पिरथी जाणै कूड़ कपट सो, साचां सांईं साहब सत्त।

जागो नाथ ! साध सुख पावैं, थां सूतां म्हानै कुण गत।

माथै पांव परम गुरु मेलो, पाळ करीज्यो पिरथी पत्त।

परबत भान करो थे राई, राई सूं करद्‌यो परबत्त।

मनसा देवी माय भवानी, सैंस कळा ले’आव सगत्त।

सुर असरां रा न्याव चुकाया, रतन काढिया समदर मत्थ।

पहलादै नै पात निवाज्या, हिरणाकस नै मार्‌यो हत्थ।

सुर तेतीसां बंध छुड़ाई, रावण नै मार्‌यो रुघपत्त।

दुरजोधन-सा दैत सिंघार्‌या, हर पंडवां रै आया रत्थ।

नखमें बात निरंजण थारै, भेष तणी राखो मरमत्त।

राखो लाज पाज गुरु बांधो, साधां री सुरंगी बत्त।

‘लालू’ सदा नाथ नै गावै, नारायण थे राखो पत्त॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सूर्यशंकर पारीक ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जनवरी
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