तब जिय सोचि बिचारि, मनहीं मन महिमा समुझि।
साँची है यह नारि, धर्म उभै जग महँ प्रगट॥
तब महिमा मुसकाय, कर गहि आलिंगन दियौ।
इक तरु कौं तर जाय, दियौ तुरंगम बंधि तब॥
जीनपोस तर डारि, सस्त्र खुल्लि रक्खिय निकट।
करी सुमार सुमार, उत्कंठा तिय मिलन की॥