कलाधाम राजस्थान! ललित अर लोक दोनूं ई भांत री कलावां री दीठ सूं सदीव सूं ई अप्रतिम रैयौ है। इण धोरा धरती माथै लोक रमती अर शास्त्र मंडली न्यारी-न्यारी ललित कलावां रै साथै-साथै भांत-भांत री लोक कलावां जुगां सूं राजस्थान नै रंगीलौ बणावती आ रैयी है। आपरी कला-छिब सूं राजस्थान रौ रूप तर-तर निखरतौ ई रैयौ।
आजादी रै बाद जद राजस्थान रौ गठन हुयौ तौ इणरै त्हैत केई रियासतां अर ठिकाणां रौ विलय हुयौ। न्यारी-न्यारी रियासतां अर न्यारा-न्यारा ठिकाणां में जनमी-पनपी कलावां रौ संपूरण स्वरूप जद सामी आयौ तौ आखी दुनिया इचरज में पड़गी। आज, दुनिया में आपरै छेत्रफळ रै अनुपात में सै सूं बेसी गढ-किला राखण वाळौ राजस्थान ललित अर लोक कलावां रै मामलै में जगचावौ है। राजसी अर जन-मानसी परंपरावां में पनपी राजस्थानी कलावां रौ कोई छेह है, नीं कोई पार।
राजस्थानी चित्रकला
‘राजस्थानी चित्रकला’ सूं मतलब राजस्थान री धरती माथै जनमी-पनपी चित्रकला सूं है। यूं तौ कोटा जिलै रै आलणिया, दरा बैराठ अर भरतपुर जिलै रै दर नांव रै स्थानां रै परबत-गुफावां में आदिम मानखै रै उकेर्योड़ै रेखांकनां अर माटी रै बरतनां री कलात्मक उकेरणां इण प्रदेस री सरूआती चित्रण—परंपरा नै उदघाटित करै, पण ‘राजस्थानी चित्रकला’ अेक खास अरथ में ई बरतीजै।
राजस्थानी चित्रकला रौ प्रमुख केन्द्र मेवाड़ रैयौ, जठै प्राचीन काळ सूं ई चित्रण परंपरा रा उल्लेख मिलै। ताड़पत्र माथै चित्रित पैलौ उपलब्ध ग्रंथ ‘सावग पड़िकमण सुत्त चुन्नी’ है, जिकौ सं. 1260 ई. में गुहिल तेजसिंह रै राज में उदयपुर रै अहाड़ में त्यार करीज्यौ। इण भांत राजस्थानी चित्रकला री पूरबली परंपरा में अनेक सचित्र ग्रंथ, लघुचित्र अर भित्तिचित्र उपलब्ध हुवै, जिका इणरै उद्बव नै रेखांकित करण में मददगार है। विशुद्ध राजस्थानी शैली री सरूआत स. 1500 ई, रै लगैटगै मानीजै। भाव-विधान अर आलेखन री दीठ सूं राजस्थानी शैली जदपि नवौ नकोर परिवेस ले’र आई ही, पण विषयवस्तु सारू वा आपरी पूरबली अपभ्रंश शैली रौ ई आसरौ लियौ। स्वतंत्रता सूं पैली राजस्थान केई रियासतां में बंट्योड़ौ हौ, सो न्यारी-न्यारी रियासतां में पनपी चित्रकला आप-आपरै मौलिक परिवेस, राजनीतिक सम्प्रक अर सामाजिक संबंधां री वजै सूं उठै-उठै री शैली बाजी। अध्ययन री सुविधा री दीठ सूं भौगौलिक अर सांस्कृतिक आधार माथै राजस्थानी चित्रकला नै 4 प्रमुख कलमां में बांट्यौ गयौ है— 1. मेवाड़ कलम, 2. मारवाड़ कलम, 3. ढूंढाड़ कलम अर 4. हाडौती कलम।
मेवाड़ कलम : इण कलम रै त्हैत चांवड, उदयपुर, नाथद्वारा इत्याद शैलियां अर देवगढ, शाहपुरा, सावर, प्रतापगढ इत्याद उपशैलियां आवै। जैन, अपभ्रंश, मालव इत्याद कलावां रै सामंजस्य सूं राजस्थानी चित्रकला रौ प्राथमिक अर मौलिक स्वरूप ‘मेवाड़ कलम’ में देखण नै मिलै। ‘मेवाड़ स्कूल’ रौ दूजौ प्रमुख मोड़ नाथद्वारा शैली रौ उद्भव है। सं. 1670 ई. में श्रीनाथजी रौ विग्रह नाथद्वारा में थापन करीज्यौ हौ, जिणरै फळस्वरूप उदयपुर शैली अर ब्रज शैली रै मेळ सूं नाथद्वारा शैली रौ जनम हुयौ। नाथद्वारा शैली री मौलिक देन है पिछवायां। श्रीनाथजी रै विग्रह रै लारै सजावण सारू बडै आकारां रा जिका पड़दा बणाईज्या, वै पिछवायां रै नांव सूं जाणीजै। लोक कलात्मक प्रभाव रै कारण नाथद्वारा शैली री आपरी न्यारी निजू खासियतां रैयी है।
मारवाड़ कलम : इण कलम रै त्हैत जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ शैलियां अर जैसलमेर, नागौर घाणेराव, पाली इत्याद उपशैलियां आवै। 7वीं शताब्दी ई. में मरुप्रदेस में हुयै श्रीरंगधर नांव रै चित्रकार रौ उल्लेख तिब्बती जात्री तारानाथ आपरै ग्रंथ में कर्यौ है, पण इण बाबत किणी ई तरै री सामग्री उपलब्ध नीं हुवण री वजै सूं जोधपुर शैली सूं ई मारवाड़ कलम री सरूआत मानीजै। महाराजा मानसिंह रै बगत में जोधपुर शैली में ठेठ मारवाड़ीपण लावण रा जतन करीज्या। बीकानेर शैली पनपावण में उठै रै मथेरणा परिवारां रौ खास योगदान रैयौ।
नागरीदास रै काव्य प्रेम, गायिका बणीठगी रै संगीत-प्रेम अर कलाकार मोरध्वज निहालचंद रै चित्राकंन री भूमिका रैयी। आज ई ‘बणीठणी’ रो चित्र जगचावौ है। मारवाड़ कलम रौ प्रभाव अजमेर, सावर इत्याद स्थानां रे चित्रां माथै ई पड़्यौ।
हाड़ौती कलम : इण कलम रै त्हैत बूंदी, कोटा, झालावाड़ शैलियां अर दुगारी इत्याद उपशैलियां आवै। बूंदी शैली मेवाड़ अर मुगल कलमां सूं प्रभावित रैयी। राजावां रै कलाप्रेस री वजै सूं बगत-बगत माथै बूंदी शैली रै लघुचित्रां रै माध्यम सूं इत्ती भारी संख्या में ग्रंथां रौ चित्रण हुयौ क आज संसार भर रै संग्रहालयां में बूंदी शैली रा चित्र देखण नै मिलै। बूंदी रै राव रतनसिंह रै दूजै बेटै माधोसिंह हाड़ा सूं प्रसन्न हुय’र मुगल सम्राट शाहजहां की परगना उणनै जागीर में दिया जिणरै फळस्वरूप सं. 1631 में कोटा राज्य की थापना हुई ही। सो बूंदी शैली सूं ई निकळ्योड़ी कोटा शैली नै न्यारै-निजू अस्तित्व थापन करण रौ जस उठै रै राजा रामसिंह नै जावै। झालावाड़ रै राजम्हैलां में जिका भित्ति चित्र उपलब्ध है उणां रौ हाल बारीकी सूं अध्ययन नीं हुयौ है।
अठै उल्लेखजोग अेक बात आ है क राजस्थान रा प्राचीनतम गुफाचित्र हाड़ौती छेत्र में ई मिल्या है।
ढूंढाड़ कलम : इण कलम रै त्हैत आमेर, जयपुर, अलवर, सेखावाटी, उणियारा, करौली इत्याद शैलियां आवै। शासन रै केन्द्र दिल्ली अर संस्कृति रै केन्द्र ब्रज रै सम्प्रक में रैवण री वजै सूं ढूंढाड़ री चित्रकला बगत-बगत माथै नवै-नवै रंगरूपां में विकास करती रैयी। आमेर शैली रा सब सूं पुराणा उदाहरण उठै री छतरियां रा भित्तिचित्र है। सवाई जयसिंह रै सं. 1727 ई. में जयपुर बसायां आमेर शैली उणां नै विरासत में मिली। भित्ति-चित्रण जयपुर री खासियत बणी। सवाई जयसिंह रै बेटै ईश्वरीसिंह रै बगत में साहिबराम नांव रौ चित्रकार आदमकद चित्र (प्रोट्रेट) बणा’र अेक नवीं परंपरा घाली। मुगल प्रभाव नै अंगेजता जयपुर रा कलाकारां राजपूती संस्कृति री नफासत अर रंगां री लोककलात्मकता रौ संतुलित उदाहरण प्रस्तुत कर्यौ। जयपुर शैली रौ प्रभाव ईसरदा, सिवाड़, झिलाय, उणियारा, सामोद अर मालपुरा जैड़ै ठिकाणां माथै ई रैयौ। सं. 1770 ई. में राजगढ में दुरग अर स. 1775 ईसवी में अलवर में राजधानी बणा’र राव राजा प्रतापसिंह ढूढाड़ स्कूल री अलवर सैली पनपाई। उणां रै बाद राजा विनयसिंह दिल्ली दरबार सूं उजड़योडै कलाकारां नै आसरौ दे’र ग्रंथ चित्रण री मुगलिया परंपरा नै आगै बढाया। अलवर शैली रै विकास में तिजारै रा चित्रकारां ई आपरौ योगदान दियौ। भरतपुर अर करौली शैलियां माथै ब्रज रौ प्रभाव बेसी रैयौ। जयपुर शैली रै भित्ति चित्रण रौ सब सूं बेसी प्रभाव सेखावाटी माथै पड़्यौ, नतीजन नवलगढ़, रामगढ, फतेहपुर, मुकुंदगढ, मंडावा, परूस रामपुरा, चूडी अजीतगढ इत्याद स्थानां रा सेठ बडी-बडी हवेलियां बणवा’र उणां रौ खूणौ-खूणौ चित्रित करवायौ।
इण भांत 16 वीं सूं 19 वीं शताब्दी ई. तांई मेवाड़, मारवाड़ हाड़ौती अर ढूढाड़ कलमां री न्यारी-न्यारी शैलियां अर उपशैलियां में विकसित राजस्थानी चित्रकला आज बूंदी, किशनगढ़ इत्याद शैलियां रै पाण तौ जगचावी हुयगी है।
आधुनिक चित्रकला
राजस्थानी चित्रकला में आधुनिकता रौ सूत्रपात उदयपुर रै मास्टर कुंदनलाल मिस्त्री (सं. 1866-1926ई.) सूं मानीजै। गरबजोग बात आ क अै भारत रै पैलै आधुनिक चित्रकार रवि वर्मा रै समकाळीन हा। इणां नै सं. 1889. ई. में चित्रकला रौ सरबश्रेष्ठ पुरस्कार ‘वेडिंगटन प्राइज’ मिल्यौ हौ। बाद में ‘चित्रनिपुण’ (सं. 1907) अर ‘चित्रकलाभूषण’ (सं. 1995 ई.) रौ सम्मान ई मिल्यौ हौ। राजस्थान मांय संस्थागत स्वरूप में बंबई रै ‘जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट’ अर इंदौर रै ‘स्कूल ऑफ आर्ट’ दाई आधुनिक चित्रकला री सरूआत स. 1857-58 ई. में महाराज सवाई रामसिंह रै हाथां जयपुर में ‘राजस्थान स्कूल ऑफ आट्रर्स अेण्ड क्राफ्ट्स’ री थापना करीज’र हुई।
राजस्थान में विसाळ आकारां रै कैनवासां माथै यथार्थवादी पद्धति रा अनूठा चित्र बणावण वाळां में जर्मनी मूळरै कलाकार मूलर रौ नांव सोनै रै आखरां में अंकित रैसी। भूरसिंह शेखावत नव यथार्थवादी अर नव प्रभाववादी कला रै संयुक्त रूप नै अपणावण वाळा उच्चकोटि रा चित्रकार हा। मास्टर भूरसिंह सूं चित्रकला री शिक्षा हासल करण वाळै ऊंचै कलाकारां में रामनिवास शर्मा अर कृपाळसिंह शेखावत प्रमुख है। मास्टर कंदनलाल मिस्त्री री परंपरा नै आगै बढावण वाळै चित्रकारां में उदयपुर रै नंदलाल शर्मा रौ नांव उल्लेखजोग है। जयपुर रा शिवनारायण ‘चौगान’ यूरोपीय यथार्थवादी शैली रै साथै भारतीय विषयां रौ सफळता सूं समावेश कर्यौ। जयपुर रै ‘स्कूल ऑफ आर्टस अेण्ड क्राफ्ट्स’ रै आचार्य पद माथै बंगाल स्कूल रै प्रमुख कलाकार असित हालदार रै हुय जावण सूं उणा रा शिष्य बंगाल शैली में चित्र बणावण लाग्या। रामगोपाळ विजयवर्गीय, देवकीनंदन शर्मा, विष्णुदत्त शर्मा इत्याद चावा कलाकार बंगाल शैली रै चित्रांकन में सिद्धहस्त हुयग्या। द्वारकाप्रसाद शर्मा राजस्थानी ठेठ परंपरा सूं ले’र यथार्थवादी चित्र बणाया।
राजस्थान में आधुनिक कला दीठ, समालोचना अर कला समीक्षा रौ विधिवत श्रीगणेश प्रो. रत्नाकर विनायक साखलकर रै हाथां हुयौ। साखलकर रै बाद आधुनिक शैली अर चेतना रै जिण कलाकारां री चरचा करीज सकै, उणां में सूं की नांव इण भांत सरबश्री परमानंद चोयल अर वी.सी. गुई ने नवै कलाकारां में सरब श्री ज्योतिस्वरूप, मोहन शर्मा, प्रेमचंद गोस्वामी, विद्यासागर उपाध्याय, सुमहेन्द्र राधावल्लभ, सुरेश शर्मा, शैल चोयल इत्याद।
इण भांत राजस्थानी चित्रकला आपरी परंपराऊ कला चेतना सूं किनारौ नीं करती थकी अर बंगाल स्कूल रै नव जागरणवादी प्रभाव सूं बचायौ राखती थकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर माथै चाल रैयै आज रै कला आंदोलनां सूं जुड़ रैयी है।
लोक चित्रकला
राजस्थानी चित्रकला रौ दूसरौ स्वरूप है—लोककलात्मक चित्रकला। इणरौ घणकरौ चलण धरम-स्थळां अर जन-समाज में है। लोककलावां जन-जिवण रौ अेक अभिन्न अंग है। अै जन साधारण री अंतम तणी सुंदरता, कलात्मक अभिव्यक्ति अर लोकरंजकता इत्याद री ओळख है। साथै ई साथै अै कलावां अठै रै सामाजिक, धारमिक अर सांस्कृतिक जीवण सूं जुड़ी न्यारी-न्यारी परंपरावां, विसवासां अर अंधविसवासां री सैज, सुभाविक अर सरल अभिव्यक्ति है। राजस्थानी लोक चित्रकला री अेक सिमरिध परंपरा रैयी है। सुविधा री दीठ सूं इण परंपरा नै नीचै लिख्यै भागां में बांट सकां—
1. भित्ति अर भूमि चित्र : अै दो तरै रा हुवै—अेक तौ वै, जिणां रौ आकार हुवै, अर दूजा वै जिका अमूर्त, सांकेतिक अर ज्यामितीय हुवै। पैलै रै त्हैत ‘भित्ति’, ‘देवरा’, ‘पथवारी’ इत्याद आवै, अर दूजै रै त्हैत सांझी, ‘मांडणा’ इत्याद।
2. कपड़ै माथै बणायोड़ा चित्र : इणरै त्हैत ‘पटचित्र’, पिछवाई, ‘फड़’ इत्याद आवै।
3. कागज माथै बणायोड़ा चित्र : इणरै त्हैत न्यारै-न्यारै देवी देवतावां रै चित्रां वाळा ‘पाना’ आवै।
4. लकड़ी माथै बणायोड़ा चित्र : इणरै त्हैत ‘कावड़’ अर भांत-भांत रा ‘खिलूणा’ आवै।
5. माटी माथै बणायोड़ा चित्र : इणरै त्हैत ‘माटी रा बरतन’ ‘लोकदेवता’, ‘लोकदेवियां’ अर भांत-भांत रा ‘खिलूणा’ आवै।
6. डील माथै बणायोड़ा चित्र : इणरै त्हैत डील माथै खिणायोड़ा ‘गोदना’ अर हाथां-पगां रै मांड्योड़ी ‘मैदी’ आवै।
इण भांत लोक चित्रकला रै रूप में वैदिक काळ सूं चल्या आ रैया प्रतीक आज ई लोगां रै विसवासां सूं जुड़्योड़ा है। अै सब जीवण में बधापौ, शक्ति, सुरक्षा, सम्पन्नता अर शांति प्रदान करै। आं अलंकरणां में मौलिकता नीं हूवै, पीढी-दर-पीढी वां परंपराऊ आकारं में ई पाछा प्रस्तुत करीजै, फेरूं ई अै जन जीवण सूं गैरा जुड़िया थका है। दरअसल अै वैयक्तिक अभिव्यक्ति नीं हुय’र सामुदायिक अभिव्यक्ति है।
राजस्थानी संगीत
चावौ इतिहासकार माल्कम आपरै ग्रंथ ‘हिस्ट्री ऑफ पर्शिया’ में लिखै “5वीं शताब्दी वी. में ईरान रा बादसा बहराम गोर हिन्दुस्तान माथै हमलौ कर्यौ अर अठै सूं कोई बारै हजार गायकां नै नौकरी वास्तै लेयग्यौ। गायकां री आ लूट राजस्थान अर गुजरात सूं ई संभव ही, जठै सूं इत्ता संगीतज्ञ लेजाईज सकता हा।”
आ बात सिद्ध करै क राजस्थान री इण धरती रै लोगां रौ प्राचीन काळ सूं ई संगीत रै प्रति अणूंतौ लगाव रैयौ। दरअसल संगीत तौ सदीव सूं ई राजस्थान रै राज-दरबारां री सोभा रैया। केई राजा-महाराज खुद अच्छा संगीतज्ञ, विद्वान अर शास्त्रकार हुया। राजस्थान री कला-परम्परा बारलै हमलां अर मांयली राड़ां नै बगत ई जीवती रैयी। मुगल बादसा औरंगजेब जद भारतीय संगीत नै पूरी तरियां खतम करण सारू कमर कसी, तद राजस्थान री धरती ई अैड़ी सरणजोग स्थळी रैयी जिकी संगीतज्ञां अर संगीत रै विद्वानां नै घणै मान आपरै अठै राख’र भारतीय संगीत-परम्पार नै लगौलग कायम राखी। राजस्थान रा राजा-महाराजावां संगीतज्ञां अर विद्वानां रौ जैड़ौ सम्मान दियौ, वैड़ौ फेर कठैई कम ई हुयौ। वै कलाकारां नै गांवं, जागीरां, पट्टा-परवाणा, लाख पसाव, करोड़ पसाव, उपाधियां, पुरस्कार अर सवारी सारू हाथी इत्याद दे’र आप-आपरै दरबारां में राखता अर राज री सोभा बढावता। सो अणगिणत संगीतज्ञ अर संगीत-विद्वान अठै आ’र बस्या जिणसूं संगीत रै न्यारै-न्यारै घराणां रौ विकास हुयौ अर अनेक महत्वपूरण ग्रंथ ई रचीज्यां। संगीत नै राज्याश्रय प्रदान करण वाळी रियासतां में जयपुर, टौंक, अलवर, भरतपुर, जोधपुर बीकानेर, मेवाड़ इत्याद प्रमुख रैया। केई ठिकाणां ई इण काम में आपरौ योगदान दियौ, ज्यूं क उणियारौ इत्याद।
यूं तौ हरेक रियासत रै हरेक राजा रौ संगीत रै प्रति प्रेम रैयौ, पण की राजा-महाराजा अैड़ा हुया, जिणां रै बगत में संगीत रौ जबरदस्त विकास हुयौ। जयपुर रै महाराजावां सवाई मानसिंह, सवाई जयसिंह, सवाई माधोसिंह पैला, सवाई प्रतापसिंह, सवाई रामसिंह अर सवाई माधोसिंह दूजा; टौक रै नबाब इब्राहिम खां, अलवर रै महाराजा शिवदानसिंह भरतपुर रै महाराजा यशवंतसिंह, जोधपुर रै महाराजा मानसिंह, बीकानेर रै महाराजा अनूपसिंह अर मेवाड़ रै महाराणा कुम्भा रौ संगीत रै विकास रै क्षेत्र में महत्वपूरण योगदान रैयौ।
हवेली संगीत : मुगल बादसा अकबर रै बगत में अष्टछाप संगीत री परम्परा ई राजस्थान में अणूंती ई फूली-फळी। परम्परा शास्त्रीय संगीत री ध्रुपद-धमार, कीरतन इत्याद गान-शैलियां, ने पखावज अर वीणा-वादन री शैलियां रै विकास में जिकौ महत्वपूरण योगदान दियौ वौ आज ई ‘हवेली-संगीत’ री परम्परा में जीवता है। नाथद्वारा, कांकरोली, जयपुर, कोटा, इत्याद रै मिंदरां में आज ई ‘हवेली-संगीत’ आपरी खासियतां कायम राखतौ थकौ छिब बणायोड़ौ है। उत्तरी भारतीय संगीत में वीणा अर पखावज जैड़ै कठण वाद्यां री वादन-परम्परा अर ध्रुपद-धमार री सुंदर बंदिशां नै ज्यूं-री-त्यूं बणाई राखण रौ जस ‘वल्लभ सम्प्रदाय’ नै है। राजस्थान में विकसी आ परम्परा देस नै केई उच्चकोटि रा गायक अर वादक प्रदान कर्या है।
संत-संगीत : संगीत रै छेत्र में केई भगतां अर संतां रौ योगदान ई रैयौ। भगत संगीतज्ञां में मीरांबाई नै कदैई भुलायौ नीं जा सकै, जिणां रा पद न्यारी-न्यारी राग-रागणियां में आज ई सारै देस में बड़ी श्रद्धा सूं गाईजै। ‘दादू पंथ’ रै प्रवर्तक संत दादू अर ‘चरणदासी सम्प्रदाय’ रै संत चरणदास इत्याद रौ ई संगीत री दीठ सूं महत्व है, कारण क इणां री रचनावां ई सैज गेय रूप में प्रस्फुटित हुई है। चरणदास री शिष्यावां दयाबाई अर सहजौबाई ई गेय पदां री रचना करी। आं पदां रौ संगीत री दीठ सूं महत्व है। आं रै अलावा ई अणगिणत संतां अर भगतां री वाणियां अैड़ी है जिकी राग-रागणियां में गाईजै।
संगीत-घराणा : शास्त्रीय संगीत री परम्परावां रौ संरक्षण जद किणी खास परिवारां कानू सूं पैतृक सम्पदा रै रूप में करीजतौ रैवै, तद वै परम्परावां आपरी खासियतां रै पाण ‘घराणां’ रै नांव सूं जाणीजै।
‘ध्रुपद गायकी’ रै विकास में राजस्थान रौ योगदान घणौ महत्वपूरण है। ‘ध्रुप गायकी’ री चार वाणियां—गोबरहारी, डागुरी, खंडारी अर नोहारी—में सूं खंडारी अर नोहारी वाणियां रा प्रवर्तक राजा समोखनसिंह अर श्रीचंद क्रमवार खंडार अर नोहार रा रैवासी हा, जिका राजस्थान में ई आया थका है। ध्रुपद-धमार रै डागर धराणै नै विकसित करण रौ जस जयपुर रै महाराजा सवाई मानसिंह रै दरबारी गायक बहरामखां नै है। इण घराणै में आगै चाल’र उच्चकोटि रा संगीतज्ञ हुया। जयपुर रै उणियारै ठिकाणै में ई दुल्लूखां, छज्जूखां, करीमबख्स, जहांगीरखां इत्याद केई चावा गायक हुया।
‘ख्याल शैली’ ई भारतीय शास्त्रीय संगीत री खास गायन शैली मानीजै।
इणरै ई केई घराणां रै विकास में राजस्थान रौ योगदान रैयौ। ख्याल रै जयपुर घराणै रा प्रवर्तक चावा गायक अर रचनाकार मनरंग मानीजै, जिणां री बंदिशा लगै-टगै सगळै ई घराणा में प्रचलित है। महाराजा रामसिंह रै दरबारी संगीतज्ञ मुहम्मद अलीखां सूं परम्पराऊ बंदिशां रै विसाळ संकळन सारू भातखंडे नै ई इणां रौ शिष्यत्व ग्रहण करणौ पड़्यौ हौ। ‘अल्लादियाखां घराणौ’ ई अनेक बंदिशां री रचना करी जिकी आज ई प्रचलित है। अल्लादियाखां री आ खासियत ही क वै कठण राग ई सरलता सूं गाया गरता हा। ख्याल गायकी रै मेवाती घराणै री सरूआत जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह रा दरबारी कवि घग्घेखां करी ही। ‘जयपुर घराणै’ रै उपघराणै रै रूप में ओळखीजण वाळै ‘पटियालै घराणै’ रै निरमाण में ई राजस्थान री प्रमुख भूमिका रैयी।
वाद्य संगीत में चावौ सितार रौ ‘सेनियौ घराणौ’ ई राजस्थान में ई विकस्यौ। जयपुर रौ ‘बीणकार घराणौ’ ई घणौ चावौ रैयौ।
आगरै घराणै, रंगीलै घराणै, कव्वाल बच्चां रै घराणै इत्याद ई केई गायकां राजस्थान में रैय’र आपरी कला रौ विकास कर्यौ।
भारत रै खूणै-खूणै सूं और ई अणगिणत छुटपुट संगीतज्ञां राजस्थान में रैय’र आपरी कला रौ विकास कर्यौ।
संगीत-ग्रंथ : राजस्थान में संगीत रै क्रियात्मक पगस रै बधापै रै साथै-साथै ई उणरै सैद्धांतिक पगस रै बधापै सारू ई जबरदस्त काम हुयौ। अठै अणगिणत बड़ा-बड़ा संगीतग्रंथ रचीज्या, जिका भारतीय संगीत-परम्परा रै ग्यान री दीठ सूं हदभांत ई उपयोगी है—
1. श्रृंगार हार (हम्मीर/रणथम्भौर), 2. संगीतराज (कुम्भा/मेवाड़) 3. रागमंजरी 4. रागमाला (पुण्डरीक विट्ठल/जयपुर) 5. हस्तकार-रत्नावली (जयपुर), 6. स्वर-सागर (उस्ताद चांदखां/जयपुर), 7. अनूपविलास 8. अनूप संगीत रत्नाकर, 9. अनूपांकुश, 10 अनूप राग-सागर 11 अनूप संगीत वर्तमान 12. अनूपोद्देश 13 अनूप रागमाला 14. गमक मंजरी-टीका, 15 कुतुपाध्याय, 16 भाव मंजरी, 17 नाष्टोदिष्ट प्रबोधक ध्रुपद टीका 18 राग विवेक, 19. मुरली-प्रकाश (पं. भाव भट्ट/बीकानेर) 20. राग चंद्रिका (द्वारकानाथ भट्ट/जयपुर), 21 संगीतसार (जयपुर) 22. राधागोविन्द संगीत-सार (जयपुर) 23 राग-रत्नाकर (राधाकृष्ण/उणियारा), 14 राग-कल्पद्रुप (कृष्णानंद व्याम/मेवाड़) इत्याद।
रागमाळा-ग्रंथ : अमूर्त रागां नै मूर्त आकार देवण सारू जिका छंद, पद या गीत लिखीज्या, उणां नै रागमाळा कैयीज्यौ है। दरअसल रागमाळा रै त्हैत रागां रै गायन-वादन सूं उपज्यै भावां नै कवियां सबदां में बाधा करै अर चित्रकारां उणां नै मूर्त आकार दिया करै। आं ग्रंथां में संगीत अर काव्य दोनां रौ ई आणंद प्राप्त हुवै। रागमाळा ग्रंथ दो तरै रा हुवै— 1. फगत पद्यबद रागमाळावां। सचित्र रागमाळावां में संगीत, काव्य अर चित्रकला तीनां रौ ई गजब रौ सामंजस्या हुवै। ‘रागमाळा’ ग्रंथ राजस्थान री अेक जबरदस्त खासियत रैयी है।
मांड गायकी : ‘रीझै सिन्धू राग’ मुजब राजस्थान रौ प्रिय राग तौ ‘सिंधु राग’ ई रैयौ है। अठै रा शूरवीर जोद्धा रण सारू प्रयाण करतां संगीत री वीर रसात्मक ध्वनियां सूं प्रेरित हुया करता हा। जुद्ध सरू हुवण सूं पैली तारवाद्यां री झणकार अर संख—नगाड़ां री गरजणा सूं आभौ गूंजण लाग्या करतौ हौ जिणसूं उछाव में भर’र रणबंका राजपूत आपरै प्राणां रौ मोह त्याग जूझ पड़्या कता हा। पण ‘सिंधु राग’ रै साथै ई ‘मांड राग’ ई राजस्थान में घणौ लोकप्रिय रैयौ है। मांड रै माधुर्य राजा-महाराजावां री मैफलां सदीव रंगीन रैया करती ही। ‘मांड-राग’ आज ई लोक धुन रै रूप में चौफेर चावी है। इणरा न्यारा-न्यारा छेत्रीय स्वरूप ई चावा है, ज्यूं—उदयपुर री मांड, जोधपुर री मांड, जैसलमेर री मांड, जयपुर री मांड, इत्याद। इणां में केई सुंदर बंदिशां आज ई उपलब्ध है जिकी राजस्थान रै संगीत रौ खासपण दरसावै।
लोक संगीत
लोक संगीत रौ मूळ आधार लोग गीत ई है, जिका न्यारै-न्यारै मौकां माथै अमूमन सामूहिक रूप सूं गाईजै। लोक वाद्यां री संगत इणां रै माधुर्य में बधापौ करै। कथावस्तु या घटनावां वाळा लंबा गीत लोक गाथा बाजै। लोक गाथावां तौ लोक वाद्यां री मारफत ई प्रस्तुत करीजै। राजस्थान रै रैवासियां रै सांस्कृतिक अर सामाजिक जीवण रा न्यारा-न्यारा पगस लोक गीतां में उजागर हुया है। स्वर, ताळ अर लय में बद्ध लोक संगीत री धुनां मिलण अर विरह, भगती अर बैराग, वीरता अर कायरता, घ्रिणा अर मजबूरी, रीस अर भै इत्याद सूक्ष्म मनोभावां रै खास सौंदर्य री वजै सूं किणी ई संवेदनशीळ सगस नै मोहित कर्यां बिना नीं रैवै। राजस्थान रै लोक संगीत री धारा शताब्दियां सूं तीन रूपां में बैवती रैयी है:
1. जन साधारण रा गीत : आं गीतां रै त्हैत न्यारै-न्यारै मौका माथै गाईजण वाळा जन साधारण रा गीत गावै। अै गीत हर जुग में नवी-नवी सामग्री नै आत्मसात् करता थका परिस्थितियां रै पाण नवी धुनां अर नवै स्वरां में ढळता जावै।
2. व्यावसायिक जातियां रा गीत : सामंतशाही रै प्रभाव सूं विकस्योड़ा वै गीत, जिका केई जातियां व्यावसायिक रूप में अपणाय लिया। अै जातियां आप आपरै आश्रयदाता री प्रशस्तियां गावती रैयी अर बगत बीत्यां वै ई लोक गीतां या लोक गाथावां रै रूप में लोक संगीत रा अंग बणग्या। आं जातियां में ढोली, मिरासी, लंगा, ढाढी, कलावंत, भाट, राव, जोगी, कामड़, वैरागी, गंधर्व, भोपा, भवाई, राणा, काळबेलिया, कथिक इत्याद आवै। आं रै गीता में मांड, देस, सोरठ, मारू, परज, कालिंगड़ा, जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू, खमाज इत्याद रागां री छींया साफ झळकै। वियां राजस्थान री मांड गायकी घणी चावी है। इणरी विलंबित, ठंडी अर मीठी स्वर ल्हैरी सुणणियां रै सामी राजस्थान री प्राकृतिक छिब रौ मोवणौ चित्र साकार करती लखावै। बीकानेर री अल्लाहजिलाई बाई अर जोधपुर री स्व. गवरी देवी रौ मांड गायकी में सिरै योगदान रैयौ।
3. छेत्रीय रंग प्रधान गीत : राजस्थान मांय प्राकृतिक दीठ सूं मरुस्थळ तौ है ई, परबती छेत्र ई है अर समतळ मैदान ई। सो संगीत री धुनां रै निरमाण में अठै रा लोक गीत भौगोलिक खासियतां रै आधार माथै ई बांट्या जा सकै—1. मरु छेत्रां रा लोक गीत। मरु छेत्र रै त्हैत जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर इत्याद छेत्रां रा,परबती छेत्रां रै त्हैत उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ, सिरोही, आबू इत्याद छेत्रां रा अर मैदानी छेत्रां रै त्हैत जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर, करौली धौलपुर इत्याद छेत्रां रा लोक गीत आवै।
लोक वाद्य
लोक वाद्य, लोक संगीत रा महत्वपूरण अंग हुया करै। इणां रै प्रयोग सूं लोक गीतां री मिठास में बधापै रै साथै-साथै वातावरण त्यार करण अर अभिव्यक्ति नै प्रभावशाळी बणावण सारू हुवै। राजस्थान रा खास-खास लोक वाद्य इण भांत :-
1. तत् वाद्य : सारंगी, जंतर, रावणहत्थौ, रवाज, तंदूरौ (इणनै चौतारौ अर निसाण ई कैवै), इकतारौ, अपंग कमायचौ इत्याद।
2. सुषिर वाद्य : बंसरी, अळगोजौ, पूंगी, शहनाई, सतारौ, मसक, नड़, मोरचंग इत्याद। इणां रै अलावा टोटौ, बांकियौ या बरगू, संख, भूंगळ, सिंगी इत्याद। मटकी, डफड़ौ, डफ, चंगड़ी, डमरू, ढीबकौ, तासौ इत्याद ई अवनद्ध वाद्य ई है।
4. धन वाद्य : मंजीरौ, झांक, थाळी, खड़ताळ इत्याद। राजस्थान री लोक धुनां आज आपरी मिठास रै पाण संपूरण देस में लोकप्रिय हुय चुकी है।
राजस्थानी निरत
शास्त्रीय निरत री परंपरा रै त्हैत भारत में कथक, भरतनाट्यम् कथकलि, मणिपुरी, मोहिनी अट्टम्, कुचिपुड़ी, ओडिसी, छऊ इत्याद आवै। ‘कथक’ निरत रै संदरभ में अबै औ सिद्ध हुय चुक्यौ है क इण निरत-शैली रौ प्रवर्तन राजस्थान में ई हुयौ।
‘कथक’ शबद रौ अरथ हुवै— कथा कैवण वाळौ। कथावाचकां री परंपरा प्राचीन काळ सूं ई चाली आ रैयी है। अै लोग खास तौर सूं मिंदरां में पौराणिक कथावां आख्यानां रै रूप में प्रस्तुत करता रैया। आगै चाल’र इण परंपरा नै औरूं बेसी प्रभावशाळी बणावण सारू इणमें संगीत, निरत अर अभिनय ई सामल करीज्यौ। काळांतर में कथावाचक ‘कथक’ रै नांव सूं बतळाईजण लाग्या। लंबै बगत तांई कथक मिंदरां सूं जीविका प्राप्त कर’र आपरी कला रौ प्रदरसण करता रैया। मुगल काळ में बादसावां अर नबाबां रै आसरै में आ निरत-शैली पूरण रूप सूं विकसी, पण इणरौ प्राचीन धारमिक स्वरूप अेकदम गायब हुयग्यौ। इण भांत कथक निरत-शैली रौ विकास राजस्थान रै साथै-साथै मुगल दरबारां में ई हुयौ, पण राजस्थान में इण शैली रौ परंपराऊ धारमिक रूप में विकास हुयौ अर मुगल दरबारां में आ शैली सिणगारू रूप धारण कर लियौ।
इण शास्त्रीय निरत—शैली में आप-आपरै खास बोलां, निकासां, तोड़ां, टुकड़ां, भाव पगसां, लयकारियां अर पदाघातां इत्याद रै आधार माथै आगै चाल’र न्यारै-न्यारै घराणा रा निरमाण हुया, जियां—‘जयपुर घराणौ’, ‘लखनऊ घराणौ’, ‘बनारस या जानकीदास घराणौ’, ‘सुखदेवप्रसाद घराणौ’ अर ‘रायगढ घराणौ’। आं घराणां रै संदरभ में विद्वानां री अैड़ी मान्यता है क कथक निरत री ‘हिंदू शैली’ रौ प्रतिनिधित्व ‘जयपुर घराणौ’ ई करै अर इणी घराणै रा कलाकारां ई संपूरण भारत में इण शैली रौ प्रचार कर्यौ है। सो ‘जयपुर घराणौ’ कथक निरत-शैली रौ आदू घराणौ मान्यौ जावै। औ किणी अेक ई वंस परंपरा में नीं फूल-फळ’र पूरै राजस्थान में फैल्योड़ै कथकां रै अणगिणत परिवारां रौ प्रतिनिधित्व करै।
जयपुर घराणै रा चावा निरत-आचार्य पं. गौरीशंकरजी मुजब राजस्थान में पैली ‘सांवलदास’ रौ घराणौ चावौ हौ। कथक निरतकार इणी घराणै सूं संबंध राखता। इणी घराणै रा कलाकारां राजस्थान री न्यारी-न्यारी रियासतां रै अलावा भारत रै अनेक प्रांतां में पूग्या, उठै कीरत हासल करी, अनेक शिष्य बणाया अर आप-आपरै नां सूं न्यारा-न्यारा घराणा चलावण लाग्या।
लोक निरत
उमंग में भर’र सामूहिक रूप सूं करीजण वाळा निरत किणी नियम सूं बंध्योड़ा नीं हुवै। नीं तौ इणां में मुद्रावां तै हुवै अर नीं ई अंगां री निस्चित परिचालना ई रैवै। सरल अंतस मानखै रौ जिकौ उछाव तर-तर बढती लय रै साथै लगौलग तेज गति सूं अंगां रै संचालन री मारफत प्रगट हुवै, उणरी छिब-छटा देखणजोग हुवै। इण भांत रै निरतां नै आज ‘लोक निरत’ कैवै। जठै शास्त्रीय निरत में व्याकरण रै माध्यम सूं कलाकार आणंद री अनुभूति करै, उठै लोक कलाकार आणंद री अनुभूति सूं निरत सरू करै अर उणरी अभिव्यक्ति रौ व्याकरण खुद बण जावै।
लोक निरत माथै ई भौगोलिक स्थितियां, सामाजिक बंधनां इत्याद रौ प्रभाव पड़ै ई। सो राजस्थान रै लोक निरतां नै तीन हिस्सां में बांट्यौ जावै—1. छेत्रीय लोक निरत, 2. जातीय लोक निरत, अर 3. व्यावसायिक लोक निरत।
1. छेत्रीय लोक निरत : न्यारै-न्यारै छेत्रां में विकस्योड़ा निरत उण-उण छेत्रां री पिछाण बणग्या है। छेत्रीय लोक निरतां में अै नांव घणा चावा है—‘गींदड़ निरत’ (सेखावाटी), ‘चंगनिरत’ (सेखावाटी), ‘गेर निरत’ (मारवाड़-मेवाड), ‘इंडिया निरत’ (मारवाड़), ‘ढोल निरत’ (जाळौर), ‘अगनी निरत’ (बीकानेर), ‘बम निरत’ (अलवर-भरतपुर), ‘घूमर’ (पूरौ राजस्थान) इत्याद।
2. जातीय लोक निरत : इण रै त्हैत वनवासियां, घुमंतू जातियां अर दूजी-दूजी जातियां रा लोक निरत आवै। वनवासियां रै त्हैत भीलां, सहरियां, गरासियां इत्याद रा लोक निरत आवै। घूमंतू जातियां रै त्हैत कंजरां, सांसियां, काळबेलियां, गाडियै लवारां अर बिणजारां रा लोक निरत आवै। अर दूजी-दूजी जातियां रै त्हैत गूजरां, मीणां इत्याद रा निरत आवै। गूजरां रौ ‘चरी निरत’ चावौ है।
3. व्यावसायिक लोक निरत : जद लोक कला रौ प्रदरसण जीविका रौ साधन बण जावै तद वा कला व्यावसायिक बाजण लागै। व्यावसायिक लोक निरतां रै त्हैत ‘भवाई निरत’, ‘तेराताळी निरत’, ‘कच्छीघोड़ी निरत’ इत्याद आवै।
राजस्थानी नाट्यकला
रंगीलै राजस्थान री संस्कृति प्राचीन तो है ई, साथै ई जीवंत ई है। राजस्थान में प्रदर्श्य कलावां अर लोकनाट्यां री अेक सिमरिध परंपरा रैयी है। रंगमंच री परंपरा ई लोक-वारतावां अर लोक-गाथावां री दाई प्राचीन है। सरू-सरू में प्रदर्श्य कलावां अर लोकनाट्य राज-दरबारां री सींवां में कैद रैया, जिण वजै सूं अै प्रजा नै देखण नै नीं मिलता हा। पण, धीरै-धीरै अै कलावां अर अै नाट्य राज-दरबारां री सींवां तोड़’र नगर-नगर अर गांव-गांव पूग्या, ने प्रजा रै मनोरंजन रौ अेक अभिन्न अंग बणग्या। मनोरंजन रै साथै-साथै अै उणां री सामाजिक अर सामुदायिक भावनावां री अभिव्यक्ति रा माध्यम ई बण्या।
प्रदर्श्य कलावां रै त्हैत केई कलावां आवै, जिणां रौ प्रदरसण भोपा, भांड, स्वांग, बहरूपिया, मदारी, नट, बाजीगर इत्याद कता रैया है।
लोकनाट्यां रै त्हैत ख्याल, रम्मत, तमासौ, नौटंकी, लीला, भवाई, गवरी, फड़ इत्याद आवै। राजस्थान रा लोकनाट्य छेत्रवार तीन हिस्सां में बांट्या जा सकै, जिणसूं क उणां रै न्यारैपण नै भलीभांत समझ्यौ जा सकै—
1. परबती छेत्रां रा लोकनाट्य, 2. रेगिस्तानी छेत्रां रा लोकनाट्य 3. पूरबी छेत्रां रा लोकनाट्य।
1. परबती छेत्रां रा लोकनाट्य : राजस्थान रै परबती छेत्रां में भील, मीणां, बिणजारां, सहरियां, गिरासियां इत्याद री रंगरंगीली संस्कृति पनपी अर पसरी। आं रौ सैज-सुभाविक प्रकृति सूं जुड़ाव अर प्राकृतिक देवी-देवतावां में अटूट विसवास इणां री जीवंतता रौ कारण है। आं री ई जीवंतता परब-उच्छबां अर मेळां-खेळां रै मौकां माथै सामुदायिक भावना रै रूप में उजागर हुवै; अर नाच, गाणां अर नाट्यां री मारफत अभिव्यक्त हुवै।
2. रेगिस्तानी छेत्रां रा लोकनाट्य : रेगिस्तानी छेत्रां में जनसंख्या बौत कम है; लोगां नै आपरौ गुजारौ करण सारू करड़ी मैनत करणी पड़ै। फेरूं ई मनोरंजन तो मिनख-जीवण री खास जरूरत हुवै ई, सो आं छेत्रां में भाट भांड, नट, मिरासी, सरगड़ा इत्याद मनोरंजन रौ काम करै। अै लोग प्रदर्श्य कलावां अर लोकनाट्यां नै जमानै री जरूरत मुजब नवै-नवै रूपां में ढाळ’र प्रस्तुत करण में चतुर हुवै।
3. पूरबी छेत्रां रा लोकनाट्य : राजस्थान रै पूरबी छेत्रां, खास तौर सूं सेखावाटी, लोकनाट्य ख्याल री परंपराऊ शैली रै वास्तै घणौ चावौ है। ख्याल लोकनाट्यां री सै सूं लोकचावती विधा है। ख्याल रै अलावा कठपूतळी, कामड़, कच्छी घोड़ी अर लोकनाट्यां नै प्रदर्श्य कलावां रै दूजै-दूजै रूपां री प्रस्तुति भांट, भोपा, नरतक इत्याद करता रैवै। पेशेवर जातियां अर नाट्य मंडळियां लोकनाट्यां रौ लगौलग विकास करती थकी आज ई आपरौ प्रभाव कायम कर्योड़ी है। हां, अलवर अर भरतपुर छेत्रां रै लोकनाट्यां में राजस्थान, हरियाणै अर उत्तरप्रदेश री लोक संस्कृतियां रौ मिल्यौ-जुल्यौ रूप ई देखण नै मिलै।
राजस्थान री सींव माथै आयै छेत्रां...जियां क धौलपुर, सवाई माधोपुर, डीग इत्याद उत्तरप्रदेश सूं जुड़्या हुवण री वजै सूं उठै री संस्कृति सूं अछूता नीं रै सक्या, सो रासलीला, रामलीला, रसिया, ख्याल, नौटंकी इत्याद लोकनाट्यां माथै ब्रजभूमि री संस्कृति रौ प्रभाव साफ-साफ झळकै।
राजस्थान रै लोकनाट्यां रा नीचै दिरीज्या रूप घणा चावा रैया, जिका क मनोरंजन री दीठ सूं पैदा हुया अर अठै रे जन-जीवण में आपरा स्थान बणाया—
ख्याल : 18वीं सदी री सरूआत सूं ई राजस्थान में लोकनाट्यां रै बरौबर मंचित हुवण रा प्रमाण मिलै। भौगोलिक परिस्थितियां रै कारण न्यारै-न्यारै छेत्रां में ख्यालां रा न्यारा-न्यारा रूप मिलै, जिणां में खास-खास इण भांत—कुचामणी, सेखावाटी, जयपुरी, अलीबख्शी, तुर्ता-कलंगी, किसनगढी, मांची, हाथरसी इत्याद। आं में सूं कीं ख्यालां री विगत इण भांत—
कुचामणी ख्याल : चावा लोक नाट्यकार लच्छीराम परंपराऊ ख्याल ने आपरी निजू शैली सूं अेक नवौ मोड़ दे’र कुचामणी ख्याल री सरूआत करी। अै कोई 10 ख्यालां री रचना करी, जिणां में ‘चांद-नीलगिरी,’ ‘राव-रिड़मल’ ‘मीरां-मंगळ’ इत्याद खास है। आं री खुद री ख्याल मंडळी ही। आं दिनां इण ख्याल शैली रा खास खिलाड़ी है उगमराज।
सेखावाटी ख्याल : चिड़ावै रा नानूराम इण शैली रा चावा लोक नाट्यकार हा। अै ई ‘हीर—रांझा’, ‘हरीचंद’, ‘भरथरी’, ‘जयदेव’ इत्याद केई ख्यालां री रचना करी। आं रै चेलां में दूलियै राणै रौ नांव चावौ हौ, जिका क 80 बरस री उमर तांई ख्याल खेलता रैया। दूलियै राणै रै सुरगवास रै बाद इणां रौ बेटौ सोहनलाल अर प्रोतौ बंसी बनारसी आज ई साल में आठ महीनां रौ अखाड़ौ लगावै।
जयपुरी ख्याल : यूं तौ सगळै ई तरै रै ख्यालां री प्रकृति मिलती-जुलती ई है, पण फेरूं ई जयपुरी ख्याल री आपरी कीं न्यारी खसियतां ई है। सै सूं बड़ी खासियत है स्त्री-पात्रां री भूमिकावां में स्त्रियां रौ ई हिस्सौ लेवणौ। इणरै अलावा आ शैली मुक्त अर लचीली है, रूढ़ नीं; जिणसूं इणमें नवै-नवै प्रयोगां री घणी संभावनावां है। ‘जोगी-जोगण’, ‘कान-गूजरी’, ‘मियां-बीबू’, ‘पठान’, ‘रसीली तंबोळन’ इत्याद चावा जयपुरी ख्याल है। आं ख्यालां में गुणिजनखानै रा कलाकार ई हिस्सा लेवता रैया है।
तुर्रा-कलंगी ख्याल : मेवाड़ रा शाह अली अर तुकनगीर नांव रा दो मुसळमान पीरां कोई चार सौ बरसां पैली तुर्रा-कलंगी ख्याल री रचना करी अर उणनै ओ नांव दियौ। ‘तुर्रा’ नै ‘शिव’ अर ‘कलंगी’ नै पार्वती रौ प्रतीक मान्यौ जावै। तुकनगीर ‘तुर्रा’ रा पखधर हा अर शाह अली ‘कलंगी’ रा। आं दोनूं खिलाड़ियां ‘तुर्रा-कलंगी’ रै माध्यम सूं ‘शिव’ अर ’शक्ति’ रै विचारां नै लोक जीवण तांई पुगाया। आं री प्रस्तुति ‘दंगळ’ रै नांव सूं जाणीजै। ‘तुर्ता-कलंगी’ संबंधी सै सूं पैली खेलीज्यै ख्याल रौ नांव दरअसल ‘तुर्रा-कलंगी’ हौ।
‘तुर्रा-कलंगी ख्याल’ घणा चावा हुया अर अमूमन पूरै ई राजस्थान में खेलीजता रैया। इणरा खास केन्द्र है घोसूंडा, चित्तौड़, निंबाहेड़ा इत्याद। अै स्थान तुर्रा-कलंगी रा सिरै कलाकार दिया, जियां क चेतराम, हमीद बेग, जयदयाळ, ताराचंद, ठाकुर ओंकारसिंह इत्याद। आं में सोनी जयदयाळ अणूंता ई चावा अर प्रतिभाशाळी खिलाड़ी हा।
रम्मत : कुचामण, चिड़ावै अर सेखावाटी रै ख्यालां सूं न्यारी रम्मतां रौ आपरौ न्यारौ ई रंग है। कोई सौ- अेक बरसां पैली बीकानेर में होळी अर सावण इत्याद रै मौकां हुवण वाळी लोककाव्य प्रतियोगितावां सूं ई इणरौ उद्भव हुयौ। कीं लोक कवियां राजस्थान रै जगचावै लोक-नायकां अर महापुरुषां माथै काव्य-रचनावां करी। आं रचनावां नै रंगमंच माथै प्रस्तुत कर्यौ गयौ। आं रम्मतां री रचनावां करण वाळां रा नांव इण भांत-मनीराम व्यास, तुळसीराम, फागू महाराज, सूआ महाराज, तेज कवि (जैसलमेरी) इत्याद। साहित्यिकता रम्मत री खास विशषता है। रम्मत रा घणकरा तत्व सेखावाटी ख्यालां सूं मेळा खावै। रम्मत रै कीं चावै खिलाड़ियां रा नांव इण भांत—रामगोपाळ मेहता, सांई सेवग, सूरज, कानौ सेवग, जीतमल, गींडौजी इत्याद।
बीकानेर रै अलावा रम्मतां पोकरण फळौदी, जैसलमेर अर आखती-पाखती रै इलाकां में ई खेलीजती रैयी है। अणूंती ई चावी कीं रम्मतां रा नांव इण तरै है—‘रम्मत पूरण भगत की’, ‘रम्मत मोरध्वज की’, ‘रम्मत डूंगजी—जवाहरजी की’, ‘रम्मत राजा हरिश्चंद्र की’, ‘रम्मत गोपीचंद-भरथरी’ की इत्याद।
तमासौ : तमासै री स्यानदार परंपरा कोई ढाई सौ साल पुराणी है। आ परंपरा जयपुर में 19वीं सदी रै पूर्व—मध्यकाळ में महाराजा प्रतापसिंह रै बगत में सरू हुई ही। इणमें ‘जयपुरी ख्याल’ अर ‘ध्रुवपद गायकी’ रौ समावेश कर्योड़ौ है। इणरी सरूआत भट्ट परिवार करी, जिणरा मुखिया पं. बंशीधर भट्ट हा। इण परिवार में उस्ताद-परंपरा फूलजी भट्ट सूं ह ई ही। आजकल गोपीकृष्ण भट्ट, जिका क’गोपीजी’ रै नांव सूं जाणीजै, इण परंपरा रा उस्ताद है। ‘गोपीचंद’, ‘हीर-रांझा’ इत्याद तमासा खास तौर सूं खेलीजता रैया है।
गवरी : अरावळी छेत्र मेवाड़ में रैवण वाळै भीलां रौ सामुदायिक गीतिनाट्य री दीठ सूं अेक हदभांत ई सिमरिध नाट्य शैली है। अै भील आयै बरस चाळीस दिनां रौ ‘गवरी’ उच्छब उदयपुर रै आखती-पाखती रै इैलाकां में आ’र आयोजित करै। ओ उच्छब मानसून री समाप्ति रै मौकै कर्यौ जावै। जुलाई-अगस्त रै महीनां में ‘बूढ़िया देन’ री पूजा रै मौकै भील आप-आप रा घर छोड’र सामुदायिक उच्छब रै विचारां सूं बंध’र ‘गवरी’ में हिस्सौ लेवण नै आवै अर चाळीस दिनां तांई उठै रैवै। रोजीना सुबै सूं सिंझ्या तांई चालतौ रैवै। इणमें हिस्सौ लेवणिया सगळा ई उमंग अर उछाव सूं भर्या हुवै। ‘गवरी’ रा कीं खास-खास प्रसंग इण भांत—देवी अंबड़, बादसा री सवारी, भिन्यावड़, बणजारौ, खाडलियौ भूत, सिंघ—सूअर री लड़ाई इत्याद। अै सगळा ई प्रसंग प्रतीकात्मक अरथ राखै। ‘गवरी’ री कथा में कथानक या सहकथानक क्रमबद्ध नीं हुवै, पण फेरूं ई मूळ गाथा सूं इणरौ संबंध हुवै अर उण रै साथै तादात्म्य दिखावणौ ई इणां रौ लक्ष्य हुवै। अै बिखर्योड़ा कथानक जुद्ध, हार, मिरतू अर आखिर में जीवातमा रै पाछी जी उठण सूं संबद्ध हुवै। औ पाछौ जीवणौ देवी री ई किरपा सूं हुवतौ दिखायौ जावै।
‘गवरी’ में प्रयोग करीजण री घणी संभावनावां है। इणरौ संगीतात्मक रूप प्रयोग रै अनुकूळ है। ‘गवरी’ रै नवै रूपांतरण री दीठ सूं नेशनल ‘स्कूल ऑफ ड्रामा’ सूं ‘ग्रेजुअेट’ हुयोड़ा भानु भारती रै ‘पशु गायत्री’ रौ आपरौ निजू महत्व है।
नौटंकी : भरतपुर, धौलपुर, करौली, अलवर, गंगापुर, सवाई माधोपुर इत्याद छेत्रां में मेळां-खेळां, परब-उच्छबां अर ब्याव-शादियां रै मौकां माथै ‘नौटंकी’ रौ खेल घणौ चावौ है। भरतपुर अर धौलपुर में नत्थाराम री मंडळी नौटंकी रा खेल दिखावती रैयी है। इणरै अलावा दूजा ई केई अखाड़ा है जिका आं छेत्रां में खेल दिखावै। अै अखाड़ा आप-आपरी कंपनियां रै नांवां सूं जाणीजै। नौटंकी-नाटकां में ‘रूपबसंत’, ‘सत्य हरिश्चद्र’, राजा भरथरी इत्याद खास है।
भवाई : गुजरात री सींव सूं लागतै राजस्थान रै छेत्रां में ‘भवाई’ नांव री निरत-नाटिका घणी चावी है। इण निरत-नाटिका रा अनेक तकनीकी पगस है। इण शैली माथै आधारित अेक नाटिका ‘जस्मा ओडण’ है जिकी भारत सूं बारै ई, इंग्लैंड अर अमेरिका में खेलीजी। शांता गांधी रै लिख्योड़ी इण नाटिका में ‘सगौजी’ अर ‘सगीजी’ रै रूप में भोपा-भोपी कीं दूजै हास्य चरित्रां रै साथै इण नाटिका नै प्रस्तुत करै संचालन सूत्रधार रै हाथां में रैवै।
फड़ : फड़ री प्रस्तुति भोपा करिया करै। फड़ कपड़ै री हुया करै अर अमूमन 30 फुट लंबी अर 5 फुट चवड़ी हुया करै। इणमें वीर लोक नायक रौ जीवण-चरित्र लोक शैली रै चित्रां में कोर्योड़ौ हुवै। भोपा लोग इणनै समेट’र खाथा-खाथा अेक जगै सूं दूजी जगै जा सकै। फड़ देखणियां रै सामी ताण’र ऊभी कर दी जावै। भोपी लालटेण ले’र फड़ कनै नाचती-गावती पूगै अर जिण-जिण चित्र सूं संबंधित अंश गावै, डंडी सूं उण-उण नै बतावती रैवै। भोपौ खुद ई रावणहत्थौ या जंतर बजावतौ थकौ नाचतौ-गावतौ रैवै। फड़ सूं संबंधित दो चावी चित्र-गाथावां पाबूजी राठौड़ अर देवजी सोलंकी री फड़ां ई है। पाबूजी री तरै देवजी ई वीर नायक हा। पाबूजी री फड़ री गीत पाबूजी रा भोपा रावणहत्थै माथै गावै अर देवजी रा फड़ रा गीत देवजी रा भोपा, जिका क गूजर जाति रा हुवै, जंतर माथै गावै। इण भांत फड़ रै रूप में लोकनाट्य री अेक न्यारी ई शैली विकसी। लोक में फड़ देखणौ शुभ मानीजै, अशुभ रै निवारण सारू ई फड़ देखीजै।
स्वांग : ‘स्वांग’ ई लोकनाट्य रौ ई अेक रूप है। इणरै त्हैत किणी खास पौराणिक, इतियासिक या चावै लोक चरित्र, या पछै देवी-देवता री नकल कर’र उण रै दाई ई अभिनय करीजै। आ लोकनाट्य री अेक अैड़ी विधा है जिणनै अेक ई चरित्र सम्पन्न करै। कीं जनजातियां रा लोग तो स्वांग करण नै आपरौ धंधौ ई बणाय लियौ हौ। पण आजकाल औ नाट्य रूप बिलकुल ई कम हुयग्यौ।
लीला : लीला री कथा पुराणां या पुरा आख्यानां सूं ली जावै अर इणां में धरम अर लोकाचार री ई प्रधानता हुवै। आज रै जमानै में औ लोकनाट्य करण वाळा दळ अर मंडळियां बौत ई कम रैयग्या है। जिका बच्या-खुच्या दळ अर मंडळियां है, वै या तो ‘रामलीलावां’ करै, या ‘रासलीलावां’।
रासधारी : ‘रासधारी’ रौ सीधौ—सादौ अरथ है वो सगस जिकौ रासलीला करै। सरू-सरू में अैं लीलावां भगवान कृष्ण रै जीवण-चरित्र माथै आधारित हुवती ही पण धीरै-धीरै इण लोकनाट्य में अनेक दूजी कथावां ई जुड़गी। सै सूं पैलौ रासधारी नाटक आज सूं लगै-टगै 80 बरसां पैली मेवाड़ रौ मोतीलाल जाट लिख्यौ। रासधारियां री लोकनाट्य शैली ‘ख्याल’ अर दूजै लोकनाट्यां सूं बिलकुल ई न्यारी है। इण रौ फैलाव पूरै मेवाड़ इलाकै में रैयौ है। इणरा रसिया खास तौर सूं बैरागी साधु लोग रैया, पण धीरै-धीरै औ लोकनाट्य कीं खास लोगां आपरौ धंधौ बणा लियौ। रासधारी नाटकां री खास-खास कथावां राम हरिश्चंद्र, मोरध्वज, नागजी सूं संबंधित है। इण लोकनाट्य रै वास्तै किणी ई भांत रै अखाड़ै या मंच री जरूरत नीं हुवै। औ कठैई ई खुलै स्थान में कर्यौ जा सकै।
पारसी थियेटर : बीसवीं सदी री सरूआत में आपां रै देस में अेक नवी ई किसम री रंगमंचीय कला रौ विकास हुयौ, जिणरौ नांव हौ ‘पारसी थियेटर’। नाटक रै छेत्र में ‘पारसी थियेटर शैली’ तीसरै दशक में राजस्थान रै रंगकर्मियां माथै ई जबदरस्त प्रभाव गेर्यौ ; अर अलवर में महबूब हसन नांव रौ अेक सगस पारसी थियेटर शैली रा अनेक नाटक मंचित कर्या, जिणां में खास तौर सूं आगा हश्र कश्मीरी रै लिख्योड़ा नाटक हा।
राजस्थान में माणकलाल डांगी अर कन्हैयालाल पंवार पारसी थियेटर रा घणा चावा रंगकर्मी रैया। कन्हैयालाल पंवार तौ आपरी खुद री अेक कंपनी कलकत्तै में थरपी ही, जिणरौ नांव ‘पंवार थियेटर’ हौ। गणपतलाल डांगी जिका क माणकलाल डांगी रा संबंधी है, वै ई आज तांई इण परंपरा रौ निभाव कर रैया है।
आजादी रै बाद पारसी थियेटर शैली नै नवी शैली रै अनुरूप बदळण रा जतन ई करीज्या। जतन करण वाळां में अेक खास नांव है अे. प्र. सक्सेना।
राजस्थानी स्थापत्य
गणेश्वर, काळीबंगा, आहड़, नोह इत्याद संस्कृतियां सूं साफ पतौ पड़ै क हड़प्पा, मोहें-जो-दड़ौ, अर सिंधु घाटी सभ्यता री तरै अठै ई मानखौ नदियां रै किनारै नगर-विन्यास अर भवन-निरमाण करण लाग्यौ हौ। महाभारत-काळ में विराट नगर (बैराठ), मत्स्यपुरी (माचेड़ी), पुष्कर इत्याद नगरां रौ वरणन मिलै। मौर्यकाळ में बेड़च रै किनारै माध्यमिका (आजकाल ‘नगरी’) रै भव्य नगर-विन्यास रौ वरणन ई केई ग्रंथां में आवै। गुप्त अर गुप्तोत्तर काळ में मेनाल, अमझेरा, डबोक अर भरतपुर रै आखती-पाखती रै छेत्रां रै नगरीय वैभव रा उल्लेख ई मिलै।
राजपूत संस्कृति रै अभ्युदय रै बाद, राजपूत काळ में जठै-जठै राजधानियां बणी, उठै-उठै नगर-विन्यास री भूमिका महत्वपूरण रैयी। भीनमाळ, चित्तौड़, मंडोर, ओसियां, रणथंभौर, झालरापाटण, व्याघ्रराज (राजगढ), राजौरगढ़, आमेर जैड़ा नगरीय ‘काम्पलेक्स’ विकस्या। आगै चाल’र तौ देसी राजावां आप-आप री राजधानियां सारू जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर, बूंदी, कोटा, जयपुर जैड़ै नगरां री थापना करी अर आप-आपरै नगर री कल्पना नै साकार रूप दियौ। आं में सवाई जयसिंह री कल्पना जिकी जयपुर रै रूप में साकार हुई, वा राजस्थान रै नगर नियोजन नै प्रभावित कर्यौ।
दुरग : राजस्थान तौ गढ-किलां रौ घर है। दुरग-निरमाण में राजस्थान री स्थापत्य-कला रौ चरम उत्कर्ष देख्यौ जा सकै। छेत्रफळ रै अनुपात में राजस्थान मांय सै सूं बत्ता गढ-किला है। प्राचीन ग्रंथां में दुरगां री जिकी प्रमुख विशेषतावां बताईजी है, वै अठै रै गढ-किलां में साकार हुई। यूं तौ परबत माथै थरपीजण वाळौ किलौ अर थळ माथै थरपीजण वाळौ गढ बाज्या करतौ, पण बाद में आवतां किलौ अर गढ अेक-मेक हुयग्या। राजस्थान रै गिरि—दुरगां में चित्तौड़, कुंभळगढ़, रणथंभौर, सिवाणा, जाळौर, तारागढ, जोधपुर (मेहरानगढ़), आमेर-जयपुर (राजगढ़), दौसा अर कुचामण रा किला सिरै मानीजै। जळ-दुरगां में झालावाड़ रै कनै आई आहू अर काळीसिंध नदियां रै संगम माथै आयौ गागरोण रौ दुरग उल्लेखजोग है। थळ-दुरगां में पीळै पत्थरां रौ जैसलमेर रौ किलौ अेक विसाळ अर मजबूत किलौ है। इणां रै अलावा बीकानेर (जूनागढ़), नागौर, चौमू (चौमुहागढ़/धाराधारगढ़), माधोराजपुरा गढ़ इत्याद थळ-दुरग ई महत्वपूरण है।
राजम्हैल : राजस्थान रै राजम्हैलां रौ लेखौ लेवण नै बैठां तौ पांवडै-पांवडै माथै अेक न अेक म्हैल निंगै आ ई जावै। इणां री सजावट-जड़ावट सैलानियां री फूटरापौ भावणकी आंख्यां नै झपकौ ई कोनी खावण देवै, इचरज सूं फाट्योड़ी इज राख देवै। फर्ग्युसन सरीसौ कला-पारखी कदैई डीग रा म्हैलां नै देख डाफी चढ़ियौ, कदैई सामोद रै म्हैलां नै देख थुथका न्हाकियौ अर कदैई जयपुर रै हवाम्हैल ने बूंदी रै म्हैलां नै निरखतां अड्डा चित्त हुयौ। कर्नल टॉड तौ राजस्थान रै सगळै ई रजवाड़ां रै म्हैलां में बूंदी रै म्हैलां नै सिरै बतायौ है।
राजम्हैलां रौ निरमाण दुरग-निरमाण सूं ई जुड़ियौ थकौ है। राजम्हैल या तौ ऊंचै स्थान माथै किणी खूणै में या पचै नगर रै बीच में बणाईजता रैया है। मुगल स्थापत्य रै प्रभाव सूं पैलड़ा राजम्हैल जटै सादा, छोटै-छोटै कमरां वाळा अर राजपूत स्थापत्य रा मौलिक प्रतीक है, उठै राजपूत-मुगल संबंधां रै कारण राजम्हैलां रै निरमाण में भारी फेर बदळ हुयौ। फव्वारां अर जळाशयां वाळा बाग-बगीचा, कुंज-निकुंजां सूं घिर्योड़ा राजम्हैल, दीवाने-खास, दीवाने-आम, तोषाखाना, शास्त्रागार, भंडार, मिंदर रै साथै राग-रंग लियोड़ी चित्रसाळावां, बारादरियां, रंगम्हैल, गोखा-झरोखा इत्याद कला रा सिरै नमूना है। यूं तौ घणकरा चावा राजम्हैल किणी न किणी दीठ सूं आपरी ठावी ठौड़ राखै, पण अठै वां मांय सूं खास-खास इण भांत है—
डीग : हजार फव्वारां म्हैल, गोपाळ भवन, सूरज म्हैल, सावण भवन, भादौ भवन, नंदन वन, किसन भवन, जूनौ म्हैल, जनाना म्हैल।
बूंदी : बादळ म्हैल, फूल म्हैल, मोती म्हैल। सामोद : सुल्तान म्हैल, दरबार हाल, सीस म्हैल, सिलीसेढ म्हैल। अलवर : सलीम या तवारीखी म्हैल, सिलीसेढ म्हैल। जयपुर : चन्द्र म्हैल, हवा म्हैल। उदयपुर : जगनिवास, अमरसिंह रौ म्हैल, दिलखुस म्हैल, बारी म्हैल, प्रीतम निवास, मामक म्हैल, चंद्र म्हैल, सज्जन-निवास, सहेलियां री बाड़ी। जोधपुर : कंवरपदा म्हैल, फतै म्हैल, फूल म्हैल, सिणगार म्हैल, छित्तर पैलेस (उम्मेद भवन), बाळसमंद म्हैल, भटियाणीजी रौ म्हैल, राईकाबाग पैलेस, रातानाडा म्हैल, छैलबाग रौ म्हैल, आम खास म्हैल, सरदारसमंद म्हैल। बीकानेर : अनूप म्हैल, गंगानिवास दरबार हाल, फूल म्हैल, चंद्र म्हैल, गजमिंदर, छत्र म्हैल, चीनी बुरज, लालगढ़ पैलेस। जैसलमेर : बडौ बाग, मूळ सागर। टौक : नजरबाग म्हैल। भरतपुर : कमरौ खास। धौलपुर : महाराजा रौ म्हैल, खानपुर म्हैल। सलूंबर : जनानी ड्योढी रौ काच म्हैल। बेदला : बखत-निवास। जाळौर : जूना म्हैल। देलवाड़ा : म्हैल। भीलवाड़ा : आसींद रौ म्हैल। इत्याद-इत्याद।
हवेलियां : हवेली-निरमाण री स्थापत्य कला भारतीय वास्तुकला रै अनुरूप रै रैयी। जयपुर री हवेली परंपरा तौ इत्ती चावी हुई क बाद में सेखावाटी रा सेठां तौ आप-आप रै गांवां में विसाळ हवेलियां बणावण री परंपरा ई सरु कर दी। रामगढ, नवलगढ, फतहपुर, मुकुंदगढ, मंडावा, पिलाणी, सरदार शहर, रतनगढ इत्याद कस्बां में विसाळ हवेलियां हवेली शैली—स्थापत्य रा उत्कृष्ट उदाहरण है। जैसलमेर री सालमसिंह री हवेली, नथमल री हवेली अर पटवां री हवेली तौ पत्थर री जाळियां अर कटाई रै पाण आज जगचावी हुयगी है। इणी भांत वंशी पत्थर री बणी करौली, भरतपुर अर कोटा री हवेलियां ई आपरी कलात्मक संगतराशी री वजै सूं बेजोड़ गिणीजै। बाद रा वैष्णव मिंदर हवेली शैली रै आधार माथै ई बणाईज्या, सो विसाळ हवेलियां मिंदरां रै रूप में आज जगै-जगै देखी जा सकै।
देवळ-छतरियां : राजस्थान में अेक तौ राजावां रौ राज अर दूजै सम्पन्न सेठ-समाज रौ वास रैयौ, सो सुरग सिधायां बाद उणां री याद में स्थापत्य री दीठ सूं खास स्मारक बणाईज्या, जिका छतरियां अर देवळ नांव सूं जाणीजै। मुसळमानां रा मकबरा ई इणी श्रेणी में आवै। स्थापत्य कला अर भवन-निरमाण री दीठ सूं आं स्मारकां रौ बड़ौ महत्व है। राजा-महाराजावां, सेठ-साहूकारां, संतां-महापुरुषां इत्याद री मसाण-भोमकावां अैड़ै स्मारकां सूं भरी पड़ी है। जयपुर रौ गैटोर, जोधपुर रौ जसवंत थड़ौ, कोटा रौ छत्रविलास बाग, जैसलमेर रौ बडौ बाग तौ इण दीठ सूं घणा महताऊ है। अैड़ौ कोई राज नीं रैयौ जठै मसाणां में छतरियां नीं बणी हुवै। अलवर में मूसी महाराणी री छतरी अर फतह गुंबद, करौली में गोपाळसिंह री छतरी, बूंदी में चौरासी खंभां री छतरी, रामगढ रै सेठां री छतरी, बीकानेर में राव कल्याणमल री छतरी, गैटोर में ईश्वरसिंह री छतरी, जोधपुर में जसवंतसिंह रौ थड़ौ अर अजीतसिंह रौ देवळ, जैसलमेर में राजां अर पालीवाळां री छतरियां री स्थापत्य-छिब देख्यां ई बणै। जोधपुर रै त्हैत महामिंदर में नाथजी री छतरी आपरी न्यारी ई ओळख राखै। इणी भांत अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती साहब री दरगाह ई देखणजोग है।
मिंदर : गुप्तकाळ री समाप्ति सूं ले’र 15 वीं शताब्दी ई, तांई राजस्थान उत्तर भारतीय मिंदर-निरमाण रौ अेक प्रमुख केन्द्र रैयो। वियां 7वीं शताब्दी ई. सूं पैलै रा पुरातात्विक भग्नावशेष राजस्थान री प्राचीन मिंदर-निरमाण परंपरा नै उजागर करै। राजस्थान में सै सूं पैलो तिथि-अंकित मिंदर झालरापाटण रौ शीतलेश्वर महादेव रौ मिंदर है, जिणरौ मूळ हिस्सौ स. 689 ई. में बण्यौ हौ।
10 वीं सूं ले’र 10 वीं शताब्दी ई. तांई गुर्जर प्रतिहारां री महामारू शैली में सैकडूं मिंदर बणवाईज्या, जिणां में वैष्णव, शैव, शाक्त अर जैन धरमां रौ जिकौ साहिष्णुक अेकीकरण देखण नै मिलै वौ फेर कठैई दुरलभ है। गुर्जर प्रतिहार कला रा उत्कृष्ट उदाहरण है ओसियां रा सचिया माता मिंदर, पुराणौ सूर्य मिंदर, महावीर मिंदर, तीनूं हरिहर मिंदर अर पीपलड़ा माता मिंदर। गुर्जर प्रतिहारां रै साथै जुड़्यै इण कला—आंदोलन नै महामारू शैली कैयौ गयौ। महामारू शैली रै मिंदरां में लांबा, बुचकला, मंडोर इत्याद रा मिंदर ई महत्वपूरण है। स. 800 ई. रै लगै-टगै बण्यौ आभानेरी रौ अेकलो विसाळ मिंदर गुर्जर प्रतिहारां री कला रौ झळमळावतौ स्तंभ है। चित्तौड़ में गुहिल वंश सूं पैली अर महाराणा कुंभा तांई वास्तुकला रौ मिंदर-निरमाण में बेजोड़ योगदान रैयौ। कालिका माता मिंदर अर कुंभस्वामी मिंदर जिका क पैली क्रमवार सूर्य मिंदर अर शिव मिंदर हा, दोनूं बाप्पा रावल अर गुहिलां सूं पैली रा है। आं माथै ई महामारू शैली रौ प्रभाव सफा झळकै। कला-पारखी महाराणा कुंभा रै बगत रौ वास्तुकार मंडन आपरै शिल्प विषयक ग्रंथ में मिंदर-निरमाण बाबत ई लिख्यौ है।
स. 838 ई. में मिहिर भोज रै कन्नौज नै राजधानी बणायां राजस्थान रै मरुप्रदेश अर सपादलक्ष में चव्हाणां री शक्ति उभरी। चव्हाणां मिंदर-निरमाण री परंपरा नै कायम राखतां केकींद, हर्षनाथ, नाडोल इत्याद स्थानां में भव्य मिंदर बणवाया।
दिक्खणी राजस्थान ई मिंदर-निरमाण री दीठ सूं कम महत्वपूरण नीं रैयी। पूरबी-दिक्खणी मिंदरां माथै महामारू शैली रै साथै-साथै मध्यभारत री ‘मालू’ शैली रौ; अर पिच्छमी-दिक्खणी मिंदरां माथै महामारू शैली रै साथै-साथै गुजरात री ‘गुर्जर’ शैली रौ प्रभाव रैयौ। इण दीठ सूं दिक्खणी-पूरबी अंचळ में बाडौली, रामगढ, मेनाल, कंसुआ, कवालजी इत्याद रा मिंदर खास तौर सूं उल्लेखजोग है। हाडौती छेत्र में मिंदर-निरमाण री महत्वपूरण परंपरा दरा सूं ले’र केशोरायपाटण तांई रैयी है।
दिक्खणी-पिच्छमी राजस्थान में जैन, अपभ्रंश अर गुर्जर शैली जगै-जगै उजागर हुई है। अंबिका माता (जगत), सास-बहू रौ मिंदर (नागदा), लकुलीश मिंदर (अेकलिंगजी), अरथूणा, देव सोमनाथ, अहाड़ इत्याद रा मिंदर उल्लेखजोग है।
राजस्थान में जैन संस्कृति री अेक लंबी परंपरा रैयी। गुर्जर प्रतिहारां गुहिलां, च्वहाणां, परमारां अर सोलंकियां रै सौहार्द्र री वजै सूं वैष्णव, शैव अर शाक्त मिंदरां रै साथै-साथै जैन मिंदर ई बणवाईज्या। पिच्छमी राजस्थान में महावीर मिंदर (घाणेराव), पार्श्वनाथ मिंदर (सादड़ी), नवलखौ पार्श्वनाथ मिंदर (पाली), आदिनाथ मिंदर (नरलाई) रै अलावा नाडोल, वर्मन इत्याद स्थानां रा मिंदर उल्लेखजोग है। दिक्खणी-पिच्छमी राजस्थान जैन धरम रौ गढ रैयौ। इणी कारण माउंट आबू रौ देलवाड़ा मिंदर जैन कला री चरम परिणति बण सक्यौ है। आबू अंचळ री ई प्राकृतिक गोद में रणकपूर रौ चौमुखौ जैन मिंदर ई खास उल्लेखजोग है। वियां वरकाणा, जाळौर, केकींद, सांगानेर, चित्तौड़ इत्याद रा मिंदर ई उल्लेखजोग है।
12 वीं शताब्दी ई. रै बाद सूं नागर शैली रै आं मिंदरां रौ कला-पगस धीरै-धीरै खतम हुवण लाग्यौ। पछै मुस्लिम हमलावरां रै हाथां मिंदर पटक्या जावण सूं राजस्थान में मिंदर-निरमाण री परंपरा कम हुवण लागी। वैष्णव धरम रै त्हैत पुष्टि सम्प्रदाय रै प्रभाव सूं काळांतर में हवेलियां नै ई मिंदर रौ स्वरूप दियौ जावण लाग्यौ। इण भांत प्राचीन काळ सूं ले’र आज तांई अणगिणत देवी-देवतावां रा भांत-भांत रा हजारूं मिंदर राजस्थान में बण्या।
मूरतियां : शास्त्रीय अर लोंक कलावां री गंगा-जमना न्यारै-न्यारै धारमिक सम्प्रदायां री देव-मूरतियां रै निरमाण री इतियासिक भूमिका शुंगकाळ निभाई। शक-कुषाण काळ में आ मूरती कला आपरौ अेक तै स्वरूप धारण कर्यौ। गुप्तकाळ में आ’र सजीवता अर मनोरम सौंदर्य री प्रतीक बणी। अर मध्यकाळ में आ कला पराकाष्ठा नै प्राप्त हुई। उत्तर मध्यकाल में राजनीतिक बदळाव अर इस्लाम रौ बधतौ प्रभाव देव-मिंदरां रे निरमाण नै गैरौ धक्कौ पुगायौ जिण सूं मूरती कला हरासोन्मुखी हुयगी। दो शताब्दियां रै संघर्ष रै बाद 15 वीं शताब्दी ई. में सांस्कृतिक पुनरुत्थान रै जुग रौ सूत्रपात हुयौ, जिणमें मेवाड़ रै गुहिल अर जैसलमेर रै भाटी राजवंश अग्रणी भूमिका निभाई। 16-17 वीं शताब्दी ई. में राजपूत-मुगलां रै बीच हुयौ मैत्री-संबंध मूरती कला नै प्रभावित कर्यौ। 17-18 वीं शताब्दी ई. में राजपूत-मुगलां रै बीच हुयौ मैत्री-संबंध मूरती कला नै प्रभावित कर्यौ। 17-18 वीं शाताब्दी ई. में ‘वल्लभ सम्प्रदाय’ री ल्हैर में मूरती कला नवौ मोड़ लियौ अर ‘पुष्टि मारग’ रै मिंदरा में आराध्य देव री न्यारै-न्यारै स्वरूपां अर छवियां वाळी मूरतियां थापन करीजी, ज्यूं क—श्रीनाथजी (नाथद्वारा), द्वारकाधीशजी (कांकरोली), मथुरेशजी (कोटा), गोविंददेवजी (जयपुर), रतनबिहारीजी अर दाऊजी (बीकानेर) इत्याद। राजनीतिक उतार-चढाव रै उपरांयत ई राजस्थान में मिंदर अर मूरतियां बणती रैयी है, पण धीरै-धीरै पैली वाळी जीवतंता, सौंदर्य, अलंकारिकता, लयात्मकता अर गतिशीळता रा अभाव हुवतौ गयौ।
हस्त कलावां
ललित कलावां अर लोक कलावां रै मामलै में ई नीं, हस्त कलावां रै मामलै में ई राजस्थान बेजोड़ है। राजस्थान री हस्त कलावां रौ इतियास उत्तौ ई प्राचीन है जित्तौ ई पाषाण जुग रै मानखै रौ, जद क वौ सिकार सारू पत्थरां रा हथियार बणाया करतौ हौ। काळांतर में वौ पाक्योड़ा माटी रा बरतन, पाक्योड़ा माटी रा खिलूणा, मणका, हाथीदांत री वस्तुवां मकानां री ईटां, तांबै री कवाड़ियां इत्याद सगळी ईं भांत री चीजां बणाई। कपड़ौ काळ रै प्रभाव सूं नस्ट हुय जाया करै, फेरूं ई 3 री शताब्दी ई. तांई रै कपड़ै रा प्रमाण रा नगर सूं उपलब्ध हुय चुक्या है। बसंतगढ री छठी शथाब्दी ई. री कांसी री मूरतियां धातु रै काम री सै सूं प्राचीन प्रमाण समझी जावै। विराटनगर रै बौद्ध चैत्य में 3 री शताब्दी ई. पू. रा 26 लकडी रा अठपहलू स्तंभ लकड़ी रै प्राचीनतम काम रा उदाहरण है।
यूं तौ राजस्थान में हर जाति री आप री न्यारी-निजू हस्तकला है अर हर जाति आप आपरी कला में प्रवीण है। सो अेकूकी कला रौ लेखौ लेवणौ अठै संभव नीं। कीं खास-खास कलावां जिकी समंदरां पार करती आखी दुनिया में चावी हुयगी है, उणां री विगत इण भांत—
मीना-कला: भारत में मीना री कारीगरी लाहौर सूं जयपुर महाराजा मानसिंह लाया हा। आज जयपुर री मीना-कला जगचावी है। जयपुर रै अलावा नाथद्वारा अर प्रतापगढ में ई मीना रौ काम करीजै। मीनाकारी भांत-भांत रै गैणां-गांठां अर प्रदर्श्य वस्तुवां रै अलावा तलवारां, खंजरां, छुरियां इत्याद री मूठां माथै ई करी जावै।
रतन-कला : आपरी गुलाबी छिब री दाई ई जयपुर री रतन-कला सारै संसार में कीरत हासल करी है। नित ई दुनिया रै खूणै-खूणै सूं व्यवसायी लोग अठै रतनजड़्या गैणा अर खास तौर सूं पन्ना खरीदण सारू पूगता रैवै। जयपुर तौ पन्नां री अंतर्राष्ट्रीय मंडी है। जयपुर में हीरां, मूंगां अर मोतियां रै अलावा जिका रतन त्यार करीजै, वै इण भांत-माणक, नीलम, पुखराज, तामड़ा, बिल्लौर, हकीक, फिरोजा, तुरमली, दाणा फिरंग चंद्रमणि, लहसुनिया, लाजवर्त, पेरीडाट इत्याद।
आभूषण-कला : आभूषण यानी गैणां-गांठां रै मासलै में राजस्थान पूरी दुनिया में आपरौ बेजोड़ अर सिरै स्थान राखै। सोनै-चांदी रै अणगिणत भांत रै जड़ाऊ गैणां रै अलावा दूजी धातुवां, हाथी दांत अर लाख तकात रै गैणां री न्यारी-न्यारी बणगट हुवण सूं अठै रै गैणां री भांत-भंतीली छिबां रौ नीं कोई छेह है, नी कोई पार।
रजत-कला : रजत यानी चांदी री कला भांत-भांत रै अणगिणत गैणां रै अलावा बरतनां, दीयां, पूलदानां, गमलां, डिब्बा-डिब्बियां, सिगरेट केसां, चुस्कियां, सुराहियां गंगाजळियां इत्याद नाना भांत-भांत रा खिलूणा अर सजावटी सामग्री ई इणसूं बणाईजै। जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर इत्याद जगावां चांदी रौ खूब काम हुवै।
ब्लू पॉटरी-कला : जयपुर री ब्लू पॉटरी कला ई अणूंती ई चावी रैयी है। महाराजा सवाई जयसिंह रै बगत में ब्लू पॉटरी रा कलाकार जयपुर आया हा। तद सूं ले’र आज तांई ब्लू पॉटरी रै छेत्र में जयपुर लगौलग विकास करतौ रैयौ है। आजकाल पद्मश्री कृपाळसिंह, जिका खुद चित्रकार ई है, ब्लू पॉटरी नै नित नवा आयाम दे रैया है।
मुनव्वत-कला : ऊंट री खाल रै कुप्पां-कुप्पियां इत्याद माथै मुनव्वत रौ काम बीकानेर में हुवै। बीकानेर में औ काम उस्ता परिवार सरू कर्यौ। धीरै-धीरै नक्काशी अर मुनव्वत रौ काम वै काच, लकड़ी अर माटी री वस्तुवां माथै ई करणौ सरू कर दियौ। आज सीसियां, कुप्पियां, आईनां, डिब्बा-डिब्बियां, माटी री सुराहियां खूब हुवण लागग्यौ है। स्व. हिसामुद्दीन उस्ता इण कला रा कुसळ कलाकार हा।
चित्र-कला : आजकाल वसली चित्र, हाथीदांत री वस्तुवां माथै चित्रांकन अर पिछवायां हजारूं री संख्या में नित जयपुर, किशनगढ, बीकानेर, उदयपुर, कोटा, बूंदी इत्याद रा चित्रकारां बणावै। सूती केम्ब्रिक अर जिल्द माथै छोटा अर बडा सगळा ई भांत रा चित्र बणाईजै। पाबूजी री फड़ां रौ निरमाण ई विदेसी मांग देखतां घणौ हुवण लागग्यौ है। इणां रै अलावा लघु चित्रकला रै त्हैत जयपुर, जोधपुर, नाथद्वारा, किशनगढ इत्याद स्हैरां में खूब चित्र बणाईजै।
मूरती-कला : हाथीदांत, चंदन, मकराणै, तामड़ै पत्थर, पीतळ इत्याद री नैणलुभाऊ मूरतियां यूंतौ राजस्थान में केई स्थानां माथै बणाईजै, पण इण मामलै में जयपुर अणूंतौ ई चावौ है। देस भर में मिंदरां सारू देवी-देवतावां री मूरतियां अठै इज बणाईजै। अै मूरतियां देख’र अैड़ौ लागै जाणै कारीगरां इणां में प्राण चाल दिया हुवै।
काष्ठ-कला : काष्ठ यानी लकड़ी री कमी हुवता तकां ई राजस्थान इणरी कलात्मक वस्तुवां रै निरमाण में लारै नीं रैयौ। काष्ठ कला री झीमी कारीगरी हर राजम्हैल अर हर नामी सेठ री हवेली में देखण नै मिल जावैला। लकड़ी माथै पीतळ, हाथीदांत, सीप, लाख इत्याद रौ काम ई हुवै। चित्रकारी रौ काम बीकानेर, चूरू, रामगढ, मंडावा अर फतहपुर; हाथीदांत रौ काम जयपुर, मेड़ता अर उदयपुर; ने सीप रौ काम जोधपुर में घणौ हुवै। आज बाड़मेर रै लकड़ी रै फरनीचर री चौफेर मांग है।
छपाई-कला : राजस्थानी छापा भांत-भांत रै बेलबूटां रौ पक्कै रंगां में छपाई रौ जिकौ काम कर्यौ है, वो जगचावौ है। छपाई सारू बालोतरा, बाड़मेर, पाली, जैसलमेर, आकोला, चित्तौड़, आहाड़, सांगानेर, बगरू, कालाडेरा इत्याद स्थान चावा है। राजस्थान में ओ काम लगै-टगै तीन सौ बरसां सूं हुवतौ आ रैयौ है।
टेराकोटा-कला : पाक्योड़ी माटी रा खिलूणा, टेराकोटा, बरतन इत्याद काळीबंगा अर आहड़ इत्याद सूं प्राप्त हुय चुक्या है। पण, नाथद्वारा रै कनै आयै मोलेला रै कुम्हारां इण काम में जिकौ जस हासल कर्यौ है, उणां री बरोबरी कठैई नीं है। वियां मारवाड़ में कुम्हार, जिका क घरेलू बरतन बणावै, वै ई टेराकोटा या माटी रा खिलूणा बणावण रौ काम करै।
कुट्टी-कला : कुट्टी कला मुगल काल में रामसिंह दूजै रै बगत में दिल्ली सूं जयपुर आई। पछै तौ राजस्थान री केई रियासतां में इणरौ काम सारू हुयग्यौ। राजस्थान रै केई संग्रहालयां में कुट्टी कला रा अणगिणत उदाहरण उपलब्ध है। जयपुर में आज ई कुट्टी कला रौ काम हुवै।
लाख-कला : लाख सूं चूड़ै-चूड़ियां रै अलावा भांत-भांत री दूजी ई केई वस्तुवां बणाई जावै, जिणां माथै नगीनां री जड़ाई करीजै। जयपुर लाख रै काम सारू खास तौर सूं चावौ है। सवाई माधोपुर, खेड़ला, लक्ष्मणगढ़, इंदरगढ़ (कोटा), कसैली इत्याद में लकड़ी रै खिलूणां अर दूजी वस्तुवां माथै लाख रौ काम करीजै।
धातु-कला : इणरै त्हैत लौह, जस्तै, पीतळ, कांसी, अेल्यूमीनियम, व्हाइट मेटल इत्याद रौ काम हुवै। लौह रै काम सारू नागौर, जस्तै अर अेल्यूमीनियम रै काम सारू जोधपुर, ने व्हाइट मेटल रै काम सारू उदयपुर चावौ है। ‘कोफूतगिरी’, जिणरै त्हैत फौलाद री वस्तुवां माथै सोनै रै बारीक तारां री जड़ाई करीजै, अलवर अर उदयपुर में बेसी हुवै।
बंधेज-कला : बंधेज रै मामलै में मारवाड़ घणौ चावौ रैयौ है। वियां मारवाड़ अर सेखावाटी रौ बंधेज बारीक अर बढिया समझीजै। जयपुर रै अलावा बीकानेर, बाड़मेर, पाली, उदयपुर अर नाथद्वारा में बंधेज रौ काम हुवै। बंधेज री भांत-भांत री ओढणिया विदेसी महिलावां तकात री मन मोह लेवै। बंधेज रै रूप में राजस्थान री जिकी रंगकला मुखर हुवै, उणरी बराबरी दुनिया में कठैई नीं।
बुणाई-कला : यूं तौ गलीचै रै काम सारू जयपुर घणौ चावौ रैयौ है, पण अबै तौ औ ब्यावर, किशनगढ, टौंक, मालपुरा केकड़ी भीलवाड़ा, कोटा इत्याद सगळी ई जगावां कर्यौ जावै। दरियां रौ प्रचलण आजकाल बौत है। भांत-भांत री डिजाइनां वाळी दरियां जोधपुर नागौर, टौंक, बाड़मेर भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी, मालपुरै इत्याद स्थानां माथै बणाई जावै।