आज भारत में किणी कवि कलाकार नै लाख रुपियां रौ पुरस्कार भेंट कर्यौ जावै तो बड़ी बात मानी जावै अर आखौ देस उण रौ गौरव-गान करै। पण राजस्थान मांय तो इसा अणगिणत ‘लाखपसाव’ कवि-कोविदां नै भेंट कर्या गया है अर चर्चा तो ‘कोड़पसाव’ री भी सुणी जावै है। ‘लाखपसाव’ राजस्थानी साहित्य जगत रौ अेक प्रकाशमान प्रसंग है, जिण रौ हाल तांई पूरौ लेखौ-जोखौ भी नीं हुय पायौ है।
जद भी किणी कवि नै कोई राजा अथवा महाराजा ‘लाखपसाव’ भेंट करतौ तो बडौ दरबार कर्यौ जावतौ, जिण मांय बडा-छोटा सगळा दरबारी अर साथै ई नगर रा मातबर लोग भेळा हुवता। इसै दरबार मांय कविराजा नै ऊंचौ आसण मिळतौ अर सोनै रै थाळ में सिरौपाव, गहणा तथा मोहरां सूं संजोय’र भेंट दी जावती। साथै ई स्थायी सम्पत्ति रै रूप में गांवां रौ पट्टौ भी ‘सासण’ नांव सूं दियौ जावतौ। ईं अवसर माथै कवीसर नै हाथी-घोड़ा भी भेंट कर्या जावता। उण जमानै में आ बड़ी बात ही अर घणै सनमान री सूचक ही। कवि-सम्मान रौ ओ राजसी उच्छब सम्पन्न हुयां पछै पालखी में अथवा हाथी रै होदै माथै कविराज री सवारी निकळती, वां माथै चवद ढुळता। घणै सनमान सूं कविराजा नै आपरै डेरै पुगाया जावता। राजाजी आप घोड़ै माथै अथवा पाळा ही जुलूस में चालता कविराजा री जय-जयकार हुवती। कई बार तो अेक सागै ही अनेकूं कवीसरां नै ओ सनमान दियौ गयौ, जिणरै वर्णन सूं ख्तायां रा पानां दीपै है।
सारौ देस राजस्थान रै इतिहास रा गुण गावै है, उण माथै गौरव अनुभव करै है, पण ईं इतिहास रै महाप्राण नर-नारियां नै बणाया तो अठै रौ साहित्य ही। जे राजस्थानी भाषा रौ ओज-तेज सूं भर्यौ-पूरौ साहित्य नीं हुवतौ तो लोगां नै नामां-कामां री प्रेरणा कठै सूं मिळती अर क्यूंकर प्रकाश मांय आ पावता? पण ईं तथ्य नै राजस्थानी भली-भांत समझ्यौ अर लोक-प्रमुख राजावां रै हाथां सूं आ फळवती परम्परा चालू राखी।
लोग कैवै के राजस्थान सदा सूं शक्ति रौ पुजारी है, सो तो सही पण साथै ई ओ वीर-लोक सरस्वती रौ उपासक भी तो रैयौ है। शक्ति रै लारै लक्ष्मी आवै। राजस्थान रा शक्तिपुत्र आपरी लक्ष्मी नै खजानै री कैद में काठी नीं राख’र उणनै सरस्वती-पुत्रां री भेंट चढावता रैया, जिणरी निसाणी अठै रा बडा-बडा अणगिणत साहित्य-संगीत जमावड़ा अर चित्रकळा री उन्नति है। अनोखी बात आ है के राजस्थान रै चारण रौ नाम भी शक्तिपुत्र है, जिणरी वाणी रै वरदान सूं राजस्थानी राजस्थानी साहित्य महिमामय हुयौ। इण भांत लाखपसाव अेक शक्तिपुत्र री दूजै शक्तिपुत्र नै सादर भेंट है। पैली राजस्थान मांय लक्ष्मी रौ बड़पण नीं रैयौ, शक्ति अर सरस्वती दोनुंवां रौ गौरव रैयौ। ओ ई कारण है कै अठै जन-जीवण मांय त्याग अर बलिदान री ऊंची महिमा है। राजस्थान रौ प्रत्येक मिनख के तो वीर बणणौ चाह्यौ है अर के दानी। त्याग रौ तो अर्थ ही सम्पत्तिदान बणगौ। छोटै-छोटै गांवां मांय भी अठै इसा-इसा बडा आदमी हुया है कै वां रै दान री बातां ही चायै है। पछै राजा-महाराजा ‘लाखपसाव’ देवता रैया तो इण बात में अचरज हौ कांई?
राजस्थान ‘लाखपसाव’ री धरती है, पण अठै रौ साहित्य लाखपसाव रौ साहित्य नीं है। राजस्थान रै कवि लक्ष्मी रै लोभ में कविता नीं करी। उण नै राज-दरबार मांय घणौ सनमान मिल्यौ पण फेर भी वो दरबारी कवि नीं बण्यौ। वो तो स्वाभाविक प्रेरणा सूं आपरै मन री मौज में काव्य-रचना करी। वो विलासी राजावां री कल्पित कीरत रा तारा चमकाय’र इनाम नीं लीनी। वो अकरम करणियै राजावां रा इसा ‘विसहर’ कैया है कै वै आपरौ काळजौ पकड़ लियौ अर कई बार तो कविराजा पर घणा नाराज भी हुया। पण कवीसर इसी नाराजगी री कद परवाह करी अर कद आपरौ सुभाव छोड्यौ? राजाजी आपरौ लाखपसाव काठौ राखौ। कवि-धरम री मरजादा रौ त्याग वै नीं कर्यौ।
राजस्थानी रौ साहित्य विड़द-वखाण सूं भर्यौ पड़्यौ है, पण इण विड़द-वखाण रौ असली भेद दूसरौ है। राजस्थानी कवि जठै भी विरता, त्याग अर दूजै किणी खास गुण रौ उठाव देख्यौ तो उण रा गीत दिल खोल’र आया। बो उण निरमळ भावना नै स्थाई राखण सारू आप री वाणी रौ सदुपयोग कर्यौ, जिण सूं समाज मांय गुण री पूजा हुवती रैवै अर लोग सच्चाई रै मारग नै कदै नी भूलै। इणी काव्य-रचना सूं जे कवि नै अेक कामळी भी मिळी तो वो उण नै लाखपसाव सूं भी ऊंची इज्जत मानी। इसा लाखपसाव देवणियै सूरां अर सतवादियां रा नांव भावै ख्यात ग्रंथां में न चमक्या हुवै पण कवि-वाणी रै प्रताप सू वै आज भी जन-साधारण रै हिरदां में मंड्योड़ा है। वे कदै भी मिट नीं पावै।
इण भांत राजस्थान रै कवि सत री नींव नै पुखता करी अर कीरत रै कामठाण नै डिगबा नीं दियौ। राजस्थान रा बड़ा-बड़ा भक्त-कवि भी इसै ‘प्राकृत जनां’ हुवौ पण गुण-करम रै विचार सूं वै महापुरसां री महिमा सूं मंडित हा।
जद दिल्ली री बादसाही आखै भारत नै दाबण सारू तेग उठाई तो राजस्थान री कवि-वाणी इण पुत्रभोम रै वज्र-वीरां में नया प्राण भर दिया। ओ राजस्थानी कवि-वाणी रौ ई पुत्र परताप हौ कै मुगलाई माया-जाळ में भारत रौ ‘स्वर्ण-मृग’ फस्यौ कोनीं अर आजाद रैयौ। माडै राजावां रा मुकट आगरै रै दरबार में उतरण लाग्या तो राजस्थान देस री ‘पाघ’ नै सदीव ऊंची राखी। ओ राजस्थानी रौ ही अमिट प्रभाव है कै घनघोर घटा मांय भी भारत रै प्रताप रौ सूरज छिप नीं सक्यो अर भळकतौ ही रैयौ।
राजा-महाराजा कवीसरां नै लाखपसाव भेंट कर्या तो आपरौ ‘राज-धरम’ समझ’र ही कर्या। वै समाज मांय कवि-कोविदां रौ सम्मान बणाणौ राख्यौ अर उणां नै ‘संसारी-संकट’ में पड़बा नीं दिया। जिका गुणी समाज नै प्रेरणा अर बळ देवै, जे वै ही संसारी-संकट में पड़ ज्यावै तो पछै समाज अर राज मांय ओज कठै सूं आवै अर कुण अडावै में भटकतै मिनखां नै सही मारग दरसावै?
इण सार-तत्व नै राजस्थान समझ्यौ अर अठै ‘लाखपसाव’ राजधरम रौ अंग बण’र दीप्यौ। ओ ई कारण है कै राजस्थान रा नर-नारी आप री आन पर प्राण देवण नै सदा त्यार रैया अर इसा काम कर दिखाया, जिणां री कीरत-कथा सूं सम्पूर्ण देस अंजसै है। इण कीरत-खंभ नै राजस्थान रा कवि-कोविंद ही मिलर खड़्यौ कर्यौ। राजस्थान रा राजा-महाराजा तो इण कीरत-खंभ नै देवरूप मान’र इणरै चरणां में लाखपसाव रा पुसब भेंट कर्या अर आपरौ धरम निभायौ।
ज्ञान री साधना करड़ी घणी है। आ साधना थोड़ा-सा मिनख ही कर पावै। जिण देस मांय कवि-कोविंदां रौ सनमान हुवै, उणी देस मांय ज्ञान री तपस्या फळै अर इण साख रौ लाभ समाज नै सुलभ हुवै। कवि-वाणी रौ रस देस री धरती रौ धीणौ है। इण धीणै सूं जनता रौ हिरदौ सरसावै, मन निरमळ बणै अर आतमा में बळ आवै। समाज री दूजी भांत री उन्नति तो पाछै री चीज है। निबळै मन नै लेय’र सबळौ तन कांई कर सकै? चारित्रिक उठाव बिना मिनखां री भीड़ किण काम री? ओ ई कारण है के कवि-कोविदां नै राष्ट्र रा निर्माता बताया गया है। वे राष्ट्र रै भवन रा खरा अर मजबूत खंभा है। इसा खंभा खड़्या रैवै जितरै ओ भवन डिग नीं पावै। लाखपसाव री भावना आ ही है, जिणनै राजस्थान भली भांत समझी अर पुरी तरां निभाई।
आज राजस्थान रौ सारौ ही वातावरण नयौ है। आज राजस्थान मांय लक्ष्मी रौ वैभव है। राजस्थान रा सपूत हिम्मत बांध’र दूर-दूर गया अर आपरी तपस्या सूं बडै-बडै उद्योग-धंधा री स्थापना करी अर लक्ष्मी-पुत्र रौ विरुद धारण कर्यौ। पैली ओ प्रदेश अनेक रजवाड़ां में बंट्योड़ौ हौ अर आज पूरी तरां संगठित तथा व्यवस्थित है। अठै री जनता भी पैलां सूं ज्यादा जाग्योड़ी है। आज राजतंत्र रौ स्थान लोकतंत्र लेय राख्यौ है। फेर भी कई पुराणी परम्परावां रौ लोप देख’र कैवणौ पड़ै के ''ते हि नो दिवसा: गता:।'' भारत रै विभिन्न प्रदेसां मांय बस्योड़ै राजस्थानी लक्ष्मीपुत्रां द्वारा तथा राजस्थान रै शासन री तरफ सूं भी किणी रूप में अठै रै सरस्वती-पुत्रां रौ सनमान कर्यौ जरूर जावै है, पण बो आज रै बखत-भावां नै देखतां अेकदम साधारण ई है।