नाट्य सास्तर रा प्रणेता भरत मुनि नाटक री परिभासा देता हुवा बीं नै लोकवृत रौ अनुकरण बतायौ है—'लोकवृत्तानुकरण नाट्यम्'। ईं में नाटक रै वास्तै दो बातां जरूरी मानी है—(1) लोकवृत्त या कोई कथा, का'णी या जीवण में हुयोड़ी वै घटनावां जो एक का'णी रै रूप में हुवै अर (2) अनुकरण-मतलब वीं री नकल उतारणी। ईं तरै अभिनै नाटक रौ जरूरी अंग सिद्ध हुवै अर अभिनै जिण जगा कियो जावै वो बाजै —रंगमंच। मुद्दे री बात आ कै बिना रंगमंच या अभिनै रै नाटक री कल्पना नीं की जा सकै। आपां किणी भी भासा रौ साहित उठाय'र देखां तो आ' बात साफ दिखै कै बीं में नाटकां री सुरूआत रंगमंच माथै खेलीजण सूं ई हुई। नाटक रै इतियास रा खोजी विद्वानां रौ मतौ है कै सारा देसां में नाटक रौ आदिम रूप धार्मिक गीतां नै नाच रै साथै गावण री गम्मत में मिळै। राजस्थानी साहित में भी नाटकां रौ सुरुवात रौ रूप 'रासक', 'रास' 'फाग', 'चर्चरी' काव्यां में मिळै। आगै चाल'र अै 'नाच-गाणा वाळा रास' ख्याल तमासां रौ रूप ले लियौ। जो नाटकां रै जादा नजदीक हौ। अै ख्याल-तमासा आज भी जीवता है अर गांवां में नै कदै कदास सैरां भी होली जैड़ा तिंवारां माथै हुवता निजर आवै। यां में गोपीचंद, भरथरी, हीर रांजा आद घणा लोक चावता है। ये हागरचंद जी नाहटा 'लोक-कला' में ख्यालां री अेक लांबी सूची प्रकासित कराई है।

 

या ख्याल तमासां रौ रंगमंच सीधौ-सादौ खुलौ रंगमंच मंच हौ। बस्ती रै मझ में जठै कठैई थोड़ौ खुलौ चौक हुवतौ, उण रै बीच में जरूरत माफक दो चार लकड़ी रा पाट बरोबर री ऊंचाई माथै जमा देवता नै ऊपर बिछा देता एक जाजम। यां माथै एक कानीं बैठ जावता गवैया नै साजिंदा नै नीचै चौक में चौफेर बैठ जावता तमासौ देखणिया। घरां रा झरोखा, डैलांण नै डागळा भी दर्सकां सूं भरिया रै'ता। नीं कोई पड़दां रौ कांम नै नीं कोई एयरकंडीशंड हॉल री जरूरत। अपां री संस्क्रती री आ' विसेसता है कि चाहै नाटक हुवौ, चाहे खेल-कूद, माप-तोल, नाप-जोख नै खास तर रै साज सामान रौ झगड़ो ईज नीं राख्यो। आज कल या कॉर्नर प्लेज दाई म्हांरा खेल-तमासा कठै भी हू सकता हा नै कैड़े भी साज ममान सूं काम धक जावतौ।

 

किणी भी साहित में सारां सूं सिरैकार नाटक वै लोग ई दे राकिया है। जका खुद—मंजियोड़ा अभिनेता हा और खुदई नाटकां रौ दिग्दर्सण करता। पिण धीमै-धीमै साहित रै विकास रै साथै अैड़ा विद्वान भी नाटक लिखण लागा ज्यांरौ अभिनै सूं अर नाटक रै दिग्दर्सण सूं कीं तल्लो-बल्लौ ई नीं हौ। यां नाटकां नै रंगमंच माथै पेश करण ने अबखाई आवण लागी तो यां लेखकां आप रा नाटकां नै साहितिक नाटक कै'णौ सुरू कियौ अर औ सवाल पैदा हुवौ कै कई नाटक रै वास्तै रंगमंच माथै खेलीजणौ जरूरीज है ? नाटक खाली पढण सारू क्यूं नीं लिखीज सकै? या पछै कै'ण लागा कै थांरै रंगमंच नै म्हांरै नाटकां रै जोगी बणावण सारू बीं में जरूरी फेर बदळ करौ। म्हैं म्हारा जीवण में मोकळाई नाटक खेलिया, खेलाया नै आज भी औ धंधौ चालू है। म्हैं म्हारा सारा अनुभव रै आधार पर कै सकूं हूं कै अै' सगळी दलीलां आपरी कमी छिपावण री दलीलां है। नाटक काव्य रौ वो रूप है जिणरौ आणन्द आंख्यां सूं देख नै अर कानां सूं सुण नै लिरीजै। काव्येषु नाटकम् रम्यम् इसा नाटकां रै वास्तै ई कयौ गयौ है। इण सब रै बावजूद विकसित भासावां रै साहित में इसा नाटकां री कमी कोनी जिकां नै जे मंच माथै खेलौ तो दर्सकां रै अधबीच सूं ई ऊठ नै भाग जावण रौ अंदेसौ रै'वै पण फेर भी विचारां री गै'राई अर विद्वत्ता रो दृस्टि सूं वै मानीजियोड़ा नाटक गिणीजै। अनोखी बात आ' है कै यां नाटकां री संरचना नै गठण तो सारौ दृश्य-काव्य री तरै रौ व्है पिण फेर भी वां रौ आणन्द पढनै ई लिरीज सकै, देख नै नीं, अर वौ भी मूठी भरिया विद्वानां द्वारा ई लिरीजै, आम आदमी रै वै काम रा नीं हुवै। हिन्दी में नाटकां री भरमार होता हुवां भी घणकरा नाटक विसेस तौर सूं आजादी रै पैले लिखिजियौड़ा नाटक इणी तरै रा है ज्यां में मंचीय गुणां रौ घणौ अभाव है। ई दृष्टि सूं मराठी अर गुजराती रौ नाटक साहित घणौ जीवंत है अर बीं में एक सूं एक बदका नाटक है जिका के मंच माथै घणी सफळता सूं खेलीजै।

 

राजस्थानी गद्य साहित रै विकास नै जे आंपां तीन काळां में बांटां—आदि, मध्य नै आधुनिक काळ—अर काळ-विभाजन रै मुद्दै माथै विद्वानां में घणौ मतभेद देखता हुवां मोटै रूप में आदि काळ 16 वीं सूं 15 वीं सदी रै अंत तक, मध्य 15 वीं सदी सूं 16 वीं सदी रै अंत तक, नै 1600 वि० रै बाद सूं आधुनिक काळ मान'र चालां, तो कयौ जा सकै है के आदि काळ में नाटक लोक-नाट्य रै दो-चार रूपां में ई मिळै ज्यांरी चर्चा पै'ला भी की जा चुकी है। पूरै रूप सूं जिण नै 'नाटक' कयौ जा सकै, इसी रचना न तो आदि काळ में हुई मिळै अर न मध्य काळ में। आंपां रा देस में नाटकां री परम्परा घणी पुराणी है। ईसा सूं भी 3 सदी पैला रा भास रा नाटक संस्क्रत भासा में मिळै अर काळिदास रा नाटकां रौ तो 18 वीं सदी में यूरोप री भासावां में भी उत्थो व्हेणौ सुरू हो चुको हौ। बाणभट्ट री तो खुद री नाटक-मंडळी ही अर हर्षवर्धन रै राज में एक-एक नाटक केई रातां तक खेलीज नै पूरौ व्हेतौ। राजस्थानी रौ आदि काळ रौ साहित तो फेर भी वींरै झांझरकै री बेला रौ साहित मानीज सकै है जद कै वो अपभ्रंस रै प्रभाव सूं पूरी तरै छुटकारौ नीं पा सकियो हौ पण मध्यकाळ तो राजस्थानी साहित री भरपूर जवानी रौ जुग है जीं में गद्य-पद्य दोनां में मोकळी रचनावां हुई अर साहितिक गुणां सूं भरपूर रचनावां भी हुई पण आ' बड़े इचरज री बात है कै राजस्थानी लेखकां रौ ध्यान नाटकां री रचना कांनी क्यूं नीं गयौ जद कै देस में नाटकां री इत्ती जोरदार परम्परा मौजूद ही। पिण आ दुर्घटना कोरी राजस्थानी साहित रै साथै ई हुई व्है इसी बात नीं है, सारी आधुनिक आर्य भासावां रै साहित रौ औ' ई हाल है। हिन्दी में तो गद्य-साहित री सुरूवाद ई आधुनिक काळ या विक्रम री बीसवीं सदी सूं ई मानीजै है पिण राजस्थानी में तो गद्य री काफी जूनी परम्परा ही, फेर भी नाटक रचना नीं हुई। आ क्यूं? इण रा किताक कारण तो सांमा ई दीसै है। मध्य-जुग जुद्धां रौ नै उथळ-पुथळ रौ जुग हौ जिण रा हालात नाटकां रै अर रंगमंच रै अनुकूल नीं पड़ता। लूट-खसोट अर भाग-दौड़ रै बीच नाटक खेलणौ किण नै सूझतौ। सांच पूछौ तो 8 वीं सदी रै बाद सूं मुसलमानां रा लगातार हमलां रै कारण नाटकां री परम्परा कम सूं कम उत्तर भारत में तो टूटती ही निजर आवै है। दूजी बात आ' कै राजस्थानी रौ वीं काळ रौ साहित तीन तरै रो हौ—(i) जैनां अर बांमणां रौ लिखियोड़ौं धार्मिक साहित (ii) चारणां रौ लिखियोड़ौ डिंगळ साहित अर (iii) लोक साहित। ईं में सूं वै आज भी ठीक नीं मानै- साधुआं रौ सांग भरणौ भी जैन लोग असाधना मानै। अर जैनां री कोई भी कथा सायद ही अै’ ड़ी हुवै जीं रै अंत में नायक या नायका दीक्षा लेय'र साधू-साध्वी नीं बणै। बामणां रै धरम प्रचार री भावना रामलीला, रासलीला अर गोपी-चंद भरथरी जिसा ख्याल-तमासा सूं ई तिरपत हू जाती जिण सूं सायद वै भी नाटक रचना कानी ध्यान नीं दियौ। आंरौ साहित भी राजस्थानी में घणौ नीं है क्यूं कै इण काळ में ब्रज भामा रै जोरदार प्रचार सूं वै घणकरौ साहित पिंगळ में ई लिखियौ। चारणी साहित या डिंगळ साहित मध्यकाळ रौ सारां सूं सम्पन्न साहित है जिण में गद्य-पद्य री मिली-जुली सैली री वचनिकावां भी है पण यां कवियां रौ सारी ध्यान आश्रयदाता राजावां नै बिड़दावण में अर वांरा वंस नै ऊंचौ दिखावण में ई अटकियोडौ रय्यौ। राजावां नै नाटक दिखाणौ इतरौ सोरौ काम नीं हौ जित्तौ काव्य सुणावणौ। सायद इणी कारण वै काव्य रचना सूं आगै नीं बदिया। जुद्धां रौ जिसौ सजीव चित्रण काव्य में हू सकै विसौ नाटक में दिखावणौ संभव नीं हुवै क्यूं कै जुद्ध रा दरसाव रंगमंच माथै प्रभाव-साली ढंग सूं नीं दिखाइजै। उठी लोकनाट्य भी ज्यां लागां रै हाथ में जीवतौ रयी, वै समाज में नीचा गिणीजण वाळा लोग हा। नतीजौ औ हुवौ कै नाच गाणा अर अभिनै ढोलियां अर भांडां रौ काम गिणीजण लागौ अर राजस्थान में आ' भावना सन् 1925-30 तक भी मौजूद ही। सन् 1929 में जद म्हैं 'गौरक्षा' नामक नाटक में सार्वजनिक मंच माथै पै'लीवार अभिनै कियौ तो म्हनै याद है कै म्हांरै नाटक में नायक रौ अभिनै करणिया डा० मख्तूरमल लोढा नै वां रै दादाजी नाटक रै सैं दिन कमरे में बंद करने ताळौ ठोक दियौ सिरफ ईं वास्तै कै मुसद्द्यिां रा बेटा-पोता हमें ढोलियां रा छोरां रै साथै नाचैला कईं? वे ईं में आप री घणी इज्जत हाक समझता हा। आखर म्हांनै रेल्वे नाटक एसोसियेशन रा हीरो नै एक दिन में तैयार कर नै नायक रौ काम वीं सूं ई कराणौ पड़ियौ। जठै रा भणिया-गुणिया समाज में नाटकां रै विसै में इसी हीन भावना हुवै उठ नाटक अर नृत्य-संगीत रै विकास री आसा राखणी ई बेकार है।

 

कारण कीं भी रया हुवौ, आ बात साफ है कै आधुनिक काळ रै पै'ला नाटकां री रचना घणकरी भासावां दाई राजस्थानी में भी हुई। सही अर्थों में राजस्थानी रा पै'ला नाटककार वि० सम्वत 1910 में जनमियोड़ा शिवचंदजी भरतिया ई  ठै'रै। वे संस्कृत रा तो ऊँचे दर्जे रा पिंडत हा ई, मराठी, हिन्दी अर राजस्थानी में भी घणी सफळता सूं लिख सरता हा। ई वास्तै वां रा नाटकां में यां चारू भासावां रौ प्रभाव भी है अर मिस्रण भी। वां रै पै'ला 19 वीं सदी रै आंत में हुयोड़ा किरपारामजी रै भीं अेक नाटक री चर्चा तो मिळै पिण वां रौ नाटक हाल हाथै नीं आयौ है। ई वास्तै भरतियाजी नै ई पै'ला नाटककार मानिया जावै। हिन्दी में भी नाटकां रै उदै रौ लगभग औ' ई काळ है। भरतियाजी रौ पै'लौ नाटक 'केसर बिलास' छपियौ पिण वौ घणौ चावौ नीं हुवौ। वि० संवत 1963 में लिखियोड़ौ नाटक 'बुढापा री सगाई' सूं भरतियाजी नै नाटककार रूप में घणौ जस मिलियौ। ई नाटक रौ विसै नाम सूं ई स्पष्ट है। ई में महाराष्ट्र में बसियोड़ा मारवाड़ियां रै जीवण री सजीव अर साची झांकी है। नाटक 3 अंकां रौ है पण ईं री संरचना में संस्क्रित री नाटक सैली रौ भी प्रभाव साफ झलकै। औ नाटक मंगळाचरण सूं सुरू व्है नै भरत वाक्य में खतम हुवौ है। ई रा दो संस्करण छपिया। ई रै पछै बां रौ तीजौ नाटक 'फाटका जंजाळ' प्रकासित हुवौ’ जी में मारवाड़ी समाज री बुराई रौ व्यापक चित्रण है, ज्यूँ कै सट्टौ, दलाली, रंडीबाजी वगैरा, पण ई रै साथै पतिव्रत-धरम अर स्वदेसी वस्तुओं रौ प्रेम रा उपदेस भी है। नाटक पाँच अंकां रौ है अर ई में मराठी अर खड़ी बोली रौ भी जगै-जगै प्रयोग हुवौ है। ई में उपदेसां री भरमार है, अठै तक कै एक पात्र एक जगा 11 पेज रौ भासण तक झाड़तौ मिळै। नाटक रै अंत में भरतियाजी आप रै परवार रौ परिचै भी दियौ है।

 

यां नाटकां रै देखणै सूं आ बात स्पष्ट हो जावै के भरतियाजी नै राजस्थानी में रचना री प्रेरणा समाज-सुधार री गै'री भावना सूं मिळी। वै खुद ईं बात रौ उल्लेख कियौ है के समाज-सुधार री जड़ है लुगायां अर वै है अणपढ सो वां तक खुद री बात राजस्थानी सू ई पोंचाई जा सकै है। म्हारै मतै में आ बात खाली नाटकां रै बिसै में साच नीं है, आजादी रै पै'ली लिखिजियोड़े पूरै राजस्थानी साहित्य माथै भी घणा अंसां में लागू हुवै है। वी जुग आर्यसमाज रै धुआंधार प्रचार रौ जुग हौ- चौफेर समाज सुधार री धूम मचियौड़ी ही। साथै ई गांधीजी रौ स्वतंत्रता आंदोलन भी सन् 21 सूं सुरु व्है चुकौ हौ अर महाराष्ट्र में तो तिलक रै विचारां रौ प्रचार ई सूं भी पै'ला हो चुकौ हौ। 'समाज' सबद वी बगत तीन अर्था में काम आवतौ हौ—(i) घणकरा लोगां रै बातै समाज रौ अरथ हौ खुद री जात या न्यात (ii) जां री चेतना थोड़ी जादा विकसित ही, वे 'समाज' सूँ 'हिन्दू समाज' रौ अरथ लेता अर (iii) राजनीति रा अगुवा खास कर कांग्रेसी समाज रौ अरथ 'भारत रा सारा निवासी' करण लागा हा पिण औ अरथ वीं बगत तक जनता रै हियं में बैठौ नीं हौ। खैर कैवण रौ मतलब औ है कै आजादी रै पै'ला राजस्थानी में साहित रचना री प्रेरक सगती 'समाज-सुधार' री भावना ई रई, भाषा री चेतना नहीं। आ बात घणी महत्ता री है क्यूंकि साहित-रचना री दिसा, विंसयां रौ चुणाव नै रचना रौ स्तर अै सगळी बातां लेखक रै उद्देस सूं ई संबंधित हुवै। इणी कारण आजादी रै पै'ला रौ राजस्थानी साहित—कईं तो कविता नै कई नाटक—सगळां रौ मूळ स्वर विचार प्रसार नै प्रचारात्मक हौ। लेखक वै बातां ई कैतौ अर अैड़ा सबदां में ई कैतौ जो आम जनता अर अनपढ लुगायां तक री समझ में आ जावै। नीं तो प्रचार रौ उद्देस ईज विफळ हू जातौ। ई वास्तै ई जुग रा नाटकां में साहितिकता कम अर उपदेसात्मकता ज्यादा है।

 

1922 रै बाद 'मारवाड़ी भाषा प्रचार मंडळ', धमणगांव (महाराष्ट्र) सूं नारायण दास जी अग रवाळ रा लिखियोड़ा 8 नाटक प्रकासित हुवा। मंडळ रै नांम में भाषाई चेतना स्पष्ट झलकै। नारायण दासजी समाज सुधार रै अलावा दूजा बिसै भी लिया—थोड़ौ विसय-विस्तार हुवौ। इतियास अर पुराण संबंधी नाटक सुरू करण रौ सेवरौ नारायण दास जी रै माथा माथै बांध्यौ जा सकै है। यां में हास्य-प्रधान नाटक भी हा ज्यांनै लेखक खुद 'फार्स' नाम दियौ है। यां री रचनावां है—1. बाळ-ब्याव को फार्स 2. अकल बड़ी कै भैंस 3. विद्या उदय 4. भाग्योद्यम 5. महाराणा प्रताप 6. दान-धर्म नाटक 7. सरस्वती-विजय 8. महाभारत को श्री गणेस। विसयां री विविधता यां नाटकां में स्पष्ट है अै नाटक घणकरा छोटा है ज्यां में दो या तीन अंक है। दरसाव 10-14 तक है। यां रै अलावा इण काळ में नीचै लिख्या नाटकां रौ भी उल्लेख डा० आज्ञाचंद भंडारी आप रा प्रबंध में कियौ है—गुलाबचंद जी नागोरी रा दो नाटक—(ⅰ) 'मारवाड़ी मौसर' अर 'सगाई- जंजाळ'। यां री भासा पर भी मराठी रो काफी प्रभाव है। बालमित्र जी लिखित 'कळजुगी कृष्ण रुक्मण' नाम सूं ई समसामयिक जीवन माथै व्यंग्य लागै। मदनमोहन जी सिद्ध रौ 'अंध-परम्परा' अर ओसवाळ हितकारणी सभा लाडनूँ रौ प्रकासित 'समाज-सुधार' नाटक रौ भी उल्लेख मिळै।

 

इण काळ रा नाटककारां में भरतिया जी रै पछै सारां सू जादा लोकप्रियता मिळी मदनमोहन जी सिद्ध रा नाटक—'जैपर री ज्योंणार' नै। जिण रा तीन संरकरण छपण री तो जाणकारी मिळी है। औ नाटक चार-चार दरसावां रा दो खंडां में है। पै'लौ खंड 1985 वि० (1928 ई०) अर दूजो संवत 1994 (1939 ई०) में निकळियोड़ौ है।

 

ई काळ में ई पै'ला गूंगी फिल्म नै सन 31 रै पछै बोलती फिल्मां रौ भी प्रचार राजस्थान में हुबौ। ई सूं प्रभावित हूं'र ठाकुरदत्त जी दाधीच आप रै नाटक रौ नाम  राखियौ, 'माहेश्वरी पंचायत रौ बायस्कोप' अर नाटक रा दरसावां नै 'रील' रौ नाम दियौ। ओ' नाटक कळकत्ता सूं सन् 1929 (संवत 1986) में प्रकासित हुवौ। इण री भासा जैसळमेरी है। घणकरी आ' बात देखण में आवै कै साहित री नवी विधा रै काळ में अनुवादां रौ जोर रै'वै पिण राजस्थानी रा नाटकां रै इण उदै काळ में भी अनुवादां रौ अभाव है। ईं रौ कारण जठा तक म्हैं सोचें हूं नाटकां रै विसयां रौ तंग दायरौ ई है जो समाज सुधार री नींव रै बारै नीं पसर पायौ। समाज सुधार समाज री काळ विसेस में जो परिस्थिति हुवै बीं नै ई आधार बणा'र चालै अर पुराणा या सम्पन्न भासावां रै नाटकां में वै परिस्थितियाँ कठा सूं मिळै जिण सूं सारा ई नाटक मौलिक रचनावां रै रूप में ई सामने आया। एक आ' बात भी ध्यान देवण जोगी है कै ई काळ रा दो अेक नै छोड़'र लगभग सारा ई लेखक प्रवासी राजस्थानी हा। अंग्रेजी शिक्षा रौ प्रचार राजस्थान में महाराष्ट्र अर बंगाल बिचे घणौ मोड़ो हुवौ जीं सूं राजस्थान में साहितिक अर सामाजिक चेतना भी एक पीढ़ी सूं पिछड़ियोड़ी रयी। कीं घर बिचै बारै जाय नै बसणियां में आप रा देस रै लोगां रौ प्रेम विसेस हुवै अर वै लोग एक सक्रिय सामाजिक संगठन बणाय'र रै'वै। ई कारण भी वां में समाज सुधार री भावना जादा प्रबळ रही। वै खुद रै चौफेर जिण जाग्रत समाज नै देखियो, उण सूं खुद रा समाज री तुलना करणै पर वां में समाज नै सुधारण री बेचैनी पँदा व्हेणौ स्वाभाविक ई ही। कीं भी हुवौ, औ' कैणौ कै सिवचंद भरतिया राजस्थानी रा पै'ला नै आखरी नाटककार हा सरासर गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी है जो राजस्थानी साहित सूं लेखक री अनभिग्यता ई प्रगट करै। रजस्थान पत्रिका रै 2 मई रा अंक में श्री सुरेश रौ 'राजस्थानी भासा! सृजनात्मक साहित्यकारों की जरूरत' सिरनामै सूं एक लेख छापियो है जिण में लेखक नाटकां रै बाबत आ बात कही है।

 

जठै तक मंच रौ सवाल है, ई काळ में देस भर में पारसी रंगमंच रौ बोलबालौ हौ अर सिनेमा चालू हुवण रै पै'ला पारसी थियेट्रिकल कम्पनियां रा नाटक ई जन-मनोरंजन रा प्रमुख साधन हा। यां में जादातर तीन अक व्हेता अर 20-25 दरसाव। गद्य रै बीच में उर्दू रा जोसीला या प्रेमप्रधान शेर रै 'ता जांनै प्रभावसाली ढंग सूँ बोलणौ ई चोखौ अभिनै गिणीजतौ। म्हां लोग पार्ट लेवण र पै'ला आ' देखता कै ई पार्ट में जोरदार शेर किताक है। दरसावां रै बीच में गाणा री भरमार रै'ती अर एक दो नाच भी रै'ता। पूरै नाटक में चार पाँच दरसाव कॉमिक या नकल रा रै'ता जकां रौ कथानक न्यारौ ई चालतौ। चितराम मंडियोड़ा पड़दा रै ऊपर चढण उतरण सूं दरमाव बदळतौ। एक नाटक रै वास्तै अै’ पड़दा जरूरी व्हेता—सारां सूं आगै ड्राप सीन जिण माथै भगवान रौ भव्य चित्र रै'तौ। बीं  रै लारै रस्तै रौ पड़दौ जो कॉमिक रै काम आवतौ। उण रै लारै मै'ल रौ पड़दौ एक या दो तरै रा मैं'ल जां सूं अलग-अलग जगै बताईजती। बीं रै लारै जंगळ रौ पड़दौ। यां पड़दां री मदद सूं घणकरा नाटक खेलीज जावता। मानीजियोड़ी कम्पनियाँ तीन चार तरै रा मै'ल व कट जंगळ अर कट-मै'ल रा पड़दा भी राखती ही। कपड़ा माथै कोरियोड़ा चितरामां रा दो चार सजावटी फ्रेम औरू रैता जकाँ सूं भाखर, बगीचौ वगैरा दिखाया जाता। रंगमंच घणकरी 25-30 फुट लंबौ अर 20 फुट चवड़ौ व्हैतौ अर उणरै सामने दर्सकां रै बैठण रौ बडौ हॉल जो आज भी उणी तर रौ है। नाटक रात रा नऊ बजियां सुरू व्हेता अर दो तीन बजियां खतम व्हेता। राजस्थानी रा नाटक भी इणी रंगमंच नै ध्यान में राख'र लिखिजिथोड़ा है। जठा तांई लम्बा भासणां रौ सवाल है सायद बीं जमानै रा लोग भासण नै उपदेस सुणण रा सौकीन हा क्यूं कै ईं दोस सूं तो घणा मानीजता द्विजेन्द्रलाल राय रा बंगला नाटक भी मुक्त नीं है।

 

अेकांकी—यूं तो अेकांकी नाटकां री विधा घणी पुराणी है क्यूं के संस्कृत में भी 'भाण' व्यायोग, वीथि, अंक अर प्रहसन नाम रा रूपक एक-एक अंक राई व्हेता' पिण यां री संरचना इसा कठोर नियमां में बांधियोड़ी ही कै वै आजकल रा अेकांकियां सूं घणा अळगा पड़ जावै। रूप अेक सो ह्वैतां हुवां भी वां री आत्मा भिन्न है। आधुनिक अेकांकी जुग री मांग सूं पैदा हुवोड़ा है। लोगां रौ जीवण इतरो व्यस्त व्हेगी कै लांबा नाटक देखण री फुर्सत ई नीं रई अर सिनेमां रौ आविष्कार तो तीन अंकी नाटकां रौ सफायौ ईज कर दियौ क्यूंकै अढाई घंटां में फिल्मां किणी भी कथा नै जिसा सजीव अर मनोरंजक रूप में प्रस्तुत करे वा बात 5-5 घंटा रा नाटकां में भी आणी संभव नीं व्है। रंगमंच रा रूप में भी भारी बदळाय आयौ। चित्रकारी आला नै उतरण-चढण आळा पड़दा अर वां रै जोड़ री बिंगां गायब व्हेगी। चितरामां वाळा सैटां रा टुकड़ा भी सिनेमा रै आगै रमेकड़ा व्हे ज्यू लागण लागा—वै' भी गया। डूबतो डावै-जीमणै सिरकीजण आळा सादा इकरंगा पड़दां रौ मंच आयौ अर सादी ई बिंगां आयगी। अेक रै लारै दूजौ दरसाव लगातार दिखावण री परंपरा भी टूटी, लोग दो दरसावां रै विच जरूरत माफक टैम लेवण लागा अैड़ा रंगमंच सादा अर किफायती होणै सूं स्कूलां अर कालेजां मैं भी वणाईजिया और शिक्षण संस्थांवां अेकांकी विधा नै घणौ पोसण दियौ।

 

राजस्थानी रा नाटकां रै उदैकाळ मैं थोड़ा घणा एकांकी लिखिजिया पिण धणकरा सन् 1930 रै पछै ई लिखिजिया। यूं तौ 1925 में भगवती प्रसाद जी दारूका रौ लिखियोड़ौ 'सीठणा सुधार' अेकांकी वां रा 'पंचनाटक' में प्रकासित हुवौ पिण बीं रा संवादां में खड़ी बोली रौ घणो प्रयोग है अर ज्यादातर मारवाड़ी अर खड़ी बोली रौ मिश्रण है। सन् 1930 में सरदारसैर निवासी शोभाचंद जी जम्भड़ रौ एकांकी प्रहसण 'वृद्ध विवाह विदूषण' सामनै आयौ। सरदारसैर में अेक मनोरंजन परिसद भी कायम हुई जिण में जम्भड़जी रा घणकरा एकांकी अभिनीत हुवा। खुसी री बात है कि सरदार सैर में जम्भड़ जी रा प्रयासां सूं एक रंगमंच अर नाटक मंडळी इत्ता वरस पै'ला ई बणगी ही। साच पूछी तो जम्भड़ जी ई राजस्थानी रा पै'ला अेकांकीकार नै रंगमंच कायम करणिया मानीजणा चाइजै। वां रौ सुरगवास 1964 में हुवौ अर वै आप रौ पूरौ जीवण राजस्थानी नाटक अर रंगमंच री सेवा में ई अर्पित कियौ।

 

1931 ई० में जोधपुर निवासी श्रीनाथ जी मोदी रो 'गोमा जाट' या 'ग्राम सुधार' नाम रौ एक नाटक छपियौ जिण में 10 दरसावां रो एक अंक है। सुरु में प्रस्तावना नै आखिर में उपसंहार रौ एक दरसाव है जिण रौ नाटक री मूळकथा सूं सीधौ संबंध कोनीं। मोदी जी ई रचना में पूरै प्रामीण समाज नै एक इकाई रै रूप में देखियौ है अर अंध-विस्वास मेटण रौ नै शिक्षा प्रचार रौ संदेस दियौ है। टेकनीक री निजर सूं देखां तौ उद्देस री अेकता नै अेक अंक होणा सूं ईनै अेकांकी भी कै सकां हां पिण कथा री जगा अेकांकी में कठै? पिण किणी विधा री बंधी बंधाई लीक माथै ई चालणौ लेखकां रै वास्तै जरूरी नीं व्है—ई वास्तै मोदी जी आप रै सदेंस री जरूरत मुजब दरसावां रौ हिसाब राखियौ है। 1930 रै आखती-पाखती रौ काळ साहित में भी परम्परावां सूँ हट न रचना करण रो नै आजादी सूं लिखण रौ समौ हौ सौ औं' भी वां रौ अेक नवौ प्रयोग मानियौ जा सकै है।

 

1933 ई० में स्व० सूर्यकरण जी पारीक रौ 'बोळावण' अेकांकी छपियो। इण में छै दरसावां रौ अेक अंक है अर ई री टैकनीक आजकल रा अेकांकियां रा ज्यादा नैड़ी है। ई रौ विसै भी समाज सुधार सूं भिन्न राजपुत्तां रौ जातीय चरित्र है। बीच-बीच में पद्यां रौ भी प्रयोग हुवौ है जो पारसी थिएटरां रौ प्रभाव है।

 

स्वतंत्रता रै बाद रौ नाटक साहित—ऊपर बतायौ जा चुकौ है कै सिनेमा रै आविस्कार सूं नाटकां रौ प्रचार एक दम कम हुवरण लागौ अर 5-7 बरसां में ई केई प्रसिद्ध नाटक कम्पनियां या तौ खतम व्हेगी या फिल्मां बणावण लागगी ज्यू कै कलकत्ते रा मदन थियेटर्स अर न्यू थिएटर्स। ई सूं इण काळ में नाटक रचना कांनी लेखक कम प्रेरित व्हिया। घणकरा अेकांकी ई लिखीजण लागा। राजस्थानी में भी आ' ई स्थिति रई। साहितिक नाटकां में डॉ० आज्ञाचंद भंडारी रौ एक छोटी नाटक 'पन्नाधाय' सन 1963 ई० में छपियौ जो विसै री नवीनता अर रचना कौसळ री दृष्टि सूं सराबण जोगौ है। तीन अंकां रौ दूजौ कोई नाटक ई काळ में लिखिजियोड़ो म्हारी निगै नीं आयौ। गोविन्दलाल जी माथुर भी दसेक बरस पै'ला एक 'दहेज' नाम रौ तीन अंकां रौ नाटक लिखियौ पिण बीं हाल अप्रकासित है। गोविन्दलाल जी री भासा जोधपुरी मारवाड़ी है अर मुहावरै री व्यंग्यात्मक नै चुस्ती बीं नै सजीव बणाई राखै। बंबई में हमार अेक नाटक खेलीजियौ है—सुपातर बींनणी नै कुपातर वींद—ले. महेन्द्र पुजारी।

 

राजस्थानी में स्वतंत्रता रै बाद रा काळ में भरत व्यास की नाटक इसा भी लिखिया जकां री फिल्मां बणी —(ⅰ) 1947 में 'रंगीलौ मारवाड़ अर 1949 में 'ढोला-मरवण'। पिण राजस्थानी फिल्मों में 'बाबासा री लाडली' अर 'बाबा रामदेव' विसेस लोक चावती बणी। यां सूं देस भर में राजस्थानी भासा रौ प्रचार हुऔ अर उणरी सामरथ भी उजागर ब्ही।

 

ई काळ में गीत-नाट्यां रौ प्रचळण भी हुवौ अर राजस्थानी लेखकां रौ ध्यान बीं कानीं भी गयौ। जन-कवि गणेसीलाल उस्ताद जो खुद आजादी रै जंग रा एक जोरदार सिपाही हा, जन-जागरण रै उद्देस सूं राजस्थानी में गीत-नाट्य लिखिया ज्यां में 'बधाउड़ौ' घणो चावौ है। थोड़ा बरसां पै'ला मुकुल जी री चावी कविता सैनाणी नै श्रीमती शीला झुनझुनू वाला प्रभावसाली नृत्य नाटिका रौ रूप दियौ। आ' नृत्य नाटिका नारायण दत्त जोधपुरी रा निदेसण में कई जगै घणी सफलता रै साथै अभिनीत व्ही है। मीरां पर भी तीन नृत्य नाटिकायां बणीं है (अेक श्री गजानन वर्मा री, दूजी देवीलाल जी सामर री अर तीजी नारायणदत्त जोधपुरी री) नारायणदत्त में नृत्य नाटिका री संरचना री सरावण जोगी प्रतिभा है। वे का'णी सूं दरसाव जोग थळ छांटण में नै वां नै गीत, नाच अर सम्वादां रै रूप में प्रभावसाली ढंग सूं प्रस्तुत करण में बेजोड़ है। (मीरां नृत्य नाटिका म्हांरी संस्था विद्यावाड़ी में इणी दसरावा रै दिन प्रस्तुत की जावण वाळी है। पैला सावित्री कॉलेज अजमेर में भी वीं रौ प्रदर्सण व्हे चुकौ है।)

 

ई काळ में सारां सू बत्तौ सिरजण हुवौ अेकांकियां रौ जो राजस्थानी री पत्रिकावाँ में छपता र'या। 1954 ई० में जोधपुर निवासी श्री गोविन्दलाल माथुर रौ सात अेकांकियां रौ अेक संग्रै जोधपुर सूँ 'सतरंगणी' रै नाम सूं प्रकासित हुवौ, जिण मांयलौ 'लालची मां-बाप' नाम रौ अेकांकी सारां सूं सिरै है। ई में तगाई ब्याव रा मामला में ठै'राव करणिया नै बेटी रा बाप सूं अड़ परा नै रुपिया पटकाणिया लालची लोगां पर लांठौ व्यंग्य है। चित्रण बडौ स्वाभाविक अर यथार्थ है। भासा जोधपुरी मारवाड़ी रौ वौ रूप है जिकौ पढिया-लिखिया अर सिष्ट समाज में प्रयुक्त हुवै। यां रै सामाजिक अेकांकियां में सैर में रैवणिया कायस्थ परवारां रै जीवन री स्पष्ट छाप है। इण रै अलावा न्यारी-न्यारी किताबां रै रूप में वै 5-6 अेकांकी भळै लिखिया ज्यां में सामाजिक जीवन में आयोड़ा दोसां, रौ चित्रण है। मूळ प्रेरणा समाज सुधार अर ग्रामोत्थान व शिक्षा-प्रचार री है। यां रा प्रमुख अेकांकी हैं—लालची मां बाप, रिश्वत, ठाकुरशाही री झलक, अंधविस्वास, कर्जे का अभिशाप, आदर्श गांव, सौ कमाऊ अर एक खाऊ, शफाखाना, सूदखोर, शिक्षा का सवाल अर बाल विधवा। लालची मां बाप केई बार मंच माथै सफळता सूं खेलीज चुकौ है। पिण बाकी रा अेकांकियां में नाटकीय परिस्थिति या नाटकीय मोड़ रौ अभाव हौणा सूं वै इत्ता सशक्त नीं बण सकिया। फेर भी अेकांकी साहित रै विकास में माथुर सा'ब रै जोगदान नै आदर सूं याद कियौ जासी। माथुर सा'ब रौ अेक अेक की 'पंचायत राज' सन 1963 में स्टूडैंट बुक कम्पनी जैपुर सूँ भलै निकळियौ।

 

यां रै अलावा मरुवाणी, ओळमो, राजस्थानी वीर अर हरावळ में भी अेकांकी प्रकासित होता  रै'वै। कीं प्रमुख अेकांकीकार अर वाँरी कृतियां इण माफक है—श्रीमंत कुमार ब्यास—(1) चानणौ

 

(2) लिछमी अर घुग्घू; गणपतलाल डांगी—कुबदी चाकर (6 दरसाव है पिण 5-0 लैणां रौ एक एक दरसाव भी है।), जगदीश माथुर-पितरां रौ आगमण, लक्ष्मीकुमारी चुंडावत—हार सट्टे पिव आणियो, मनोहर शर्मा—सोढी राणी इंत्याद। श्रीमंत कुमार व्यास रा मरुवाणी अर राजस्थानी वीर में 5 अेकांकी प्रकासित हुआ। राजस्थान साहित्य अकादमी री तरफ सूं यां पंक्तियां रै लेखक द्वारा संपादित 15 अेकांकी 1966 में निकळिया जिण में यां लेखकां रा अेकांकी लिया गया है—पारीकजो रौ 'बोळावण', लक्ष्मीकुमारीजी चुंडावत रौ सामधरमी माजी, शक्तिदान जी कविया रौ—वीरमती, डा० आग्याचंद जी भंडारी रौ—देस भगत भामासा, दामोदर प्रसाद जी रौ कामराज री आंखड़ल्यां, बैजनाथजी पंवार रौ—आंपणौ खास आदमी, अम्बा लालजी जोशी रौ—मिनखपणौ, गोविंदलालजी माथुर रौ—डाक्टर रौ ब्याव, मुनी पूनम चन्दजी रौ—हाथै कीजै कामड़ा, किणनै दीजै दोस, डा० नारायणदत्त श्रीमाली रौ—बींनणी, शोभाचन्द जी जम्मड़ रौ—टींगर टोळी, गणपतचन्द भण्डारी रौ—'सीहण' जाया साव, डा० मनोहर शर्मा रौ—बदळी, रावतजी सारस्वत रौ— सम्पादक री मौत अर यादवेन्द्र चन्द्र जी रौ—देवता। यां अेकांकियां रै चुणाव में अर सम्पादन में म्हारी कोसीस आ' रयी कै विसयां रौ विविधता भी आवै अर टैकणीक री दृष्टि सू अेकांकी में थोड़ा-घणा नाटकीय मोड़ जरूर व्है। म्हारै मतै में या सारा अेकांकियां में नाटकीय परिस्थिति जरूर मिळै पछै भलेई वा सबळी हवौ या निवळो। यां में भी नाटकीय मोड़ अर रंगमंच री दृष्टि सूं गोविंदलाल जी रौ डाक्टर रो ब्या’व घणी सफळ बण पड़ियो है अर वौ केई जगा अभिनीत भी हो चुकौ है। बींनणी रौ नाटकीय मोड़ भी आछो बण पडियौ है। भासा री सबळता नै मुहावरां री चुस्ती में बैजनाथ जी रौ 'आंपणौ खास आादमी' सारां सिरै है। जम्मड़जी रौ 'टींगर टोळी' भी परिवार नियोजन सम्बन्धी छोकौ प्रहसण है।

 

सन् 1982 में अेक अेकांकी संग्रै नगराज जी शर्मा रचित 'राम मिलाई जोड़ी' भी प्रकासित हुवौ जिण मैं वांरा 8 अेकांकी है। यां मैं विसयां री घणी विविधता है। 'चांद पर आदमी रै हमलै' कानीं भी लेखक री निजर गई है अर बंगला देश री लड़ाई भी। पढाई री समस्या भी है अर पढी लिखी बहू रै अणपढ घर में आणै पर ऊठण बाळो समस्या भी। यां अेकांकियों में कठैई-कठैई नाटकीय मोड़ भी है पण सारां सू बत्ती सरावण जोगी है यां री भासा। वा बड़ी जीवंत, स्वाभाविक मुहावरेदार सेखावाटी री 'राजस्थानी है। अै' अेकांकी भी सोद्देस है अर सीख देवण री या विचार विसेस रै प्रचार री प्रवृत्ति लेखक माथै हावी हुयोड़ी साफ दीसै। इण रै सागै ई म्हैं अेक फेर अेकांकी री चर्चा करणी चा'वू हूं जकौ कै थोड़ा बरसां पै'ली 'राजस्थानी बीर' में छपियौ हौ। उण रौ सिरनामौ है—'म्हनै ब्या कोनी करणौ' अनुवादक जमुनाप्रसाद पाचेरिया जो मराठी अेकांकी रो सेखावटी बोली में अनुवाद हैं पण ई री भासा इत्ती मुहावरेदार अर सगतीसाळी है कै पढ'र मन घणौ राजी हुबै। ई में नाटकीय परिस्थिति, बिसै घर व्यंग्य सारी बातां रौ इत्ती सखरो मेळ है कै औ अेकांकी मंच माथै घणौ सफल र'यौ। जोधपुर में बिजलीघर रौ इंजीनियर एसोसियेशन पांचेक बरसां पै'ला इण नै श्री पी० पी० भंडारी रै निर्देसण में टाऊन हॉल मैं अभिनीत कियौ अर दरसका इण री घणी सरावना करी।

 

यां रै अलावा हरावळ रा अंकां में 18 वों पृष्ठ एकांकी अर नाटकां रै वास्तै अळूंचियोड़ौ है अर वीं में अेक पूरी मौलिक नाटक 'गुवाड़ री जायोड़ी' छपियौ जिण रा लेखक है सत्यनारायण प्रभाकर 'अमन'। नाटक री भासा जोधपुरी राजस्थानी है अर ई रौ कथानक काल्पनिक है जीं में अेक गांव री जायोड़ी लुगाई आप रै अपमान री बदळौ आप री मरदानगी सूं लेवै अर सासरा वाळां रौ अहंकार तोड़ै। हरावळ में सत्यप्रकास जी जोशी एक अनुदित अेकांकी 'मस्सौ अर मदनमोहन माथुर रौ अनुदित एकांकी 'नकल' छपियौ। 'मस्सौ' अेकांकी में जोशी जी अनुवाद रै साथै ई पर राजस्थानी रंग भी चढायौ है—नाम सारा राजस्थानी कर दिया है पिण वीं रौ मनोवैज्ञानिक नै सैक्स प्रधान कथानक हाल राजस्थानी रा पाठक दोरौ ई पचा सकै, मंच माथै खेलण रौ तो सवाल ई नीं ऊठै।

 

यां रै अलावा थोड़ा घणा गीत-नाट्य अर रेडियो नाटक भी राजस्थानी में लिखी—जिया है। श्री रामनाथ परिकर रो 'मोर-टेलणी' अर कल्याणसिंह राजावत री कृति कृष्णा कुमारी गीत रूपक है अर डॉ० नारायणदत्त श्रीमाळी रौ 'बातचीत' नै नरसिंहजी राजपुरोहित रौ 'धरती गावै रै' नै डॉ० नारायणसिंह भाटी रौ 'जेठवा ऊजळी' रेडियो नाटक।

 

अंत में निष्कर्ष रूप में औ कै'णौ चावूं हूं कै लम्बा मंचीय नाटकां रौ जुग तो बीत चुकौ पण साहितिक नाटकां भी रचना आज भी हू सकै है अर व्हेणी चाईजै। राजस्थान रौ इतियास नाटकीय घटनावां सूं भर्यौ पड़ियौ है अर आंपां र वास्तै कित्ती शरम री बात है कै हिन्दी नाटककार प्रेमी जी मध्यप्रदेश रा होता हुवां भी आप रा घणकरा नाटक राजस्थान रा इतिहास माथै लिखिया पिण राजस्थानी में ऐतिहासिक नाटकां रौ क्षेत्र लगभग सूनौ ई है। लेखकां ने ई कानी ध्यान देणी चाईजै। दूजी बात आ कै नाटककारां अर अेकांकीकारां नै नाटक रचना री टेकनीक अर बीं रै सिद्धांतां रौ व्यापक अध्ययन करणौ जीं सूं वै मंच र वास्तै सबळा एकांकियां रो नै नवी टेकनीक रा नाटकां रौ निर्माण कर सकै। अंग्रेजी साहित तो समस्या नाटक सूं आगै एब्सर्ड नाटकां तक जाय पूगौ है अर हिन्दी में भी मोहन राकेश रा नाटकां रै पछै लंबा नाटकां रौ जुग पाछौ आवण लागौ है हालांकि अै नाटक पारसी प्रणाली सूँ अगळा अर जुदा ढंग रा है, अेक ई सैट माथै मामूली साज सामान सूं खेलीजै अर ज्यादातर दो अंकां रा हुवै। अपां इण क्षेन्न में घणा लागै हां। काछबा री चाल सूं सिरकियां काम नीं चालै—हिरण बण'र छलागां भरण भरी जरूरत है पिण अधबिच में नींद भी नीं लेणी है। समसामयिक जीवन री राजनैतिक, आर्थिक अर सामाजिक समस्यावां नै राजस्थानी रै समरथ नाटककारां री उडीक है। आसा है म्हांरा लेखक वांरौ हेलौ सुणैला।

स्रोत
  • पोथी : परंपरा (राजस्थानी गद्य री परंपरा नै आधुनिक विकास) ,
  • सिरजक : गणपतचन्द भण्डारी ,
  • संपादक : हुकम सिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर
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