राजस्थान रौ भील आंदोलन भारतीय स्वाधीनता संग्राम रै इतिहास रौ अेक उपेक्षित पानौ। अेक भूली बिसरी घटना। पण अेक आदिवासी कौम जिण भांत संगठित होय’र निरंकुश सत्ता रौ मुकाबलौ कियौ, आ काबिले-तारीफ बात। मानगढ री भाखरी माथै गुरू गोविंद रै मेळै में सदीव रै ज्यूं हजारूं भील भेळा हुया तो अंग्रेजी फौज अर रियासती सेनावां मिळ’र 2500 भीलां नै मार नांख्या। भाखरी माथै लाशां रौ साथरौ बिछग्यौ। छतांपण आंदोलन में कोई कमी नीं आई अर वो ठेट स्वतंत्रता प्राप्ति तांई निरंतर चालतौ रह्यौ।

 

राजस्थान रौ दक्खण पूरबी भाग पहाड़ी अर पठारी है। इण क्षेत्र में कई जनजातियां निवास करै। यां में भील मैणा अर गरासिया प्रमुख है। इण भाग में डूंगरपुर, बांसवाड़ौ, सिरोही, दक्खणी मेवाड़ ईडर, उत्तर गुजरात अर माळवा रौ कीं प्रदेस आय जावै। दूर-दूर तांई फैली परबत श्रृंखलावां सपाट पठारी भाग, अनेकूं नदी नाळा अर हरियल वनस्पति इण भोमका री विशेषतावां है। आवगमण रा मारग दुरगम अर सभ्य मानव समाज सूं सदीव दूर रैवण रै कारण अठैरी आदिवासी कौमां आपरी न्यारी निरवाळी सभ्यता-संस्कृति अर रीत भांत राखै।

 

भील भारत री प्राचीनतम कौमां में सूं अेक है। 1981 री जनगणना मुजब भारत में यांरी कुल जन संख्या दो करोड़ रै लगै-टगै ही। इण कौम री उत्पत्ति बाबत कई दंतकथावां प्रचलित है। कर्नल टाड यांनै वन पुत्र अर ‘जंगळी शिशु’ री पदवी दी। महाराणा प्रताप री फौज में घणकरा भील सैनिक ई हा, जिणां मुगल आक्रमण री वखत महाराणा नै महताऊ योगदान दियौ।

 

सदीव सूं दूजी आदिवासी कौमां रै ज्यूं भील ई अंध विश्वासी, निरधन अर वनवासी बण्या रह्या। रजवाड़ी शासन में आ कौम ‘जरायम पेशा’ गिणीजती अर इणरै सागै बरताव ई इण भांत रौ इज करीजतौ। पण यूं भील अेक स्वतंत्र प्रकृति री कौम है। आ आपरै माथै कोई रौ धणियाप सहन नीं करै यांनै आपरै परंपरागत रीत रिवाज सूं अणूंतौ लगाव रैवै। इण में कोई प्रकार री दखलंदाजी अे स्वीकार नीं करै। ओ इज कारण है के जद कदैई यांरै परंपरागत रीत रिवाजां में दखलंदाजी करीजी, इणां उणरौ विरोध कियौ। उदाहरण सरूप अठारवीं सदी में इणां मराठां रै खिलाफ संघर्ष कियौ तो उगणीसवीं सदी में अंग्रेजां रै विरुद्ध विद्रोह कियौ।

 

अेक आदिवासी कौम कानी सूं विदेसी सत्ता रौ विरोध अर लोकगीतां में वांरी चालां रौ भंडाफोट अेक विचित्र बात लखावै पण अर अेक हकीकत है। इण लोक काव्य में अंग्रेजी सत्ता नै छळी, दुष्ट अर प्रपंची बताई है, जिकौ भुलावै में नांख’र छळ-बळ सूं इण धरती माथै आपरौ प्रभुत्व कायम करती जाय री है।

 

राजस्थान प्रदेस री राजनैतिक जन जागृति में भील आंदोलन आपरी ठावी ठौड़ राखै। इण आंदोलन रौ आपरौ न्यारौ इतिहास है। इणरौ जे ठेट सूं अध्ययन करां तो जाण पड़ै के ओ आंदोलन मेवाड़ क्षेत्र सूं प्रारंभ हुयौ। इण आंदोलन नै चलावण वास्तै दौलजी काळा, गुरू गोविंद अर मोती लाल तेजावत जिसा जोगा नेता मिळग्या, जिणां रै पाण ओ आंदोलन बरसां लग चालतौ रह्यौ। गुरू गोविंद रै वखत में तो गोरी सत्ता अर रजवाड़ां मिळ'नै अेक मेळै में भीलां रौ जिकौ नरसंहार कियौ वो पंजाब रा जलियांवाळा कांड नै ई लारै राखै। 7 दिसंबर 1904 रै दिन मानगढ री भाखरी माथै पनरै सौ भीलां नै मार नांख्या। इण घटना री मूळ नै समझण वास्तै भील आंदोलन रौ पूरौ इतिहास समझणौ पड़सी। इण आंदोलन रौ पैलड़ौ चरण भील नेता दौलजी काका रै सागै आरंभ होवै।

 

भीलनेता दौलजी खीची

 

जद मेवाड़ रै तत्कालीन महाराणा भीमसिंह री अंग्रेजां सागै संधि हुयगी तो उणां अंग्रेजां रै कैवण सूं भोमट क्षेत्र रा भीलां सागै छेड़छाड़ शुरू करी। भीलां नै कनला गांवां सूं ‘रुखाळी कर’ अर ‘भोळाई कर’ चौकीदारी अर जात्रियां री सुरक्षा पेटै मिळता। जद राज अे कर खुद उगावणा मांड्या तो भीलां इणरौ विरोध कियौ। भीलां नै दौलतसिंह खीची जिसौ जोगौ नेता मिळग्यौ जिणसूं ओ आंदोलन सफळता सूं चालतौ रह्यौ।

 

दौलजी खीची जवास रा ठाकर हा। भील समाज में वे दौलजी काका रै नाम सूं ओळखीजता अर देवता रै उनमान पूजीजता।

 

मेवाड़ शासन भोमट क्षेत्र रौ प्रबन्ध अंग्रेजां नै सूंप दियौ। विद्रोह हुयां अंग्रेजां दमन प्रारंभ कियौ। भीलां नै दबावण वास्तै 14 पुलिस थाणां री थरपणा करीजी। आ सगळी व्यवस्था भीलां नै घणी अखरी। छेवट दौला काका री योजना मुजब अेकण सागै चवदै ई थाणां माथै भीलां हमलौ कर दियौ। थाणां रा सैनिक भीलां रा तीखा तीरां सागै पड़ भागा। भीलां खैरवाड़ा री फौजी छावणी माथै ई आकमण कर दियौ। भील विद्रोह रौ ओ प्रथम विस्फोट हौ।

 

अंग्रेज इण बात नै तुरंत समझग्या के इण वनवासियां सूं राड़ मांडनै पार पड़णौ दोरौ काम है। इण वास्तै उणां दौला काका सूं समझौतौ कर लियौ। खेरवाड़ा छावणी में ‘भील कोर’ रै नाम सूं अेक न्यारी भील सेना त्यार करली। दौलजी नै भील कोर रा मुखिया मुकर किया अर अेक सौ रुपिया मासिक पगार तै कियौ।

 

सन् 1858 में भारत में कंपनी री हकूमत खतम हुई। इणरै पछै महाराणी विक्टोरिया रै शासन काल में कई सुधार आयोजित हुया। राजस्थान रा भील क्षेत्र में जनगणना, दारूबंदी अर पुलिस चौकियां री थरपणा इत्याद रा काम हाथ में लिरीज्या। भीलां इण कामां नै शंका री निजर सूं देख्या, उण दिनां अफगान युद्ध चालू हो सो जनगणना रौ ओ मतळब लिरीज्यौ के सगळा मोट्यार भीलां नै पकड़’र मोरचै माथै भेज दिया जासी।

 

इण भांत मांयनै रौ मांयनै असंतोष वधतौ रह्यौ अर भांत-भांत री शंकावां पनपती रही। छेवट भील आंदोलन रौ दूजोड़ौ विस्फोट मार्च 1881 में हुयौ। हजारां भीलां भेळा हुयनै ‘बडेपाल’ रा पुलिस थाणै नै घेर लियौ अर थाणैदार सहित सोळै सिपाहियां नै मार नांख्यां। उदयपुर खेरवाड़ा रौ मारग रोक लियौ अर सगळी दुकानां लूट ली। हालात इतरा नाजुक अर गंभीर बणग्या के ब्रिटिश सरकार राजस्थान रै अेजेंट टू गवर्नर जनरल नै लिख्यौ के तुरंत उदयपुर पूग’र स्थिति काबू में करै।

 

छेवट महाराणा रै व्यक्तिगत प्रयत्नां सूं 19 अप्रैल 1881 नै भीलां सागै समझौतौ हुयौ, जिण में भीलां री सगळी मांगां स्वीकार करीजी। जनगणना बंद करीजी अर हमाल अर भीलां नै क्षमादान दिरीज्यौ।

 

इतरौ सै कीं व्हैतां थकांई भील क्षेत्र में स्थाई शांति अर व्यवस्था कायम नीं होय सकी। शासन अर भीलां रै बिचाळै बार-बार टक्कर होवती रही अर भील, शासन नै आपरी आजादी रौ रोड़ौ समझता रह्या। आगै चाल’र गुरू गोविंद रै नेतृत्व में भील आंदोलन रौ तीजौ विस्फोट इतरौ भयंकर हुयौ के सगळां रौ ध्यान उण कानी आकर्षित होयग्यौ।

 

गुरू गोविंद

 

गुरू गोविंद रौ जनम 20 दिसम्बर 1858 रै दिन डूंगरपुर रियासत रै बांसियां गांव में अेक बिणजारा परिवार में हुयौ, वे टाबरपणै सूं ई बड़ा संस्कारी हा। मोटा हुयां उणां गळै में रुद्राक्ष धारण कियौ अर सन्यासी रौ जीवण व्यतीत करण लाग्या। धीरै-धीरै वांरै चेलां री संख्या वधवा लागी।

 

ओ जमानौ स्वामी दयानंद सरस्वती रौ हौ। च्यारूंमेर स्वामी जी अर वांरै आर्य समाज री चरचा जोरां पर ही। गुरू गोविंद माथै ई इण वातावरण रौ प्रभाव पड़्यौ। सन् 1880 में स्वामीजी जद राजस्थान पधार्‌या तो गुरू गोविंद रौ वां सूं परतख संपर्क हुयौ। आदिवासियां नै संगठित कर'नै संस्कारी अर सभ्य बणावण रौ व्र्त उणां स्वामीजी सूं ई लियौ हौ, जिणनै वां जीवण लग निभायौ। इण वास्तै उणां री बणायोड़ी ‘संप सभा’ कोई राजनैतिक संस्था नीं ही अर नीं उणरौ उद्देश्य ई राजनैतिक हौ। ओ अेक विशुद्ध सुधारवादी सामाजिक संगठण हौ, जिण रौ उद्देश्य सांस्कृतिक हौ। पण गोरी सत्ता अर राजावां इणनै राजनैतिक संगठण मान’र संप सभा रै समारोहां नै विद्रोहात्मक मान लिया।

 

संप सभा रा उद्देश्य भीलां में मद्य निषेध, चोरी डकैती रौ त्याग, शिक्षा प्रचार, मैणत-मजूरी, खेती माथै जोर, सात्विक जीवण, ईश्वर में आस्था, पंचायतां रौ निरमाण, अदालतां रौ बहिष्कार, वेठ-वेगार रौ विरोध, विदेसी वस्तुवां रौ बहिष्कार अर नित्य हवन करण इत्याद रौ प्रचार करणौ हौ।

 

संप सभा रै संगठण रौ प्रारंभ सिरोही जिलै रै भील छेत्र सूं हुयौ अर धीरै-धीरै ओ संगठण राजस्थान रै पूरै दक्खणी पूरबी क्षेत्र में फैलग्यौ। भीलां गांव-गांव संप सभा री थरपणा करी अर गूरू गोविंद रै हाथ सूं रुद्राक्ष रौ मणकौ गळै में पेहर नै सगळा भगत बणग्या। इणां दारू मांस रौ भक्षण अर चोरी डकैती रौ त्याग कर दियौ। वेठ वेगार काढणी बंद कर दी। गुरू री आज्ञा मुजब हरेक भगत घर में धूणी राखण लाग्यौ अर नियमित रूप सूं घी खोपरौ होम नै नितरोज हवन करण लाग्यौ।

 

भील समाज में गुरू गोविंद रौ इतरौ प्रभाव रौ के वांरै जबान सूं निकळ्योड़ौ बोल भीलां वास्तै अलिखित कानून हौ। वांरै संकेत मात्र माथै भील माथौ देवण नै त्यार रैवता। लाखां भीलां रा वे अे मात्र धारमिक नेता हा।

 

सन् 1903 में गुरू गोविंद मानगढ री पहाड़ी माथै आसण जमायौ। उठै उणां धूणी री थरपणा करी अर मिगसर सुद पूनम रै दिन मेळै रौ आयोजन कियौ। डूंगरपुर, बांसवाड़ा अर गुजरात रा हजारूं भील इण मेळै में भेळा हुया। होम वास्तै लायोड़ा नाळेरां रौ ढिग लागग्या।

 

इण भांत 1903 में प्रारंभ हुयोड़ौ ओ मेळौ हर बरस मिगसर सुद पूनम नै भरीजतौ रह्यौ अर 1907 तांई सुख शांति सूं चालतौ रह्यौ। इण तरै सूं ओ मेळौ ‘संप सभा’ रौ वार्षिक अधिवेशन बणग्यौ। इण मौकै हरेक गांव रौ मुखियौ उठै आवतौ अर साल भर में हुई आपरै गांव री प्रगति रौ लेखौ गुरू रै सामी पेस करतौ। मेळै में डेढ़ दो लाख भील हर बरस भेळा होवण लाग्या।

 

‘संप सभा’ रै प्रचार-प्रसार सूं भीलां में घणी जागृति आई। डूंगरपुर, बांसबाड़ा, गुजरात, माळवा अर मेवाड़ क्षेत्र रा सगळा भील संगठित होयग्या। उणां सामंती शासन रै शोषण रौ विरोध सुरू कियौ। जठै कठै ई अन्याव के अत्याचार होवतौ सगळा संगठित होय'नै उणरौ प्रतिरोध करता, इण सूं सगळा रियासती राजावां रै मन में खतरौ बैठग्यौ। उणां मिळ’र संगठित रूप सूं इण संगठण नै तोड़ण रा प्रयत्न चालू किया।

 

सन् 1903 में जिण वखत ‘संप सभा’ रौ सालीणौ अधिवेशन मानगढ रै मेळै रै रूप में मिगसर सुद पूनम रै दिन होवण लाग्यौ तो डूंगरपुर, बांसवाड़ा अर कुशलगढ रै राज-परस्मित लोगां अें.जी.जी सूं मिळ'नै अरज करी के इण क्षेत्र रा भील भेळा होयनै ‘भीलराज’ री थरपणा करणी चावै। इण वास्तै इणरौ प्रबंध कियौ जावै। इणी’ज भांत गुजरात रै सुथरामपुर रै राजा गोधारा अर अहमदाबाद रै कमिश्नरां नै तार करनै सूचना दीवी के डोढ लाख भील भेळा होयनै म्हारौ खजानौ लूटणी चावै। इणी’ज तरै री सूचना बड़ौदा अर देवगढ बारिया रा राजावां नै ई दिरीजी सूचना में इण बात रौ विशेष उल्लेख करीज्यौ के भील गुरू गोविंद रै नेतृत्व में आकमण करनै ‘भील राज’ री थरपणा करणी चावै। इण वास्तै वखत सर सुरक्षा रौ प्रबंध होवणौ चाइजै।

 

भीलां में आई जागृति नै नष्ट करण सारू अर भील संगठण नै तोड़ण सारू अंग्रेजां अर देसी रजवाड़ा रौ ओ अेक सिरोळौ षड्यंत्र हौ। इण षड्यंत्र में दोनूं शक्तियां रा स्वार्थ निहित हा। भीलां नै दबायोड़ा राखणा दोनूं रै हित में हौ।

 

इण वास्तै राजावां री प्रार्थना माथै अें.जी.जी. खैरवाड़ा री छावणी नै मानगढ रै मेळै माथै हमलौ करनै गुरू गोविंद नै गिरफ्तार करण रौ हुकम देय दियौ। मदद वास्तै अहमदाबाद अर बड़ौदा सूं सेना अर मशीनगनां ई मंगाईजी।

 

राजस्थान रौ जलियांवाळा कांड

 

7 दिसम्बर 1908 तदनुसार वि. सं. 1965 री मिगसर सुद पूनम रै दिन मानगढ री भाखरी माथै ‘संप सभा’ रौ मेळौ भरीजण वाळौ हौ। गुरू गोविंद री धूणी विशेष रूप सूं धुखै ही। बूढा-टाबर, लुगाई मरद अर मोट्यार लाखुं भील दूर-दूर सूं मेळै में आयोड़ा हा। भजन कीरतन अर होम हवन चालै हौ। धूणी कनै नाळेरां रा ढिग लाग्योड़ा हा। श्रद्धाळु भगत भावना सूं गुरू गोविंद रा दरसण परसण करै हा। मेळौ लारला कई बरसां सूं भरीजतौ रैवण सूं इण बरस जबरौ भरीज्यौ हौ। च्यारूंमेर रंगरोळी मच्योड़ी ही के रंग में भंग पैदा हुयौ। खेरवाड़ै री छावणी सूं सेना आई अर भाखरी नै घेर ली। रंग बिरंगी पोशाकां धारण कियां भील जनता आणंद में मगन ही के सेना रै घेरै री जाण पड़तांई भगदड़ माचगी। जिणनै जठीनै मौकौ मिळ्यौ भाग छूटौ। पण पूरौ मेळौ सशस्त्र फौज सूं घिर्‌योड़ौ हौ सो बरगाट करती गोळियां री रीठ बाजण लागी। इण नरसंहार में खेरवाड़ा री छावणी रै अलावा गुजरात री सेना ई भेळी ही। देखतां-देखतां मेळै में खून री होळी खेलीजण लागी। धूणी रै च्यारूंमेर लाशा रौ घोकड़ लागग्यौ। मानगढ री भाखरी माथै कोई डोढ हजार लाशां रौ साथरौ बिछग्यौ।

 

गुरू गोविंद नै गिरफ्तार कर लियौ अर उणां माथै मुकदमौ चलाय'नै फांसी री सजा सुणाय दी। मानगढ वाळौ घेरौ अर कत्लेआम इतरौ वीभत्स हौ के इणरै आगै पंजाब रौ जलियांवाळा कांड ई फीकौ पड़ जावै। आगै चाल’र अपील पेस हुयां गुरू गोविंद री फांसी री सजा दस बरस री जेळ में बदळगी जेल सूं छूट्यां पछै गुरू गोविंद काठियावाड़ री बड़ी स्टेट रा कबोई गांव में कुटिया बणाय’र रह्या अर उठै इज वांरौ प्राणांत हुयौ।

 

इण भांत गुरू गोविंद कानी सूं संचालित अेक विशुद्ध सुधारवादी अर सांस्कृतिक आंदोलन नै विदेसी सत्ता अर देसी रजवाड़ां मिळनै नष्ट करण री भरपूर कोशिश करी, पण इण काम में वांनै पूरी सफळता नीं मिळी। मानगढ वाळै नरसंहार अर गुरू गोविंद री जेळ यातना रै उपरांत ई भीलां में जिकौ चेतना आयगी ही वा नीं मिट सकी। ताकत रै जोर माथै जन चेतना नै दबावण रा उदाहरण संसार में मोकळी ठौड़ देखवा में आवै पण उणरौ नतीजौ उल्टौ निकळै। दमन सूं जन जागृति में उल्टी बढोतरी होवै।

 

गुरू गोविंद पूरा पच्चीस बरसां तांई भीलां रै उत्थान वास्तै जिकौ काम कियौ, उणरी जड़ां घणी ऊंडी ही। संप सभा रौ काम मोळौ पड़्यौ तो मोतीलाल तेजावत रै नेतृत्व में ‘अेकौ’ नाम रौ अेकै नुंवौ संगठण दुगणा जोश सागै काम करण लाग्यौ।

 

मोतीलाल तेजावत

 

मोतीलाल तेजावत रौ जनम सन 1886 में उदयपुर जिलै में कोलियारी तहसील रा पळासिया गांव में अेक जैन परिवार में हुयौ। सरुपांत में अे झाड़ौल ठिकाणै में कामदारपणौ करता। इण नौकरी में रैवतां उणां सामंती अत्याचार अर आदिवासी प्रजा रौ शोषण देख्यौ तो इणां ठिकाणै री नौकरी छोड़ दी।

 

संप सभा रै ज्यूं इणां ‘अेकौ’ आंदोलन प्रारंभ कियौ। संप सभा अेक सुधारवादी संगठण हो पण ‘अेकौ’ अेक राजनैतिक आंदोलन हो। मूळ में संप सभा सूं आई जागृति अेका आंदोलन रौ आधार बणी।

 

सन् 1921-22 में मेवाड़ में भू-राजस्व वसूली अर जमीन रै पट्टां रौ काम शुरू हुयौ। भीलां री खास मांग आ ही के भू-राजस्व भेळौ करण री न्यारी-न्यारी पद्धतियां री ठौड़ सगळा भील क्षेत्र अेक इज पद्धति काम में लिरीजणी चाइजै।

 

रियासती शासन भीलां री मांग माथै कोई ध्यान नीं दियौ। इणरै खिलाफ मोतीलाल तेजावत रै नेतृत्व में आंदोलन प्रारम्भ हुयौ। इण बाबत विजय नगर कनै नीमड़ा गांव में अेक सभा रौ आयोजन हुयौ। इण सभा में हजारूं भील भेळा हुया। अे सगळा दांता, पालणपुर अर ईडर इत्याद सूं भेळा हुया हा। उणी वखत सेना इणां नै घेर लिया अर गोळियां बरसावणी शुरू करी। कोई हजार-बारै सौ भील अठै काम आया। मोतीलाल तेजावत रै पगां में छर्रा लाग्या। भील उणांनै उठाय नै लेग्या। इणरै पछै वे आठ बरसां तांई भूमिगत रह्या अर टेट 1929 तांई गुप्त रूप सूं आंदोलन रौ संचालण करता रह्या।

 

तेजावत रै भूमिगत रैवण री अवधि मे आम जनता में भ्रम फैलावण वास्तै सरकार कोई आदमी रौ माथौ वाढ नै भील क्षेत्र में फेरियौ अर प्रचार कियौ के तेजावत नै मार नांखियौ। पण इण झूठा प्रचार सूं भीलां माथै कोई असर नीं पड़्यौ।

 

इण बीच में मेवाड़ सरकार नै ठा पड़ी के तेजावत सिरोही रियासत में कठैई छिप्योड़ौ है। छ: महीनां तांई तलाशी चालती रही पण कोई नतीजौ नीं निकळ्यौ।

 

छेवट महात्मा गांधी री सलाह सूं सन् 1921 में मोतीलाल तेजावत ईडर रियासत रै खोड़ा गांव में गिरफ्तारी देय दी। तेजावत नै मेवाड़ में जेळ हुई अर 1936 तांई पूरा सात बरस कैद में रह्या। इणरै अलावा 1938 अर 1942 में वांरी फेरूं गिरफ्तारी हुई।

 

5 दिसंबर 1963 रै दिन आदिवासियां रै इण महान मसीहा रौ देहांत होयग्यौ।

 

इण भांत दौलजी काका रै नेतृत्व में प्रारंभ हुयोड़ौ भील आंदोलन ठेट स्वतंत्रता प्राप्ति तांई चालतौ रह्यौ। डूंगरपुर रै पूनावाड़ा गांव में 19 जून 1947 नै नाना भाई भील अर बारै बरस री अेक बाळिका काळी बाई री शहादत इण बात री साख भरै के स्वतंत्रता प्राप्ति रै दो महीनां पैली तांई भीलां नै आपरै हकां सारू लड़णौ पड़्यौ।

 

भीली लोकगीत

 

रई ने केवुं बोले रे भूरियुं आवेरे!
पूछतूं-पूछतूं आवे रे भूरियुं आवेरे
मगरे मगरे आवे रे भूरियुं आवेरे
दक्खण देसू आवे रे भूरियुं आवेरे
कुण मोटू मगरू रे भूरियुं आवेरे
आबू मोटू मगरू भूरियुं आवेरे
पूछतूं-पूछतूं आवे रे-भूरियुं आवेरे
आबू लगतूं लीधुं रे भूरियुं आवेरे
हरीफरी नै जुवै रे भूरियुं आवेरे
हिरोही वाळूं राजा-भूरियुं आवेरे
भोळू राजा भोळू-भूरियुं आवेरे
म्हारै खोलड़ौ मांडू-भूरियुं आवेरे
भूरियुं कोठी मांडै-भूरियुं आवेरे
बावन राजा माथै-भूरियुं आवेरे
नवी कानून काढै-भूरियुं आवेरे
आबू लई लीधूं-भूरियुं आवेरे
भूरियुं राज करे-भूरियुं आवेरे
गीत जातू मेलो-भूरियुं आवेरे

 

भावानुवाद

 

दक्खण देस सूं रवानै हुय’र अंग्रेज पूछतौ पूछतौ ठेट आबू पूगग्यौ। सिरोही रै राजा नै भुलावै में नांख’र उणै आबू माथै रैवण रौ हुकम लेय लियौ। राजा घणौ भोळौ है। वो अंग्रेजां री चालाकी नै समझै कोनीं। (पण भील इण चालाकी नै समझग्या है) देखतां-देखतां अंग्रेज आबू माथै कोठियां ऊभी करली है। नित नुंवा कानून काढ’र बावन रजवाड़ा माथै राज करै है। दुख इण बात रौ है के आबू विदेसियां रै हाथ में आयग्यौ है। ...अबै गीत समाप्त करौ।

 

प्रथम भील नेता दौलजी खीची री तारीफ में कह्योड़ा किणी अज्ञात कवि रा च्यार सोरठा

 

गड़गड़ त्रंबक गाज, फौजां बिच राड़ां फिरै।
लड़ लड़ दौला लाज, थूं थारी राखी थळी॥

वहकै त्रबक तूर, गहकै गोळा ग्रिध घणा।
नरपण वाळौ नूर, दीसै तुझ रव दौलता॥

काळा मगरा केक, रुधिरै ताजा रंगिया।
अधपत लिया अनेक, (थनै) दूणौ रंग है दौलता॥

थट दीखी थाकाह, काका सूं लड़तां कही।
है जस रा हाकाह, (थारा) दुनिया मांही दौलता॥

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : नृसिंह राजपुरोहित ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
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