[चौधरी कुंभाराम आर्य राजस्थान रा प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, किसान नेता अर समाज सुधारक हा। स्वतंत्रता आंदोलन मांय सक्रिय भागीदारी री वजै सूं वां नै जेळ पण जावणो पड़्यो। स्वतंत्रता रै पछै वै राजस्थान सरकार में मंत्री रैया अर राजस्व, स्वास्थ्य, पुलिस, खनिज अर उद्योग सरीखा महताऊ विभाग संभाळिया। वै राज्यसभा अर लोकसभा रा सदस्य ई रैया। राजस्थान मांय पंचायत राज व्यवस्था नै मजबूत करण में वां री महताऊ भूमिका रैयी। वां री डायरियां देखण सूं ठाह लागै कै वै राजस्थानी रा जबरा हिमायती अर सांतरा साहित्यकार हा।]

 

उण दिन बोबो छुट्यो

 

छोटो, छोटो। घणो छोटो। दूध चूंगतो। गुढाळियां चालतो। मां साथै नानेरै चाल्यो। पी’र उमांई मां। सरदी गिणी न गरमी। सूरज साथै गोदी ले’र ऊंठ बैठी।

 

उमांवै अर तावळां में टूम-टाकी पैन न सकी। पेई (संदूकड़ी) साथै लेय ली।

 

लुगाई नै गैणो घणो प्यारो, पण टाबर उणसूं बी प्यारो।

 

मां कनै दो प्यारी चीज, किसी नै सम्हाळै

पौ माह री सरदी, हाथ पग ठरै, टूंटा हुवै, तिण पर झूंठै ऊंठ री सवारी, मां डरपै।

 

कदे अपणै आप नै सम्हाळै तो कदे अपणी प्यारी चीजां नै। दोगाचींती में घणी देर सै नै सम्हाळ नीं सकी। गैणाळी पेई पड़गी।

 

पी’र रै गोरवैं बेरो पड्यो। पेई ढूंढण ऊंठ मोड़्यो। मारग पड़ता गांवां में पूछण लागी।

 

अेक गांव में पेई मिळगी। उठावणवाळो भलो मिनख। सांई सेती दे’दी। मां घणी हरखी, सो गैणो मिलग्यो।

 

गांव रै लोगां पेई देणाळै गी घणी बडाई करी।

 

मां पेई ले’र ऊंठ नै पी’र कानी लपकायो।

 

झूठो ऊंठ। माकड़ा मारै अर चीढ-मींगणा फेंकै। अेक छींटो मां रै बोबै लाग्यो, हूं चूंगतो। मां’ छी’ कैय’र बोबो छुटा लियो।

 

बोबो छूटतांई मां कानी झांक्यो। मां ‘छी’ कैय’र बोबो ढक्यो।
उण दिन बोबो छूट्यो। गाय, भैंस रै दूध सूं पळ्यो।

 

15.04.1956

 

पंछीड़ो पांख्यां फड़फड़ा देतो

 

बाळ हाणी। कोई च्यार-पांच साल री उमर। गांव रै टाबरां साथै रमतो। टाबरां नहाण री सोची। उणां साथै खंदेड़ै जा बड़्यो।

 

खंदेड़ै में पाणी घणो नीं। पण कुम्भार खंदा घणा। अेक खंदै में चल्यो गयो। टाबरां डूबतो देख’र घणो रोळो मचायो।

 

रोळो सुण’र कई मिनख भाज’र आ’ग्या। मिनखां खंदेड़ो ढूंढ मार्‌यो। हूं नीं मिल्यो। मिनख बोलता सुणै। हूं बोल नीं सकूं।

 

आ बिथा पल भर और रैय जाती तो पंछीड़ो पांख्यां फड़फड़ा देतो, पण इण बीच अेक मिनख रो पग अड़ग्यो। उण खैंच’र बारै नाख्यो।

 

इण घटना नै डर बाड़ दीयो। आज तक आछी तरां तैरणो नीं आवै।

 

01.11.56

 

भीमै काकाळो थप्पड़

 

टाबर थकां री बात। समझ थोड़ी। घराळा ऊंठ चरावण घालै। काकै जायै भाई गीधै साथै जाऊं। दोनूं भाई रोही में ऊंठ चरावां। रोटी भीमो काको ल्यावै। भीमो खुद कुंवारो। घर रोटी रो सलीको कोनी।

 

भीमो काको पालो काटण रो काम करै। म्हारली रोट्यां सूं काम चलाणो चावै।

 

दोपारो करण बैठ्या। भीमै काकै रोटियां सम्हाळी। म्हाराळी रोटी नै तोड़’र कम करी। हूं देखूं, के बोलूं? काको टाबरां ऊं चूकै नीं। म्हाराळी पाछै गीधै भाई आळी नै तोड़ी। गीधै भाई साबत चाई। समझायो। मान्यो नीं। भीमै काकै रीस में आ’र धोळ ठोक्यो। गीधै भाई रो मुंह फिरग्यो। भीमै काकै आंख्यां काढ’र कयो, “तूं बी पूरी ल्यैगो?”

 

हूं आधी हां कर ली। धोळ सूं बचग्यो।
गीधै भाई नै चिड़ावण खातर बात मिलगी।
जद कद ई कोई गीधै भाई नै कैवै कै “आधी ले गो कै साबती?”
गीधै भाई नै भीमै काकळो थप्पड़ याद आवै, रीस आवै।

 

14.10.57

 

लूंकां मरणो मांड्यो

 

छोटी उमर ऊंठ चराऊं। धोरां री उबड़-खाबड़ खाळांळी धरती। अड़ावां घास अर बोझा। ऊंठ मजै सूं चरै। हूं रोही में अेकलो। टिबड़ियै रमूं। चाणचक अेक लूंका आई। म्हां माथै झपटी। हूं चिमक्यो। लूंकां समझ’र लारै भाज्यो। लूंका बोजां पग देगी। हूं पाछो रमण लाग्यो। दूसर दो लूंका आ धमकी। हूं डर्‌यो, पण हिम्मत साथै फेरूं लारै भाज्यो। दोन्यां नै भजा आयो। बेरो नीं क्यूं, पण हीयै बैठगी कै ओजूं आसी। इण बैम सूं तकड़ाई सारू फोग रो छड़ो तोड़’र कनै मेल्यो। घणी देर नीं लागी। अबकै कई लूंकां आ धमकी। च्यारूं कानी लूंकां ई लूंकां होगी। अेक कानी छड़ो ले’र भाजूं, दूजी लारो करै। जी मुठी में। डर लागै। रीस आवै। रोऊं अर लारै भाजूं। ओसाण नीं आवै। लूंकावां बधण लागी। 10-15 भेळी होगी। सै हमलो करै। ओसाण चूक होग्यो। दीखण लाग्यो—लूंकां मार’र छोडसी। मरतो के नीं करतो! मन नै समझायो मरणो फेर के डरणो। हिम्मत बांध’र लूंकावां साथै जूझण लाग्यो।

 

थोड़ी देर में लूंकावां अऊ गई। ओसाण आयो। भाग’र ऊंठ पकड़्यो। बिठायो अर उण माथै चढ बैठ्यो। फेर के? तकड़ो होग्यो। अबकी बार लूंकावां आई। ऊंठ लूंकावां पाछै इस्यो दौड़ायो कै लूंकावां बोजां पग देती दीखी। लूंकावां रै बोजां में पग देतां ही ऊंठड़ै नै गांव कानी भगायो। घर लोवै कर्‌यो।

 

बात घणा जणां नै सुणाई। लूंकां मिनखां सूं डरै फेरूं आ के बणी। किणी भ्रम नीं काढ्यो।

 

अेक दिन मोरड़ी नै गादड़ी पर हमलो करतां देख्यो। गादड़ी नै ओसाण भुला दियो। घणी अणहोणी लागी। कनै जा’र देख्यो। मोरड़ी को-को करण लागी। हूं और लोवै हुयो। मोरड़ी रा इंडा दीख्या। लूंकावां री समझ में आई कै लूंकावां क्यूं लड़ी। जिण धोरै हूं रमतो, उठै लूंकां रा बचिया होणा चाइजै।

 

बचियां खातर लूंकां मरणो मांड्यो। दूसरी सै मदद करण आई।

 

14.10.57

 

ऊंठ चरावण रो छेहलो दिन

 

फिटोड़ै री फटकार; जालम। बात, जुगां जूनी। याद आयां काल री लागै।

 

ऊंठ रो गवाळियो बण’र गांव रै छोरां साथै रोई जाऊं। जेठ रो महीनो। तपती पड़ै। लूवां वाजै। लोट रो पाणी खूटग्यो। तिस नै आ घेर्‌यो। आंख्यां आगै अंधेरो फिरण लाग्यो। सुध-बुध ठिकाणै लागी। बेहोस होग्यो। न जाणैं किण मदद करी। होस हुयो उण बेळां अेक जोड़ी रै पाणी में हो।

 

छोरा बठै सूं ऊंठ पर बिठाय’र घर चाल्या। राह में फेरूं सुध-बुध कूच होगी। छोरा लोथ लेय’र घर आया।

 

घर होस हुयो। बेरो पड़्यो। घराळां में घणा फोड़ा पड़्या।
उण दिन पाछै घराळां ऊंठ चरावण नीं भेज्यो।

 

28.11.57

 

बात, जकी घर करगी

 

टाबर थकां री बात। खेत रुखाळूं। खेत पड़ोसी टाबर साथै राड़ होगी। दोनूं कूट्या। हूं कुट’र रैयग्यो। दूजो रोंवतो घर गयो। मां-बापां बुरो मनायो। बात बदगी। थाणो आग्यो।

 

मां मरदानगी दिखाई। धीरज बंधाई। म्हारो डर दूर कर्‌यो।

 

पुलस आळां बुलायो। गर्र-फर्र करी। गांव रै मिनखां रो जी जगां छोडण लाग्यो। टाबरां री लड़ाई धणियां पड़गी।

 

गांव रा चोखा अर मानीजता मिनख बीच में पड़्या। पुलस आळा मान्या नीं। पुलस आळा पिस्या खातर फूं-फां करै।

 

छेकड़ पिस्या दे’र लारो छुटायो।
पुलस खोटी; आ बात घर करगी।

 

17.09.59



बिपता बुरी

 

बिपता बुरी। किणी माथै पड़ै नीं।

 

छोटी उमर। बाप रो हाथ सिर सूं उठग्यो। मां बापड़ी बिना धणी बिपता में पड़गी।

 

अेकलो बेटो। लाड घणो, पण जोर के? घर गरीबी घणी। टूम-ठीकरी बाप रो खरच खाग्यो।

 

घर दाणो दरसण करण नीं। भूख भोळी, दोनूं बखत आ धमकै। मां घमी कळपै। भूक के मानै। बिपदा में आपणो याद आवै। मां देवरां कनै ले’र गई।

 

काकां लाड कर्‌यो। सिर हाथ फेर्‌यो, पण पेट कानी नीं देख्यो। मां अबरोस कर्‌यो। भूखी भीर होयगी। काकां रोकी नीं।

 

मां गांव आई। हीमत कर’र गांव में मजूरी करण लागी। लोगां रा घर लीपै। पाणी भरै, पीसणो पीसै, मजूरी सूं काम चलावै।

 

विपता भारी। रीस आवै, जोर नीं चालै। टाबर करै तो के करै?

 

10.12.59

 

मां मरदानी

 

मां पढण घालै। गांव रा मिनख मां नै गैली कवै। मां सुणै नीं। मिनख ताना ठोकै। सै मिनख मां नै कैवै, छोरै नै काम नीं लगावै; दुख भोगै। छोरै नै काम लगावै तो रोटी वारो कमावै। पढ’र के थाणेदार बणसी? मां भूख-तिस सैती, पण पढण भेजती।

 

मां घणी हिमतण। सौ मरणा मरती, पण बस पड़तां चोखो खुवाती अर पिराहती। भूख, गरीबी अर दुख साथै घणी घोळ रैती। पण हिमत नीं हारती।

 

मा मरी पण आंण में। जीतै जी हिमत नीं हारी। अैड़ी मां मिलणी ओखी।

 

म्हारो जीवण, मां रो पुण प्रताप।

 

10.12.59

 

बोली रो घाव

 

गोळी रो घाव मिलै, पण बोली रो नीं।

 

टाबर थकां री बात। स्कूल सूं छुट्टी मिली। साथी लुक-मिचमी खेलण खातर बात करी। साथै पढणाळै री बात टाळणै रो मन नीं बण्यो। उण साथै उणरै घरां गयो। लुक-मिचणी खेलण लाग्या। लुक-मिचणी खेलतां पळींडै लुक बैठ्यो। पळींडै रै जिण घड़ै पाछै लुक्यो। घराळी नै उण सोट री दे’र फोड़ नाख्यो। फोड़ उण खातर नाख्यो कै बामण रै घड़ै रै जाट रै छोरै रो हाथ लागग्यो। घराळी (दादी बामणी) मुंह रातो कर’र आंख्यां काढती बोली, “अपरी जात देखै न डोळ, ओकात सूं आगै  पग राखै, जूता खासी।”

 

बात चुभी। बामण अपणै आपनै मोटो अर ऊंचो मानै तो आपरै घर दूजै रै सर के मांगै?

 

चुभी बात सालै। चैन नीं लेण दे। घणो तड़फूं। के करूं, कीं सूझै नीं।

 

अेक बार आर्य समाज रो जलसो देखणौ रो काम पड़ग्यो। उपदेस अर भजन सुण्या। 'सनातनियों की पोल' सुण’र राजी हुयो। आर्य समाजी बणण रो मन बणग्यो।

 

आर्य समाजी बण’र चमार रै छोरै नै पढाण लाग्यो। रोळो मचग्यो। गांव रा मिनख अर मास्टर अड़ग्या। चमार रै छौरै नै स्कूल नीं बड़ण दियो। बात खिंच गई। आखो गांव-घर-मास्टर अेक कानी। हूं अेकलो अेक कानी।

 

चमार रै छोरै नै स्कूल रै बार भींत सारै बैठाय’र पढाणो चालू कर्‌यो।

 

स्कूल छोडी उण बखत तांई छोरै नै पढायो।


10.12.59                                                                                                                                                    

स्रोत
  • पोथी : कथेसर ,
  • सिरजक : कुम्भाराम आर्य ,
  • संपादक : रामस्वरूप किसान ,
  • प्रकाशक : कथेसर प्रकाशन ,
  • संस्करण : अप्रैल-जून 2026
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