ग़ज़ल4 काख में बिस्तर थोड़ै सबदां में रात तो अेकलपणै री अेक गरदिस ही तो है सोच रो वातावरण गंदो हुयो है
दूहा5 काळी पीळी हो रई, अब पाणी री धार मैना कोयल टीस री सूई धागौ लड़ पड़्या, चादर होई बेहाल संकल्पां रै हाथ रो साधारण सी हो गई, वचन भंग री बात
रतनलाल दाधीच शान्ति शर्मा प्रवीण सुथार नीतू शर्मा कृष्णगोपाल शर्मा श्याम महर्षि अनुराग सुभाष पाटोदिया