‘राजस्थान’ नांव तो रजवाड़ां कै अेकमेक होयां पाछै पड़्यो, पण राजस्थानी की अेकरूप संस्कृति का ऊजळा चतराम तो पीढ्यां सूं भक्ति, वीरता अर सरजण का संस्कार जगार्या छै। बोल्यां को आंतरो तो पूरा मुलक में थोड़ा-थोड़ा फासला पै दीखै छै, पण हरदा की हलोळ में तो यो पूरो राजस्थान, जादा सरकां तो पूरो गुजरात, मालवो अर राजस्थान अेक ई परवार लागै छै; ज्ये देस भर की सांस्कृतिक अेकता की पछाण की नींव बी छै। रजवाड़ी हकूमतां नै आपणा-आपणा राज की नराळी-नराळी पछाण्यां राखबा कै लेखै यो बोल्यां को फरक और जादा चोड़ो कर्या राख्यो।
वीरगाथा काल में, आगै जा’र चारण काव्य-परम्परा में बी राजस्थानी भासा का छोटा आंचलिक भेद तो दरसै छै, पण संस्कृति की गंगा तो सब नै अेकमेक कर’र बै’री छै। महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, जयमल फत्ता, हाडी राणी, मीरांबाई अर संत पीपा पै आज पूरो राजस्थान गरब करै छै। ईं लेखै अर बगत की जरूरत नै देखतां थकां या जरूरी छै कै राजस्थान का अंचलां की बोल्यां का आपसी मेळ सूं या भासा रूप धारण कर री छै, वां राजस्थानी फैल्यां आपणै सबकी मान्यता धारण करै। सरकार सूं मान्यता मनवाबा कै लेखै बी या समज घणी जरूरी छै। ईं वास्तै हाड़ौती भासाका पुस्ट आधार होतां, सतां अर बेदां की भासा में हाड़ौती का सरूप दरसण करतां सतां बी ईं लेख को सीरसक राख्यो– ‘हाड़ौती अंचल की राजस्थानी कविता’।
हिन्दी साहित्य का जागरण-काल कै साथै ई राजस्थानी का बी जागरण-काल की सरूवात मानी जा सकै छै। जद राजस्थानी कविता नै डिंगल की परम्परा सूं अर कविता का सास्तर सूं सगपण ढीलो कर’र आम जनता सूं साक्सात्कार कर्यो अर जनता की बोली नै अपणा’र जन-चेतना की सरूवात करी। ईं जगां आपणी ठोस पछाण ले’र ऊबा दीखै छै महाकवि सूर्यमल्ल, ज्यांकी ‘वीर सतसई’ में मुलक नै आजाद देखबा की हूंस अर देस का हालात को तीखो बरणन मलै छै। वांनै अठी-उठी ज्ये सेंकड़ां कागद मांड्या वां मैं राजस्थानी गद्य को बी रूप दरसै छै।
सूर्यमल्ल की वा भासा जनता की बोली कै नजीक छी अर रजवाड़ा का कामकाज की बी भासा छी। आजादी की लड़ाई के लेखै जन-चेतना जगाबा कै वास्तै बी भासा की या जातरा घणी काम आई। पूरा राजस्थान में जन कवियां नै बोलचाल की बोली सूं जुड़’र अस्यो काव्य रच्यो कै गांव-गांव अर ढाणी-ढाणी में आजादी की अलख गूंजती। हाड़ौती में अस्या जन कवियां में आगै जा’र नयनुराम शर्मा, मोतीलाल पहाड़िया, भैरूलाल नंदवाना, भंवरलाल स्वर्णकार, मांगीलाल भव्य, नानकजी भील, गौरीलील घड़ीसाज, मांगीलाल निरंजन, भैरव लाल कालाबादल, बंसीधर पुरोहित, बिहारीलाल पारीक, बालकृष्ण थोलंबिया, देवीलाल चतुर्वेदी, जस्या रचनाकार सामै आया। साहित्य की भासा राजस्थानी की नींव मजबूत करबा में लोक भासा का यां रचनाकारां को घणो योगदान छै।
जन-चेतना की ईं कविता सूं जणां-जणां में चेतना को उछाळो आयो अर आजादी की बेदी पै समरपण का भाव की आहूत्यां पड़ी। चेतना पसराबा में कविता की तागद बी समझ में आई। बरड़ : बिजोलिया : का आन्दोलन का सांचा सस्तर तो ईं कविता नै ई तैयार कर्या। पण दुरभाग अस्यो कै बोली सूं जुड़ाव की या कविता साहित्य में आदर नै पा सकी। आगै जा’र ईं बोली की नींव पै बोली को यो महातम नै समजबा सूं ई राजस्थानी भासा का सरूप पै सवाल खड़ा होया, ज्यां को समाधान अब करणो पड़र्यो छै।
लोक कवियां का जन चेतना काव्य की जातरा का आगला पगत्या पै जस्यो काव्य सामै आयो, ऊंकी सुरुवात में शांति भारद्वाज को नांव सामै आयो। लखबा हाळा कम तो छा, पण और बी छा। ‘रात आधी-बात आधी’, ‘तू साजन की प्यारी’ जस्या सणगार गीत, ‘सावणी तीज’ नांव सूं अेक आंचलिक प्रेम-गाथा, ‘धोळी-धोळी दूधां धोई चांदणी बजावै चंग’ जस्या प्रकृति गीत अर ‘माताजी का चूंतरा पै नाचै भैरूजी’ जसी व्यंग्य कवितावां नै हाड़ौती की राजस्थानी कविता को रूप दरसायो। वां दनां कवियां की ज्या पांत राजस्थान में सामै आई ऊंमें गणेशीलाल व्यास, सुमनेश जोशी, सत्यप्रकाश जोशी, कन्हैयालाल सेठिया, रेवतदान चारण, नारायणसिंह भाटी, मेघराज मुकुल, बुद्धिप्रकाश पारीक, चन्द्रसिंह, किशोर कल्पनाकांत, नारायणदत्त श्रीमाळी अर हरीश भादाणी जस्या कवि सामै आया। ज्यांनै काव्य-भासा को रूप संवार्यो अर कविता लोक-गीतां की धुनां पै व्यंग्य, करसा-मजूरां का दूख-दरद अर मनखापणो जगाबा हाळो काव्य सामै आयो। रजवाड़ां में बंट्यो राजस्थान सूं अर कोटां की फाटक उलांग’र आगै आयो। अंचलां की कविता अर काव्य-भासा अेक-दूजी कै नजीक आई। भासा को रूप संवर्यो।
शांति भारद्वाज की ‘सावणी तीज’ अेक आंचलिक प्रेम-गाथा जींको मरम काव्य सूं ज्यादा ऊंकी कथा में छो। पण या कविता हाड़ौती का राजस्थानी काव्य की पछाण बणी अर पूरा राजस्थान नै सराई।
या तो सुरुवात भर ई छी। आगै चाल’र हाड़ौती का राजस्थानी काव्य की मिठास, सुघड़ता, भावपरकता अर समै की चेतना को ऊजळो अर खरो रूप सामै आयो रघुराजसिंह हाड़ाप की कवितावां में। ‘सावणी तीज’ नै सारा राजस्थान में पछाण करी तो रघुराजसिंह हाडा की कवितावां अर गीतां नै पूरा देस का कविता मंचा पै धूम मचाई। राजस्थानी की जाजम पै हाड़ौती अंचल का सरजण नै ईज्जत पाई। बच्यार अर भावभंगी हाडा की कविता मरम की ऊंडाई तांई पूगी। जन्दगी का रोज-रोज का दुख-दरद कविता में पूरो सांच ले’र सामै आया। हाड़ौती की प्रकृति का सपनीला चतराम अर धरती की सोरम को जादू-भर्यो सणगार ले’र परगट्या।
रघुराजसिंह हाडा को काव्य ई अंचल में फैली बार ‘घूघरा’, ‘अणबांच्या आखर’, ‘हरबोलो’ अर ‘फूल केसोला फूल’ नांव सूं छप्यो। ‘केसूलो’ तो हाड़ौती की प्रकृति अर संवेदना की खरी पछाण ई बणग्यो। वांनै देस भर का मंच बी लूट्या, कवि अर स्रोता की रिस्तेदारी बी मजबूत करी, कवियां की उभरती पौद नै गेलो बी बतायो अर हाड़ौती अंचल की राजस्थानी भासा की सामरथ बी दरसाई।
हाड़ौती की ईं दमदार सामरथ का काव्य की धारा ज्यो उछाळो लाई ऊंमें कविया को ज्यो परवार सामै आयो ऊंमें गौरीशंकर कमलेश, गिरधारीलाल मालव, लक्ष्मीशंकर दाधीच, रशीद अहमद पहाड़ी, सूरजमल विजय, दुर्गादान सिंह गौड़ अर घनश्याम लाडला उल्लेख जोग छै।
गौरीशंकर कमलेश को सरजण पाछला घणां बरसां सूं चालर्यो छो, पण पछाण वां कवियां की ज्यादा बणी ज्ये मंचा पै सराया जावै छा। हाड़ौती गद्य की सरुवात करबा में बी कमलेश जी को योगदान भारी छै। फेर, जद वांकी काव्य-करत्यां प्रकासित हो’र सामै आई तो जस्यां अंचल का सरजण का घणा नुया रूप सामै आया। ‘थापाथूर’ ‘हाडा को न्याव’ अर ‘धारा को धणी’, जद छप’र उजागर होई तो अंचल की राजस्थानी कविता का बिबिध रूप सामै आया। चणीकस्या (क्षणिकाएँ) की सरूवात कमलेशजी ने ई करी। वांका मुक्त छंद नै कवितावां का चालता रूप ई नुयो गेलो बतायो। मुक्त छंद की या कविता गिरधारीलाल मालव नै और ऊंची करी। ख्याण्यां, निबंधां, अर नाटक की विधावां में ‘कमलेश’ को घणो सरजण हाल ताईं अप्रकासित छै अर धीरां-धीरां प्रकासित हो’र सामै जा र्यो छै। रशीद अहमद पहाड़ी नै ग्रामीण अर आदिवासी अंचल की अणपढ़, अंधबसवासी, सोसित जनता की जन्दगानी भावां में उकेरी। गिरधारीलाल मालव गीत, गजल, मुक्त छंद अर व्यंग्य सूं काव्य का नया सिल्प सामै लाया। ‘पणघट’ का मुक्त छंद सूं गजलां ताईं की जातरा में मालव नै सहज भासा अर सहज अभिव्यक्ति की गेल पकड़ी तो आज घणै आगै आ ग्या। लक्ष्मीशंकर दाधीच नै परपंरा का लोकगीतां की बिरासत बी पकड़ी, प्रकृति का चतराम बी उकेर्या अर गीतां की धारा में तरता-तरता ऊंडै बी पूग्या। पंचधार्या छंद लक्ष्मीशंकर की छंद-रचना में उठाव ले’र आया। सूरजमल विजय नै प्रगतिशील चेतना का रूप उजागर कर्यो। विजय नै ‘रणतभंवर का भाटा’ काव्य में इतिहास का उजळा पानां की प्रेरणा जगाई। घनश्याम लाडला नै बी जनवादी चेतना की धारा सूं नुई चेतना की धारा सूं नुई चेतना जगाई।
यां कवियां नै लोकगीत अर लोक वातावरण सूं सुर अर सबद ले’र ज्ये गीत मांड्या वै परपंरा की नींव पे खड़ा हो’र बी आज की जन्दगाणी का सुख-दुख सूं जुड़्या दीख्या अर अतनो मान पाया कै अंचल में रचनाकारां का नुया-नुया सामै आया अर आता ई चली ग्या। अस्या नामधारी गीतकारां में सबकी लेर चाल’र बी ज्ये सबसूं नराळो दीख्या ऊ नांव छै दुर्गादान सिंह गोड़।
गीत हरदां की नपज छै। गीत भाव अर संवेदना को उजागर ललित रूप छै। राजस्थानी गीत नै परपंरा सूं लेर नुया जमाना का पसर्या कैनवास ताईं घणा सणगार कर्या। या पछाण सबसूं जादा दुर्गादान का गीतां में देखी जा सकै छै। दुर्गादान घर-गांव की आप-बीती अर जगबीती बातां का मरम ताईं पूग्यो, सपाटबयानी सूं आगै अंदरूणी झाळ अर मठ्यास ताईं पूग्यो, बिम्ब अर प्रतिकां का रंगीला चतराम उकेर्या अर ऊपरी बरणन की लेरां-लेरां मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव का बी हरदा नै घायल करता भाव संजोया। प्रकृति को मानवीकरण अर अेक-अेक रूंख का प्रतीक सूं जीव अ जगत का सांचा पाना उघाड़्या। दुर्गादान को गीत हाड़ौती का राजस्थानी गीत की ऊंचाई को दूसरो नांव छै।
आगै जा’र ईं धारा कै साथै-साथै ज्ये नांव सामै आया वां में प्रेमजी प्रेम अर जमनाप्रसाद ठाड़ा ‘राही’ आगली पांत में दीख्या। प्रेमजी प्रेम को सरजण तेज चाल सूं सामैं आयो अर वांनै साहित्य की सबी विधावां को भंडार कर्यो। बिविधता, स्तर अर तादात, सबी में प्रेमजी की रफ्तार की दूजी नजीर मलबो मुसकिल छै। ‘सांवळो सांच’, ‘सरवर-सूरज अर संझ्या’, ‘म्हूं गाऊं मन नाचै’, ‘सूरज’ अर ‘चमचो’ जसी छोटी पोथ्यां में वांकी कविता का बिबिध रूप अर रस उजागर होया। गीत, गजल, व्यंग्य, हास्य अर मुक्तछंद सबी में वांकी सामरथ उजागर होई। सरकता दनां की लेरा-लेरां वांकी कविता बी ऊंचाई चढ़ती चली गी।
जमनाप्रसाद ठाड़ा ‘राही’ नै मास्टरी सूं पेंसन ल्यां पाछै कलम पकड़ी अर अतनी तेजी सूं सामै आया कै लोग अचम्भो कर ग्या। वांकी कविता में जन-चेतना की सामै आई। ‘खुंगाळी’ ठाडाजी की चरचा-जोग पोथी सामै आई। यां दनां ई कविता मंच की कवयित्री कुसुम जोशी का मीठा गीत बी सामै आया।
हाड़ौती अंचल की राजस्थानी कविता में ये दन आतां-आतां कवियां को बडो परवार सामै आयो। ज्यां में प्रेमलता जैन, मुकुट मणिराज, ब्रजमोहन ‘मधुर’, बनवारी बल्लम, नाथूलाल निडर, चन्द्रमोहन व्यास, धन्नालाल सुमन, विक्रमसिंह सोलंकी, जयसिंह आसावत, श्रीनंदन चतुर्वेदी, किसनलाल वर्मा, विश्वामित्र दाधीच, जगदीश निराला, बाबूलाल दाधीच, बालकृष्ण थोलंबिया, रामेश्वर शर्मा, बिरधीलाल गोरस, अतुल कनक, पूर्णिमा शर्मा, गीता जाजपुरा, मुरलीधर गौड़, गोविंद हांकला, पं. लोकनारायण शर्मा, विष्णुविश्वास, दिनेशमालव, नेमीचंद मालव, रामदयाल मेहरा, वीणा अग्रवाल, डा. लीला मोदी, डा. ओम प्रकाश 'दोस्त', गोविंद गौड़, ब्रह्मानंद बवाल, सावित्री व्यास, बाबूलाल बणजारा, अंबिकादत्त चतुर्वेदी, रामकरण प्रभाती, देशबंधु दाधीच, जितेन्द्र निर्मोही, हंसराज चौधरी जस्या और भी नरा नांऊ छै ज्ये कविता का जाज़म पै खुद की पछाण बणा चुक्या है अर बणाता जा र्या छै।
मुकुट मणिराज की ‘ओळमो’ अर ‘डंक’ पोथ्यां में अंचल की सोरम, गांवां का चतराम अर मनख सूं जुड़ाव का सुर उभर्या है। मणिराज का टाळवां गीत ध्वनि गीत बी बण्या छै। चन्द्रमोहन व्यास नै ‘गीता’ को राजस्थानी पद्यानुवाद कर्यो। ‘कवि अर कविता’ पोथी को सरजण पूरो होबा में छै। नाथूलाल निडर का व्यंग सरावण जोग छै। किशनलाल वर्मा का गीत सबद अर सुर का मेल सूं जनम’र हरदां ताईं पूगै छै। विश्वामित्र दाधीच अर बाबू बंजारा नै कवि-सम्मेलनां का स्रोतां को ध्यान रखाण’र गीत मांड्या अर मंचां पै वै कामयाब बी होया। अंचल की सोरम, लोकरंग की मठ्यास अर सांसां लेती जंदगाणी नै रूप देवा हाळा, सिल्प अर कथ्य का गंगाजमनी मेळ सूं सरावण-जोग नुआ गीतकार विष्णु दाधीच अर मुरलीधर गौड़ नै परख अर पसन्द दोन्यूं कसोट्यां पै खरा उतरबा हाळा गीत मांड्या अर साबित करी कै गीत मरबा हाळी चीज कोईनै।
अंबिकादत्त चतुर्वेदी नै खुद की नराळी ई पछाण बणाई। वांकी प्रकासित पोथी 'सौरम का चितराम' गीत अर कविता की ताजगी अर खरापण का दरसाद दे छै। अंबिका की कविता जग-जण का सुख-दुख अर धरती की सोरम सूं जनवादी चेतना अर जयारथ का जीवता चतराम है। वांनै कविता कै ताईं ऊंचाई बी दी अर सिल्प का नराळा रूप बी दरसाया। ई गेल पै नुई धज ले'र अब अतुल कनक सामैं आया छै। हंसराज 'हंस' भाव अर चेतना की जमीं का सामरथ भर्या रचनाकार छै।
नांव और बी छै। गांवां-गांवां में फैल्या ये कवि सूची में जुड़ता जा र्या छै। हाड़ौती में राजस्थानी कविता दनादन ज्यों पसराव लेती जा री छै ऊंको अेक सबूत यो छै कै शचीन्द्र उपाध्याय, अतुल कनक, रामनाथ कमलाकर, शरद उपाध्याय, अरविन्द पुष्पपालक जस्या हिन्दी का लेखक-कवि अब राजस्थानी में बी रचनावां ले'र सामैं आया छै। रचनाधर्मी अतना छै कै ज्यांको जिकर छूट ग्यो होवै वां सूं माफी मांगवा में ई सीर छै।
सार रूप में, हाडौती अंचल की राजस्थानी कविता की ई जातरा में ये बातां उजागर होवै छै–
1. यो सिल्प में अर कथ्य में परंपरा की, सास्तर की कविता की नींव पै खड़ो नै होयो। ईंकी जमीं बणी हाड़ौती की बोल अर केनवास बण्यो हाड़ौती को लोक-जीवण अर लोक-काव्य।
2. या कविता 'स्वांतःसुखाय' बी है अर लोक मंगळकारी बी। ईमें भाव और बच्यार को मेल मलै छै। ईं कविता नै लोक काव्य का बसीकरण सूं छूट'र उजाळा में अर जमी पै आबा में देर जरूर लागी, पण लगातार बदळाव अर बिस्तार की धार बैती री।
3. लोक भासा को सरजण लगातार साहित्य की भासा का संस्कार लेतो चलो ग्यो।
4. हाड़ौती को कवि समाज राजनीति का बच्यारां सू अछूतो नै र्यो, पण गुट का खेमाबाजी के ताईं कोई खास मदद नै मली। कवि राजनीति का असर सूं नराळा खेमों में बंट्या जरूर, पण आपस का संवाद चालता र्या। मतभेद चालतां बी मतभेद नै पनप्यो।
5. कवि सम्मेलनां का मंचा नै स्रोतांन का बगड़ता स्वाद को पेट भरवा की लालस्या नै जरूर असल कविता को रूप बगाड़्यो। चुटकलाबाजी अर नंगी चरचा बी सामैं आई। कवि सम्मेलनां में नौटंकी जस्या तमासा बी होया, पण हाड़ौती में संसकारी स्रोतांन की ची परंपरा छै, जींको फैलाव गांव-गांव में छै। ईं लेखै खरी अर सहज कविता को धोरो कदी नै सूख्यो। आज तो या कविता ऊँची मानत्या की तपस्या में चाल री छै।
6. ईं कविता नै पूरा राजस्थान में मानत्या पाई अर अंचल को माथो ऊँचो कर्यो। ईं कविता नै जणा-जणा में सांस्कृतिक चेतना जगाई अर आपणी धरती, आपणां लोगां, आपणी बोली अर आपणी भासा पै लाड बधायो। ईं जन-जुड़ाव सूं रचनाकारां नै बी प्रेरणा पाई।
जातरा जारी छै नई उम्मीद की लेरां-लेरां।