अनहद की धुन प्यारी साधो।

अनहद की धुन प्यारी रे॥

आसन पद्म लगाकर कर से मुंद कानकी बारी रे।

झीनी धुन में सुरत लगावो होत नाद झनकारी रे॥

पहले पहले रलमिल बाजे पीछे न्यारी न्यारी रे।

घंटा शंख बंसरी बीणा ताल मृंदग नगारी रे॥

दिन दिन सुनत नाद जब बिकसे काया कंपत सारी रे।

अमृत बूंद झरे मुख मांही योगी जन सुखकारी रे॥

तन की सुध सब भूलजात है घट में होय उजारी रे।

ब्रह्मानन्द लीन मन होवै देखी बात हमारी रे॥

स्रोत
  • पोथी : श्री ब्रह्मानन्द भजनमाला ,
  • सिरजक : परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द ,
  • प्रकाशक : श्री ब्रह्मानन्द आश्रम पुष्कर, अजमेर
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