बस्ती बस्ती सौर हुयो है बीं की मेरी है दोस्ती दूसरी गंगा ल्याणी है दुसमनां सूं तू निभाणू छोड़ दे जठै जठै उजियारा व्हैला लोग जो मद में चूर हुया मोहबत री बातां, मत कर नदी झील सागर रा किस्सा सांच सूं इंकार कर रह्या है, युधिष्ठिर