यह वाद्ययंत्र तत् वाद्य की श्रेणी में आता है। बनावट में यह डमरू जैसा होता है। इसको कद्दू या लंबी आल से बनाया जाता है। इसके एक तरफ़ चमड़ा मढ़ा जाता है और दूसरी तरफ़ का हिस्सा खाली रहता है। चमड़े में छेद करके एक तांत को खाली हिस्से की तरफ़ पार निकाला जाता है। इस वाद्य यंत्र को बजाने के लिए तुंबे को बायीं बगल में दबा लिया जाता है तथा तांत के किनारे पर लकड़ी से बने हुए गुटके को बाएं हाथ से पकड़कर तांत को खींचा जाता है। दूसरे हाथ से तांत पर आघात किया जाता है और वह आघात ही इसे बजाता है। बांया हाथ तांत को कम-ज्यादा खींचकर उसकी आवाज़ को नियंत्रित करता है।

 

इस वाद्ययंत्र को मेवात क्षेत्र के जोगी बजाते हैं। यह वाद्य यंत्र अलवर, भरतपुर क्षेत्र का लोकप्रिय वाद्ययंत्र है। जोगी जाति के लोग इसे बजाते हुए राजा भरथरी और भगत पूरणमल की कथा सुनाते हैं। जहूर खां व उमर फारूक मेवाती इसके प्रसिद्ध वादक रहे हैं। जहूर खान को ‘भपंग का जादूगर’ कहा जाता है।

 

मूलतः यह वाद्ययंत्र मेवात प्रदेश का रहा है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान में विशेषतः मंगणियार समाज में इस वाद्ययंत्र को लाने और चर्चित करने का श्रेय हरभा गाँव के अल्लादीन खान को जाता है। वर्तमान में उनके पुत्र रईस खान और शेरू खान, छुगे खान और खेता खान इस वाद्य के अच्छे वादक हैं। वहीं मेवात क्षेत्र के जुम्मा जोगी और युसुफ़ खान मेवाती ने भपंग में नाम कमाया है।

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