Anjas

मीराबाई

  • 1498-1546
  • Marwar

मारवाड़ व मेवाड़ रा राजपरिवार सूं संबंधित अर जग चावी भगत कवयित्री। कृष्ण भगती विषयक माधुर्य भाव रा पदां खातर चावा।

मीराबाई रौ परिचय

जन्म: कुडकी,भारत

राजस्थान री धरती वीरां, वीरांगनावां,भगता, संतां, सूरां अर लोक देवी-देवतावां री जलमभोम कहिजै। भगती रो वातावरण राजस्थान री माटी रै कण-कण में रमियोड़ो है। राजस्थान री भगती परंपरा में शैव, वैष्णव, शाक्त, सगुण, निरगुण आद भगती री सगळी धारावां अर रूप सांमी आवै। अठै प्राचीन अर मध्यकालीन वैष्णव भगति री दो प्रमुख धारावां वेगवती हुई, एक राम भगति धारा अर दूजी क्रिसण भगती धारा। मीरांबाई श्री क्रिसण भगति धारा रा सिरै भगत कवयित्री हा। आप माधुर्य भाव सूं भगवान श्री क्रिसण रै गिरधारी रूप री आराधना किनी अर भजन, हरजस, पद आद बणाय'र खुद रा भगती भाव नै रूड़ौ सबदरूप प्रदान कियौ। मीरांबाई री आ भगती आखी दुनियां में उणांनै मान-सनमान दिरायौ अर क्रिसण भगति धारा नै भी समृद्ध किनी। औ इज कारण है कै प्राचीन अर मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य में संत साहित्य आपरी ठावी ठौड़ राखै। मीरा रै जलम स्थान, जीवन काल अर व्यक्तित्व रै सम्बन्ध में विद्वानां री अलग-अलग राय है। बिंया घणकरा विद्वानां रै मत अर प्राप्त तथ्यां रै अनुसार मीरांबाई रौ जलम मेड़ता रियासत री थरपणां करणिया राव दूदा रै राजकंवर रतन सिंह रै अठै विक्रमी संवत् 1555 में हुयौ मानीजै। वां रो जलम स्थान घणकरां विद्वान 'कुड़की गांव' मान्यौ है पण राजस्थान बोर्ड रा पाठ्यक्रम में शामिल राजस्थानी साहित्य री किताब में 'बाजौली गांव' बताइज्योड़ौ है।
मीरांबाई रौ बाळपणो मेड़ता नगर में बीत्यौं। अठै आप माथै राव दूदाजी रै धार्मिक विचारां रौ गहरो असर पड्यौ। 
मीरांबाई रो ब्याव विक्रमी संवत् 1573 में मेवाड़ महाराणा सांगा रै पाटवी राजकुमार भोजराज सागै मेड़ता नगरी में घणै धूमधाम सूं हुयौ। महाराणा सांगा खुद बारात में पधारिया हा।
ब्याव रै 5–6 बरस पछै ही मीरां बाई रै पति कुंवर भोजराज रो सुरगवास होगियौ। इण घटना रै बाद आप रै जीवन में एक भीतरी संघर्स पैदा हुयौ अर वै लौकिक सम्बन्ध रा बंधणां सूं मुगति ले ली़। भगवान री भगती में तल्लीन रैवता थकां मीरां बाई कैवण लागा कै 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई'
आपरै ब्याव विक्रमी संवत् 1573 सूं लैय'र 1590 लग मीरां बाई चित्तौड़गढ़ में इज रैया। महाराणा सांगा मीरांबाई रो घणो मान-सम्मान राख्यौ। सांगा रै बाद वांरो राजकंवर रतनसिंह मेवाड़ रौ महाराणा बण्यौ पण दुर्जोग सूं तीन बरसां पछै ही उण रो देहावसान बूंदी में होयग्यौ। वां पछै राजकंवर विक्रमादित्य महाराणा बण्यौ। वै मीरांबाई री भगती साधना नै समझ नीं सक्या अर वां सूं नाराज रैवता थका वांनै दुःख देवणौ सरू कर दियौ। इण कारण जद गुजरात रौ बादशाह चितौड़ पर हमलो करियौ उणसूं पैली मीरांबाई नै उणारां 'बाबोसा' (बड़ा पिता) मेड़ता राव वीरमदेव मेड़ता नगर ले आया। उठै कुछ समै रैय'र मीरांबाई वृंदावन चल्या गया। श्री क्रिसण रा धाम वृंदावन में मीरांबाई जीवन गौस्वामी सूं मिल्या।
वृन्दावन मीरांबाई नै घणौ सुहावणो लाग्यौ, बठै री ब्रजभूमि घणी पवितर लागी। उण भौम रौ गुणगान करती मीरां बाई कैवै -
'आली म्हानै लागे वृन्दावन नीको ।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा दरसण गोविन्द जीको।'

मीरांबाई रो मन वृन्दावन में केई दिन लाग्यो रैयो पण उण जागां मोकळा सम्प्रदायां रौ ओछापण देखता थकां वां रौ मन उचाट होयग्यौ अर वि. संवत 1596–1597 रै बिचाळै राय रणछोड रै धाम द्वारकापुरी जा पूग्या। आपरा अंतिम समै द्वारका में ही बितावता थका मीरां बाई द्वारकाधीस री मूरत में लीन होयग्या।
मीरांबाई री लिख्योड़ी पूरी अर अधूरी रचनावां री संख्या ग्यारह है-
गीत गोविन्द री टीका
नरसीजी रा मायरा,
राग सोरठ रा पद,
मलार रा गोविन्द,
सत्य भामा नु रूसण,
मीरा री गरबी,
रूकमणी मंगल,
नरसी मेहता री हुंडी,
चरीत (चरित्र),
फुटकर पद।
आं में फुटकर पद ई मीरांबाई रा प्रामाणिक पद मानीजै। आप री भासा राजस्थानी है पण काव्य में ब्रज बोली रा सबदां री भी बोहळायत है। मीरांबाई आपरै प्रिय नै निरगुण अर सगुण दोनूं रूपां में मान्यौ। आप रै पदां में हठयोग रौ प्रभाव भी दीसै। वै क्रिसण री भगत, विद्रोहिणी अर साध्वी हा। आप रै साहित्य में सहज भावना अर पीड़ा रौ मेल-मिलाप है। आप री रचनावां री भासा सहज, सुभाविक, अर सरल पदावली लियोड़ी सीधी सादी है। 
मीराबाई री भगती ने प्रेमा भगती, दास्य भगती आद नांव दिरिज्या है जिण में आध्यात्मिक असर अर भगत हिरदै रौ गंभीर भाव मौजूद है। आप रा पदां में भगती अर प्रेम रस री प्रधानता रै कारण वां नै दांपत्य अर माधुर्य भाव रा पदा री श्रेणी में राखीजै।
भगवान क्रिसण री भगती में लीन मीरांबाई रो दरद देखणजोग है -
दरस बिन दूखण लागा नैण जद सूं आप बिछुड़या प्रभु मौरे, कबहुँ न पायौ चैन । 
सबद सुणत म्हारी छतियाँ कांपै, मीठ थारा बैन।
विरह कथा कासूं कहूं सजनी, बह गई करबत ऐन।
कल न परत पल पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण ।
मीरां रा प्रभु कबरे मिलोगा, दुख मेटण सुख देण।।

प्राचीन अर मध्यकाल रा क्रिसण भगतां में मीरांबाई रो नाम सिरमौर है। मीरांबाई री भगति उदातभावां भरी निरमळ भगति ही, जिण सूं देस अर काल री सीमावां नै लांघ'र सगळी मानवता मीरां सूं जुड़ी। मीरांबाई रो भगति काव्य जगचावो हुयौ।
मीरांबाई केवल सगुण भगत इज नी अपितु एक क्रान्तिकारी महिला भी हा जिणां रै आज सूं पांच सौ बरसां पैली दियौड़ै 'हेला' री गूंज आज भी सुणीजै।
मीरांबाई रै जुग रौ राजस्थानी समाज जात-पांत रा बंधना में बंधयौडौ हो। शिक्षा री कमी ही। अंधविस्वास अर कुरीतियां ज्यूं पड़दा प्रथा, सती प्रथा, मौसर, दायजो बहुविवाह, अणमेळ ब्याव, बाळपणा रा ब्याव आद समाज में फैल्योड़ा हा। उण समैं मीरांबाई नारी चेतना री आवाज बण्या। समाज री बेड़ियां ने बगाय'र विरोध रो सूर दर्ज करायो।
इण तरै मीरांबाई एक भगत कवयित्री रै साथै साथै नारी सगति रा प्रतीक रूप में भी ओळखीजै।