राजस्थान रौ त्याग, स्वाभिमान, बळिदान, वीरता, ईश भक्ति अर मिनखपणौ जगचावौ। रवि ठाकुर जिसा विश्व कवि अर संवेदनशीळ व्यक्ति राजस्थान रै इण गुणां सूं घणा प्रभावित रह्या। वे आंतरिक भाव सूं राजस्थान सागै जुड़्योड़ा हा। वांरौ अंतस इसै उदात्त मानवीय गुणां सूं घणी प्रेरणा वांरै मानस में रच-पच’र अेक रचनात्मक उपलब्धि बण जावती। रवि बाबू रौ राजस्थानी संत साहित्य सूं ऊंडौ लगाव हौ। वांरै मन में ओ लगाव आचार्य क्षितिमोहन सेन पैदा कियौ। वांरी विख्यात पोथी ‘दादू’ री भूमिका में विश्व कवि खुद इण बात नै मानी है—“म्हैं अणजाणै हिन्दी साहित्य रै खांटी रस रूप रै फिराक में हौ। अेक दिन क्षिति बाबू रै मुख सूं बघेलखंड रै कवि ज्ञानदास रा दो अेक हिन्दी पद सुणवा रौ मोकौ मिळ्यौ तो म्हैं कह्यौ—ओ ई तो म्हैं चावै हौ।”
इतरौ ई क्यूं, दादू रा चेला सुंदरदासजी री दो भागां में छपी पोथी री भूमिका रविबाबू अंग्रेजी में मांडी ही। इणमें राजस्थान रै इतिहास, काव्य इत्याद माथै उणां आपरा विचार लिख्या है।
विश्व कवि री विख्यात पुस्तक ‘कथा ओ काहिनी’ (1899 ई.) में राजस्थान सूं संबंधित च्यार महताऊ कवितावां—‘नकलगढ’, ‘होरीखेला’, ‘विवाह’ अर ‘पणरक्षा’ संकलित है। इण संकलन री ‘विचारक’ कविता में ई राजस्थान रौ उल्लेख हुयौ है। पण वा पूरी कविता राजस्थान रै संदर्भ में कोनीं।
कविता ‘नकलगढ’ में रवि ठाकर लिखै—
''जल स्पर्श करब ना आर
चित्तौर राणार पण,
बूंदिर केल्ला माटिर परे
थाकबे यतक्षण।''
अर्थात चित्तौड़ रै राणै आ प्रतिज्ञा लीवी के जद ताणी बूंदी रौ किलौ जीत नीं लेवूं, अन्न-जळ ग्रहण नीं करूं। प्रतिज्ञा घणी करड़ी ही अर बूंदी रौ किलौ फतेह करणौ ई कोई सरल काम नीं हौ। बूंदी सूं टक्कर लेवणी अर किलौ कब्जै करणौ घणौ अबखौ काम हौ। होळै-होळै कोशिश कियां तो फतेह पण मिळ सकै ही, पण यूं ऊभघड़ी में बात किंयां बणती? जे प्रतिज्ञा मुजब महाराणौ अन्न-जळ छोड़’र बैठ जावै तो वांरौ शरीर छूट जावै।
चित्तौड़ रा सामंत-सरदारां अर दीवाण मंत्रियां आगळ अेक समस्या ऊभी हुयगी। अबै इसौ कांई मारग काढणौ के सांप मर जावै अर लाठी ई नीं टूटै। मोकळौ विचार कियां पछै अेक दीवाण रै दिमाग में अेक अटकळ आई। उण कह्यौ के महाराणा साब बिना कीं ऊंडौ सोच विचार प्रतिज्ञा लेयली। पण अबै इण प्रतिज्ञा री पालणा ई जरूरी अर महाराणा री प्राण रक्षा ई जरूरी। इण वास्ते यूं करौ के अेक माटी रौ नकली बूंदी रौ किलौ बणावौ अर पछै उण माथै आक्रमण करनै फतेह करलौ। इण भांत महाराणा री प्रतिज्ञा पूरी होय जासी अर वांरी प्राण रक्षा ई हुय जासी।
महाराणा री सेना में बूंदी रौ अेक हाड़ावंशी राजपूत सैनिक रै रूप में नौकरी करतौ। उणनै जद इण बात री ठा पड़ी तो उणरै रगत में उकाळौ आयौ—''म्हारै जीवतां जे मायड़भोम रौ अपमान होय जावै तो पछै म्हारै जीवण नै धिरकार है।'' वो माटी रै बणायोड़ै नकली किलै में छिपनै बैठग्यौ। महाराणा री तरफ सूं रीत रौ रायतौ पूरौ करण सारू आक्रमण रौ नाटक सरू हुयौ तो नकली किलै में गोळियां रौ बरणाट उडणौ मांड्यौ। राणा रा सैनिक हाक-बाक होयग्या के ओ फेर कांई तमाशौ? छेवट मोकळा सैनिकां नकली किलै नै च्यारूं मेर सूं घेर लियौ। वीर हाडौ खोळियै में प्राण रह्या जठा लग नकली किलै री रक्षा करतौ रह्यौ। सेवट रणखेत में प्राण दियां पछै ई राणा रा सैनिक बूंदी रै नकली दुर्ग माथै कब्जौ कर सक्या।
मायड़भोम री रक्षा में प्राणोत्सर्ग री भावना दाखवनां नकली किलै सारू आपरा प्राण देवणिया वीर री गाथा रौ काव्य में वर्णन करनै विश्व कवि राजस्थान री इण अमर घटना नै उजागर करण री कोशिश करी है।
इणी’ज भांत रविठाकर अेक दूजी कविता ‘पणरक्षा’ में राजस्थान रै इतिहास री अेक औरूं वीरतापूर्ण घटना रौ वर्णन घणै ओज सागै कियौ है। इण कविता में कवि बतायौ है के अजमेर माथै जोधपुर राज रौ कब्जौ हौ। अजमेर किलै रौ भार डूमराज नाम रै अेक वीर सैनिक नै सूंप्योड़ौ हौ। किलै माथै अंग्रेज सेनापति री अगुवाई में मराठां रौ आकमण हुयौ। वीर डूमराज मुकाबलौ करण री पूरी त्यारी करली अर मन में पक्की तेवड़ली के माथौ कटनै धरती माथै नीं पड़ जावै, जठा लग कोई नै किलै में पांवडौ नीं धरण दूं।
उठीनै जोधपुर महाराजा दुस्मण सागै समझौतौ कर लियौ अर अजमेर डूमराज कनै संदेसौ भेज्यौ के अजमेर रौ किलौ आक्रमणकारियां नै बिना कोई विरोध रै सूंप दियौ जावै। पण वीर डूमराज महाराजा रै हुकम री कोई परवाह नीं करी अर दुस्मण रौ डट'नै मुकाबलौ कियौ। आक्रमणकारी तो जोधपुर महाराजा रै हुकम सूं नचींता हुयोड़ा हा के अजमेर रौ किलौ वांनै आदरमान सागै निजर कियौ जासी, पण उठै दूजी रामत देख’र वे अचूंभै में पड़ग्या। जोर को घमसाण हुयौ अर छेवट डूमराज रै प्राणोत्सर्ग पछै ई आक्रमणकारी किलै में पांवडौ देय सक्या।
विश्व कवि रै मानस रै इसा उदात्त राष्ट्रीय भाव घणा अपील करता। इण कारण वे राजस्थान री आं शौर्य गाथावां सूं घणा प्रभावित हा। राजस्थान यात्रा रै दरम्यान जद वांनै डिंगल काव्य पाठ नै रूबरू सुणण रौ मौकौ मिळ्यौ तो वे राजस्थानी साहित्य रा पक्का मुरीद बणग्या। उणां इण धरती रै जीवण मूल्यां माथै रचित साहित्य री ऊजळै मन सूं घणी तारीफ करी।
विश्व कवि राजस्थान रै अेक औरूं आख्यान माथै ओपती काव्य रचना करी है। कविता रौ शीर्षक है—‘विवाह!’ इणमें राणा रामसिंह रै विवाह प्रसंग रौ वर्णन है। खूब धूमधाम अर आणंद मंगळ सागै राणै रौ ब्याव होय रह्यौ है। शहनाई रा मीठा सुर च्यारूंमेर गूंज रह्या है। इतराक में रणभेरी रौ नाद सुणीजै। मध्युग रौ वातावरण ई इण प्रकार रौ हौ के किण वखत कांई घटित जावै इणरी कोई गारंटी नीं ही। मंगळीक मौकां रे बिचाळै युद्ध रा नगाड़ा बाजण लाग जावता।
राणा रामसिंह रै विवाह रै बिचाळै सागण आ ई बात हुई। बर मांगलिक अवसर ढलौ करनै सीधौ रणखेत में पूगौ अर उठै काम आयग्यौ। नववधु नै जद इण बात री जाण पड़ी तो सती होवण नै त्यार हुयगी। फूलां री सेज री ठौड़ आपरा पति सागै उणै अगनसेज माथै आपरौ आसण जमायौ। विश्वकवि इण करूण दरसाव रौ घणौ मार्मिक वर्णन कियौ है—
“घन-घन जागल हुलू ध्वनि
दले दले आसे पुरांगना।
कय पुरोहित ‘धन्य सुचरिता!’
गाहिछै भाट ‘धन्य मृत्यु जिता।’
धू धू करै ज्वल उठल चिता
कन्या बसे आछेत योगासना।
जय ध्वनि उठै श्मसान मा झे,
हुलू ध्वनि करे पुरांगना।”
विवाह में शहनाइयां रा मीठा सुरं गूंजै हा। कुल वधुवां रा झूलरा आवै हा। कुल पुरोहित सब कैवै हा—''इण महान नारी नै धिन्न है।” भाट गावै हा—''मौत नै जीतण आळी नारी नै धिन्न है।''...के धू! धू! करती चिता बळवा लागी, वधु कन्या योगासण री मुद्रा में बैठगी। मसाण में जै-जै कार होवण लागी।
इण भांत विश्व कवि राजस्थान रा कई आख्यानां अर वीरगाथावां नै आपरै काव्य रौ विषय बणायौ। वांरौ मानस राजस्थान रा उदात्त मानवीय गुणां सूं घणौ प्रभावित हौ।