सुन्न सिखर नै साधु पोंता, चढग्या नांव नीसरणी।
नै’चै नांव गरीबी राखो, अंतर अजरा जरणी।
जत रा जोग सील रा जामा, धीरज कर उपरणी।
जत सत रा ‘जी’ मोती पहरो, प्रीत पाघ सिर धरणी।
घोड़ा ज्ञान सबद रा सस्तर, मारो मिमता हिरणी।
संतां ! सबद साच कर पकड़ो, साध गया इंहि करणी।
दोऊं कर जोड़ दाखवै ‘लालू’, अै जोगी कूं बरणी।