सुरनर अरज करै सायब नै, सुण स्वामी दाता किरतार !

सुर पत सुर तेतीसूं विलखा, सुर नर ऊभा पोळ दुवार !

ब्रह्मा विष्न महेसर ईसर, गोरख जोगी ज्ञान बिचार।

गुरु चेलै आळोच रचायो, दोन्यूं आया थळी मँझार॥

जादम घर जाणी रै आया, बुध रूपी निकळंग ओतार।

मात पिता नै मान बडाई, हमीरै घर जाग्या किरतार॥

मार पलाथी तपस्या बैठा, जाप जप्यो वां ओंकार।

मात पिता कळपै दुख पावै, सोच करै सारो परिवार॥

थे तो बाळक भोजन जीमो, लाडू पेड़ा खीर कसार।

घिरत मिठाई गीरी छुंवारा, दूध मंगायो देव दुवार॥

लेय बिसन्नर होमण बैठा, घिरत मंगायो देव दुवार।

ब्रह्मा जाप जप्या जुग जूना, सुरग मंडळ में गई महकार॥

सुर तेतीसूं हुया सुवाया, सुरपत इंदर मेघ मलार।

अणंद कोड़ सिध सिंभू सिंभू साथे, सिध चौरासी दस ओतार॥

पांच’स पांडु दस दिगपाळा, साध संत रो अंत नै पार।

धरती धवळ शेष रिख वासक, साध सती आवैं अणपार॥

नव नाथां गुरु गोरख आया, नाद बजायो ओंकार।

सुणबे काजी सुणवे मुल्लां, सुण हो पिंडत वेद विचार॥

दोऊं कर जोड़ दाखवै, ‘लालू’ इण बिध स्याम लियो ओतार।

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सूर्यशंकर पारीक ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जनवरी
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