यूं तो मनख की जिनगाणी की सांची मुगती मानवता की सेवा में छै। पण अेक ई जिनगाणी में समाज अर देस कै लेखै समरपण, पीढयां तांई वांकी अंधेरी गैल में उजास दैबा को कारज करै छै। समरपण को यो भाव अस्यां ई न्हं आ जावै, घणा जीवट को कारज छै। जिनगाणी की अबखाया नै आपणी तागत बणा गांव-गांव आजादी की अलख जगाती कलम का सांचा सिपाही लोककवि भैरवलाल कालाबादल, अेक बेर ई गैल पै आगै बधया तो फेर पछैड़ी मुड़’र न्हं देख्यो।
कालाबादल नै अेक बेर सबद की तागत पछाण ली तो फेर सबद अर किताबां सूं नातो कदी न्हं टूटयो। अेक बगत तो अस्यो आयो कै रोजी-रोटी कै लेखै किताबां की जिल्दसाजी को कारज बी करणो पड़्यो। मनख का दिनां को कांई, कदी बी फर सकै। अर फेर आजादी कै पैल्यां का दिन। सांचा अरथ में वां दिनां की अबखाया तो वां दिना का लोगबाग ई बता सकै छै। कालाबादल नै आपणा मायड़भासा में रच्यां गीतां सूं जण-जण में देस सेवा अर आजादी की अलख जगाई। जिनगाणी चलाबा कै तांई कोटा जिला का रामगंजमंडी में जिल्दसाजी अर साबुन की दुकान खोली। गुरु पंडित नयनूराम शर्मा कै सैयौग सूं रामगंजमंडी में ही पुस्तकालय की थरपना करी अर जन-जागरण करबा लागग्या।
बारां जिला का छीपा बड़ौद तहसील का गांव ककोड़ी खेड़ा में 4 सितम्बर 1918 में जन्मया कालाबादल जी को पुस्तैनी गांव छीपा बड़ौद तहसील को ई दूजो गांव तूमड़ो छै। कालाबादल घणी मुस्कलां सूं सातवीं जमात तांई पढया, पण वांनै मनख की जिनगाणी अर समझ कै लेखै आखर की अहमैयत तोल छी। नयाबास इस्कूल में पांच बरस पढायो। महात्मा गांधी की गैल पै चालबा हांळा लोककवि कालाबादल 1936 में झालावाड़ जिला का खानपुर कस्बा में प्रजामंडल का सदस्य बण्या अर आजादी का आंदोलन सूं जुड़ग्या। 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन होवै या फेर विनोबा भावो को भूदान आंदोलन, सबमें वांकी उपस्थिति रही। प्रजामण्डल कै लेखै लोककवि कालाबाकदल का समरपण की अेक बानगी-
थाक्या थांका जुल्मा सूं, म्हें प्रजामण्डल खोलेंगा।
छाना रहबा को यो ऑडर तोड़, सुख सूं बोलेंगा॥
हड़ौती अंचळ लोककवि कालाबादल नै अपणा गीतां कै तांई आपणी सबसूं लूंठी तागत बणायो। गांव-गांव जाता अर गीत-कवितावां सूं लोगबागां कै मन-म्हैलाड़ी आजादी की चावन्या पैदा करता। किरसाणां नै हक तांई लड़बो सिखाता। किरसाण, जगत का सताया लोगबांगा कै लेखै हमेस त्यार रहेता। कालाबादल को जगचावा गीत– ''काला बादल रे, अब तो बरसा दे बळती आग' की ये ओळयां, ओळयूं आवै छै-
काला बादल रे अब तो बरसा दे बळती आग
बादल राजा कान बिना रे, सुणे न म्हाकी बात।
थारा मन की तू करे, जद चाले वांका हाथ॥
कसाई लोग खींचता रहे, मरी गाय की खाल॥
खींचे हाकम हत्यारा, ये करसाण की खाल।
खींचे हाकम हत्यारा, ये करसाण की खाल॥
माल खावे चोरड़ा रे, खावे कंत का प्राण॥
फटी धोवती, फटी अंगरखी, फूटया म्हाकां भाग।
काला बादल रे अब तो बरसा दे बळती आग॥
और ओळयां बानगी सारूं-
शहरी नेता मीठा ठग छै, छल सूं कर ले वार।
यां परदेशी पंच्छयां सूं, था सब रीज्यो होशियार॥
सांचा नेता त्याग का रे, सत की बोले बात।
नकली नेता लीद करे छै, मूंडा सूं दिन-रात॥
कांई सूता छो नींद में रे, कुत्ता खावै चार।
पटवारी, कानूगो, नाजम, चौथो थाणादार॥
करसा थांका अन्नदाता छै, क्यों लाग्या धमकाबा ने।
जो थां यां सूं बेर करो तो, मिले न टुकड़ो खाबा ने॥
लोककवि कालाबादल का गीतां में असी केई ओळयां छै ज्यै आपणा ई समाज को असल उणियारो दिखावै छै। देस की गुलामी अर आजादी का बगत में नवीत नींद में सोया मनख नै काला बादल का गीत झझोड़’र जगी देवै छा। यांई वा का गीतां की असल ताकत छी। कालाबादल आपणा जीवन-संस्मरणां में तीन गीत संग्रै का प्रकासन को बी जिक्र करै छै- 'गांवो की पुकार', 'आजादी की लहर' अर 'सामाजिक सुधार'। यां में सूं 'आजादी की लहर' पोथी पै अंग्रेज सरकार प्रतिबंध बी लगायो। पण आजादी का परवाना कद हार मानबा हांळा छा। आपणा गीतां में सबदां को बारूद भर’र अंग्रेजां अर जागीरदारां की नींद उड़ाता रह्या।
आपणा संस्मरणां में कालाबादल लिखै छै कै सन् 1946 में उदयपुर में देसी राज्य लोक परिसद सम्मेलन होयो। जीं में पंडित जवाहर लाल नेहरू बी आया छा। वांकी स्वयंसेवक के रूप में डयूटी नेहरू जी ज्यां ठहराया छा व्हां ला’गी। अेक दिन पैली रात की दो बज्यां नेहरू जी विश्राम कै लेखै आवास पूग्या। ई बीचै पहरां पै तैनात भैरवलाल कालाबादलजी नै नींद आबा लागी तो 'कालाबादल रे, अब तो बरसा दे बळती आग' गीत गाबो सरू कर दयो। नेहरूजी नै कालाबादलजी को गीत सुण्यो तो वांनै दूजा स्वयंमेवकां सूं भैरवलाल कालाबादल कै तांई आपणा कमरा में बुला ल्यो अर गीत सुणाबा की फरमाइस कर दी। दूजै दिन सम्मेलन में नेहरू जी नै मंच सूं कालाबादल गीत गाबा हांळा स्वयंसेवक सूं आपणो गीत सुणाबा कै लेखै आवाज लगवायी। कालाबादल सूंगीत सुण’र लोगबाग घणा राजी होया। जीं दिन सूं ई नेहरूजी नै ज्यै उपनाम कालाबादल भैरवलाल जी कै तांई दयो। ऊं दिन सूं ई भैरवलाल कालाबादल होग्या।
कालाबादल राजस्थान की पैली विधानसभा सन् 1952 में दो साल, 1957, 1967 अर सन 1977 में विधानसभा का सदस्य रह्या। सन् 1978 सूं 1980 तांई जनता पार्टी सरकार में आयुर्वेद राज्य मंत्री रह्या। फेर 1967 सूं 1976 तांई राजनिति सूं संन्यास। यां दस बरसां में कालाबादल समाज सेवा का कारज करता रह्या। आपनै मीणा-संसार पत्रिका को संपादन बी करयो। कालाबादलजी का संस्समरण अर कवितावां की पोथी- 'काला बादल रे अब तो बरसा दे बळती आग' दो बरस पैल्यां ई प्रकासित होई। जींको संपादन कोटा का युवा कवि-लेखक रामनारायण मीणा हलधर अर म्हं करयो। कालाबादल जी की आठ दसक की जूंण-जातरा 20 अप्रैल1997 में पूरी होगी। पण वांकी सीख-समझ अर देस-समाज कै लेखै करया कारज जीवता रहैगा।