो ई नीं खुड़कै। पण अणभाव सूं तो आ ई बात पतीजै कै बगत किणरै ई दाव में नीं आवै, बगत रै दाव में केइयां रा दावा हळका अवस पड़ जावै। बगत रा केई रूप व्है। वो घड़ी-पुळ में बरतीजै- वो दिनां, महीणां, बरसां अर जुगां में आपरो गेड़ दरसावै, पण किणी गेड़ में वो बगत फुर नै पाछो कदैई नीं करै अर नीं कदैई खुद नै बगत सूं ऊपर अर अलायदो आंकै। विगत, वरतमान अर आगत रै अटूट क्रम में हरेक रचनाकार आपरी जीवण-जातरा अर काम नै इण भांत तेवड़ै, अंगेजै अर आपरै अणथक कमतर सूं उणनै पोखै कै उणसूं जीवण अर नूंवै सिरजण री आस पूरीजै-आठै तांई कै उणरो मिनख जमारै आवणो उणी रूप में सारथक गिणीजै।
साहित्य अकादेमी री अेक बात म्हनै आछी लागै कै वा तमाम भारतीय भासावां में सिरजण नै पूरो माण देवै अर इण पेटै वा मेजर या माइनर भासावां जिकी मायड़भासा संविधान री आठवीं सूची सूं हाल बारै है। म्हैं अर म्हारै जैड़ा सैंकड़ू राजस्थानी लिखारा आजादी-पाछला कित्ता ई बरसां सूं जिण मायड़भासा री मान्यता सारू बाट उडीकां, जे भारतीय लोकतंत्र में उणरी कोई सुणवाई नीं व्है, तो म्हांरौ निजू माण-सम्मान अठै कांई महत्व राखै।
जिण भासा में हजारूं बरसां री लूंठी साहित्य-परम्परा मौजूद रही व्है, कविता, कथा, नाटक अर गद्य री विधावां में ओपतौ सिरजण मौजूद व्है, हजारूं हस्तलिखित ग्रंथ अर छपियोड़ी पोथियां मौजूद व्है, लोककथावां, लोक-नाटकां, लोकगीतां अर ओखाणां रो अखूट भंडार मौजूद रह्यो व्है, जिकी आजादी सूं पैली रियासतां री राजभासा रही व्है, न्यारी व्याकरण मौजूद व्है, उण सजीव अर समरथ भासा नै संविधान री आठवीं सूची में कोई ठौड़ नीं दिरीजणी अेक अैड़ी पीड़ा है कै उणनै वो ई जाण सकै जिणरै साथै आ बीती व्है।
आ बात म्हैं अखराय नै कैवणी चावूं कै किणी हलकै विसेख री भासा अर संस्कृति सूं जुड़ियोड़ा जिका सवाल राजनीत री जाजम माथै आगै कदैई सलटावण रै ओळावै टाश दिया जावै, निरमोही बगत अर फुरता हालात फेरूं वांनै उणी सरूप अर सीध में सुळझण रौ संजोग कम ई देवै। उण समाज री चेतना अर सरोकारां में जे वै सवाल बरसां पछै ई किणी न्यावू निवेड़ै री उडीक में जागता दीख जावै तो वांरो निवेड़ो कीं व्है कै नीं व्है, उण समाज री जीवारी अर उणरै सिरजण री साख जरूर सांसत में पड़ जावै। राजस्थानी भासा री संवैधानिक मान्यता अर उणरै विकास रो सवाल अेक अैड़ो ई टाळियोड़ो सवाल है, जिणरो कोई न्यावू निवेड़ो म्हनै नैड़ो नीं दीखै। इणनै मुलक रा आगीवाणां री अदूरदर्सिता कैवां कै इतिहास री खामी, जिणरो खामियाजो इण भासा रा किरोडूं हिमायती अर लिखारा लारला साठ सूं बधीक बरसां सूं भोगता आया है अर आगै ई कुण जाणै कित्ता बरस औरूं भोगता रैवैला।
आज राजस्थानी समाज आपरै कारोबार, मैणत अर सूझबूझ सूं आखै मुलक में आपरी न्यारी पिछाण राखै। प्रदेस सूं बारै अर आखी दुनियां में मानवी विगसाव में आपरी ओपती भूमिका निभावै, लोकतंत्र री नींव मजबूत करै, पण विचारण री बात आ कै वौ आपरी जड़ां अर मायड़ भासा बाबत आपरी जिम्मैवारी नै कित्तो’क माण देवै। म्हैं मायड़ भासा रा आप सगळा सपूतां, भारतीय भासावां रा मौजीज लिखारां अर लोकतंत्र रा लूंठा हिमायतियां सूं अरज करणी चावूं कै आप कित्ताक बरसां तांई मून धारियां आपरी भासा रै साथै व्हेतै इण अन्याव नै यूं देखता रैवोला अर अेक जिम्मैवार नागरिक रै नातै मानवी अधिकारां अर लोकतंत्र री दुहाई देवतां कोई संकोच नीं करौला।
सेवट कद तांई?