जोग जुगत हम पाई रे।

मूलद्वार में बंध लगायो उलटी पवन चलाई रे।

षट चक्कर का मारग शोधा नागन जाय उठाई रे॥

नाभी से पश्चिम के मारग मेरु दंड चढ़ाई रे।

ग्रंथी खोल गगन पर चढ़िया दश में द्वार समाई रे॥

भंवर गुफा में आसन माच्यो काया सुध बिसराई रे।

बिन चंदा बिन सूरज निशदिन जगमग जोत जगाई रे॥

शिव शक्ति को मेल भयो जब सुन में सेज बिछाई रे।

ब्रह्मानन्द सतगुरु किरपा से आवागमन मिटाई रे॥

स्रोत
  • पोथी : श्री ब्रह्मानन्द भजनमाला ,
  • सिरजक : परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द ,
  • प्रकाशक : श्री ब्रह्मानन्द आश्रम पुष्कर, अजमेर
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