इंडो फोड़ आभथळ रचिया, मुखतीसर महमायी।
ईसर विष्न ब्रह्मा रिख वासक, धरती धवळ उठाई।
अठसठ धाम रामरिख थरप्या, पुन री पाज बंधाई।
परबत मेर पवन पति पाणी, चांद सुरज दोय सायी।
रूप अरूप भोमियाँ भारी, दैत दळया दुख दायी।
हाका कर हिरणांकस ढा’यो, नरसिंघ बार बजाई।
खालक खान ऊभांनै मळिया, अनवीं लंक नवाई।
रावण मार लंका गढ तोड़्यो, देवां बंध छुड़ाई।
माया देख मना ! मत गरबो आयथा देख पराई।
छोड़ चल्या भड़ भूपत ऊभी, खाटी कंई न खाई।
गुरु जसनाथ निरंजण जोगी, जैरी जुग-जुग जोत सुवाई।
नाथ जती रा बाळक भणियां, देव तणा बिड़दाई।
गुरु परसाद भणै सिध ‘लालू’ म्हे जिण गुरु री सरणाई॥