अलगोजा एक सुषिर वाद्य है, जो राजस्थान का प्रमुख लोक वाद्ययंत्र है। यह किसी समय चरवाहा जाति का जातीय वाद्ययंत्र हुआ करता था। यह बाँस से बना होता है। पारंपरिक अलगोजे में दो जुड़ी हुई बांसुरियाँ हुआ करती थीं। अलगोजा को मटियान, दो नाली, दोनल, गिर, सतारा या नागेज भी कहा जाता है। आजकल दो बांसुरियों को जोड़ने का प्रचलन नहीं रहा बल्कि दोनों बांसुरियों को अलग रखकर भी साथ बजाया जाने लगा है। अलगोजा बजाने के लिए, वादक दोनों अलगोजे मुंह में रखकर उन्हें एक साथ बजाता है।
अलगोजा में स्वरों के लिए छह छेद होते हैं। इनमें एक बाँसुरी से धुन बजायी जाती है और दूसरी पर ‘सा’ सुर स्थिर रहता है। अलगोजा बजाने के लिए, रीड के दोनों तरफ़ तीन-तीन उँगलियाँ रखनी होती हैं। अलगोजा राजस्थानी, बलूच, सिंधी, कच्छी, और पंजाबी संगीत में इस्तेमाल किया जाता है।
धोधे खान को ‘अलगोजे का जादूगर’ कहा जाता है। धोधे खान की धुन पर एशियाड 1982 के खेल शुरू हुए थे। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शादी में बतौर बाराती शामिल होकर भी धोधे खान ने अलगोजा बजाया था।
वर्तमान में इस वाद्य के वादकों में धारुराम, तगाराम भील, हबीब खान लंगा और उनके पुत्र शकूर खान लंगा का नाम आदर से लिया जाता है। तगाराम भील अलगोजा बनाते हैं, इसलिए ये इस वाद्ययंत्र में नवाचार के लिए भी जाने जाते हैं।