आई. अे. अेस री ट्रेनिंग रै बाद पैली पोस्टिंग अेस.डी.अेम. माउंट आबू रै रूप मांय मिली। पैली पोस्टिंग अर बा ई राजस्थान रै सुरग मांय, जठै माउंट आबू तो टूरिस्टां सूं भरयो रैवतो, पण आबू रोड (तहसील आबू रोड मांय है अर अेस.डी.अेम माउंट आबू) तो टूरिस्टां सूं भरयौ रैवतो, पण आबू रोड (तहसील आबू रोड मांय है अर अेस.डी.अेम. माउंट आबू मांय बैठै।) री पांच-छव पंचायतां नै छोड’र बाकी सगळी पंचायतां भाखरां माथै बस्योड़ी ही। अेक तो अठै री गरासिया जनजाति रै गांवां मांय जन-सुणवाई अर रात्रि चौपालां खातर जावणो अर दूजो म्हैं फोटोग्राफी रो शौकीन। इण दोनूं कारणां सूं आं भाखरां अर अठै रैवाणियां नै अेक तो प्रशासक अर दूजो घुमक्कड़ हुवण रै नातै देख्यो।

 

इण लेख मांय म्हारो फोकस अठै री जनजाति गरासिया पर रैयसी। खास बात रैयसी आंरी अनूठी अर निराळी ब्याह-परंपरा माथै।

 

गरासिया साचै अरथां में सिरोही, उदयपुर, पाली अर गुजरात रै बनासकांठा जिस्या जिलां मांय रैवै। भाखरां माथै छितरायोड़ा घर। आं रो गांव फाळियो कैयीजै। फाळिया रो अेक पटेल भी हुवै। लूंठी रीत, गीत अर बींत रा अै लोग आज रै समाज सागै रळमिल’र चालण री कोसिस कर रैया है।

 

म्हैं खास जिक्र करूंला आं रै ब्याह रै बारै मांय। म्हनै पतो है कै घणकरां खातर आ अेक नवी अर निराळी बात होयसी। आंरी ब्याह री रीत आज रै जमानै री लिव-इन रिलेशनशिप सूं मिलै। 
दरअसल, राजस्थान अर गुजरात री इण गरासिया जनजाति में दिनां रो विवाह मेळो मंडै। ईं मेळै मांय किशोर अर जवान छोरा-छोरी बे-रोक-टोक मिलै अर अेक-दूजै नै पसंद कर भाग जावै। अै भाग्योड़ा जोड़ा पाछा आय’र बिना ब्याह रै धणी-लुगाई दांई सागै रैवणो सरू कर देवै। सागै रैवणो सरू करतां ई समाज री सहमति सूं छोरै रा मां-बाप छोरी रै परिवार आळां नै कीं रिपिया देवै। आंरै टाबर हुयां पछै अै लोग चावै तो ब्याह कर सकै, पण घणकरी बार आपरी जिम्मेदारी रै कारण अै ब्याह नीं करै अर जीवण चालतो रैवै। केई बार तो बेटा अर आगै बांरै ई बेटा हुय जावै, पण औपचारिक ब्याह करण री कोई जरूरत नीं समझै। म्हैं इस्या ब्याह भी सुण्या-देख्या जठै टाबर आपरै फेरां रै साथै मां-बाप रो ब्याह मांय पोता अर पड़पोता तांई सामल हुवै। खास बात आ भी है कै ब्याह रो खरच छोरै आळा उठावै और तो और, फेरा भी छोरै रै घरां ई हुवै।

 

केई बार भाग’र पाछा आयां पछै लिव-इन मांय रैवता थकां अगर लुगाई चावै तो किणी और मेळै मांय दूजै आदमी नै ई आपरो लिव-इन पार्टनर चुण सकै। पण ईं स्थिति मांय लिव-इन पार्टनर नै पैलां आळै आदमी नै वींरै परिवार कानी सूं दियोड़ा रिपियां सूं ज्यादा रिपिया देवणा पड़ै।

 

जे लिव-इन में रैवता थकां टाबर नीं हुवै तो वो जोड़ो ब्याह नीं कर सकै। आप इण बात नै इयां समझौ कै जठै समाज मांय बिना ब्याह रै टाबर हुवणो कळंक मानीजै, बठै ई गरसियां मांय ब्याह हुवण खातर लिव-इन मांय रैवण आळा आदमी-लुगाई रै टाबर हुवणो जरूरी है।

 

ईं प्रथा रै बारै मांय जद म्हैं जाणन री खेचळ करी तो पतो पड़्यो कै लगैटगै हजार साल सूं आ परंपरा चाल रैयी है। लोग कैवै  सईकां पैलां गरासिया जनजाति रा च्यार भाई अलग सूं जाय’र बसग्या। तीन भायां तो ब्याह रचा लियो, पण अेक भाई समाज री छोरी सागै लिव-इन मांय रैवण लाग्यो। तीन भायां रै ब्याह रै केई बरसां बाद भी टाबर नीं हुयो। फगत लिव-इन आळै भाई रै टाबर हुयो अर वंश आगै बध्यौ। तद सूं ई आ परंपरा चालण लागरी है।

 

केई बार सोचूं कै अै जनजाति रै तौर पर गरासिया कितरा अलग अर आगै है– केई मामला मांय सभ्य कैयीजण वाळै समाज सूं। पैली बात तो आ है कै प्रेमविवाह पर रोक टोक नीं है, बल्कै दो दिनां रै विवाह मेळै मांय मां-बाप खुद आगै होय’र आपरै टाबरां नै भेजै। छोरी आपरी पसंद सूं छोरो चुणै अर भाग जावै। पाछा आय’र सागै रैवै। इण मांय छोरी रै मां-बाप री बदनामी नीं है, बल्कै समाज री रीत रै कारणै छोरै रा मां-बाप छोरी रै मां-बाप नै रिपिया देवै। आ बात आपणै आधुनिक समाज री बेटी आळां रै दहेज सूं साव अलग है।

 

लिव-इन मांय रैवता थकां जे छोरी नै छोरो पसंद नीं आवै तो दूजै मेळै मांय दूसरो पार्टनर चुणन री आजादी है। समाज-शास्त्र मांय पढावै कै, ब्याह अेक समाजिक समझौतो है, जको छोरा-छोरी रै सागै रैवण अर संतान री उत्पत्ति नै समाजू तौर माथै मान्यता देवै, पण म्हनै लागै के गरासिया इण सोच सूं आगै है। ब्याह तो केई इसा जोड़ा भी है, जका पूरी जिनगाणी मांय करै कै नीं, पण समाज नै कोई दिक्कत नीं है।

 

आपां पढया-लिख्या लोग आंनै जनजाति कैवां, पण महिला री आजादी अर वींरै प्रेम नै मान्यता देवण मांय गरासिया आपणै सूं केई गुणा आगै है।   

स्रोत
  • पोथी : कथेसर राजस्थानी तिमाही ,
  • सिरजक : जितेन्द्र कुमार सोनी ,
  • संपादक : रामस्वरूप किसान
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