सांवण सुरंगी बेलड़ी, फूल रैयी डैकाय।
आसा जम घट मिरगलो, बेल समूळी खाय॥
माटी में माटी मिलै, ‘जी’ जंवरो ले जाय।
माता झूरै पूत नै, जलम लियो घर आय॥
नारी झूरै पीव नै, नैणां नीर बैवाय।
भाई झूरै बांधवा जाझा जतन कराय॥
बैनड़ झूरै बीर नै, सावण लेवण आय।
गाफल मन में चेत कर, औ जुग हाल्यो जाय॥
चित री चौपड़ मांडल्यो, खेलो इधकै दाव।
पासा राळो पेम रा, हर सूं हेत लगाय॥
हँस हिंयाळी परगटै, हरख हदीरां जाय।
गुरु सरणै ‘लालू’ भण, हर हर नांव चिताय॥