Anjas

कृपाराम खिड़िया

  • जलम: 1768
  • Marwar

आगली पांत रा डिंगल कवियों में खास गिणावणजोग नांव। 'राजिया रा सोरठा' शीर्षक सूं घण चावै नीतिपरक संबोधन काव्य रा सिरजणहार।

कृपाराम खिड़िया रौ परिचय

राजस्थानी नीति संबंधी संबोधन काव्य लिखण वाळां में कृपारामजी खिड़िया रौ नांव हरोळ पंगत में आवै।
कविवर कृपारामजी खिड़िया डिंगल रै आदि जुग रै सिरै कवि चांदणजी खिड़िया री वंश परंपरा में जगरामजी खिड़िया (खराड़ी) रै घरै जलम्या। जगरामजी नें कुचामण ठाकर जालमसिंहजी 'जसुरी' गाँव इनायत कियो। कृपारामजी रौ जलम इण ही गाँव में हुयो। कृपारामजी डिंगल अर पिंगल रा निष्णांत कवि हा। इणां रै काव्य गुणां सूं प्रभावित होय'र सीकर रावराजा देवीसिंहजी अर वां रा पुत्र रावराजा लक्ष्मणसिंहजी क्रमशः महाराजपुरा अर लक्ष्मणपुरा दो गाँव इनायत किया। जिणां रा ताम्रपत्र वि.सं. 1847 अर 1858 रा है।
कृपारामजी री कई रचनावां प्रसिद्ध है, जिणां में राजिया रा सोरठा, लक्ष्मण विलास, गीत गंगाजी रौ, गीत चाळकनेच रौ, चाळकनेच नाटक, छंद चाळकनेच आद रै साथ कई फुटकर गीत भी है। कृपारामजी री लोकप्रियता रौ कारण उणां री रचना 'राजिया रा सोरठा' है। वां रौ एक राजाराम (राजियो) नाम रौ चाकर हो जो कै रावणो राजपूत हो। राजिया रौ जलम डॉ. शक्तिदान जी कविया वि.सं. 1825 में होवणो लिख्यो है। कैयो जावै कै राजिया रै कोई संतान नी ही सो उण नें चिंता ही कै उणरै मरियां पछै उण रौ कोई नाम लेवणियो ई इण संसार में नी है। एकर कृपारामजी बीमार पड़िया जणै राजियो रात-दिन एक कर'र तन-मन सूं सेवा करी। उण री सेवा सूं अभिभूत होय'र कविवर राजिया नें कुछ मांगण रौ कैयो तो राजियो आपरी चिंता कविराज नें बताई तद कृपारामजी कैयो कै वे उणनें कविता रै माध्यम सूं अमर कर देवेला। लोग कृपाराम रौ नाम भूल जावैला पण राजिया नें नी भूलैला। आगै जाय'र आ बात फळीभूत भी होई। आज लोग कृपारामजी रौ नाम कम अर राजिया रौ नाम अधिक जाणै। राजिया री प्रसिद्धि सुण'र जोधपुर महाराजा मानसिंहजी राजिया नें बुलायो। उण रौ अति साधारण व्यक्तित्व देख'र महाराजा कैयो कै 'ए तो कवि इ है जको थनै राजावां तक पूगाय दियो-

'सोनैं री साजांह, मोताहळ जड़िया महीं।
 कीधो कविराजाह, राजा मालम राजिया।।'

यूं तो कैयो जावै कै 'राजिया रा सोरठा' सातबीसी (140) है पण हस्तलिखित प्रतियां में 123 सूं बेसी सोरठा नीं मिळै। राजिया रा सोरठा राजस्थानी जनमानस में इतरा लोकप्रिय हुया कै पछै खेपक रै रूप में कई सोरठा इण में जुड़ता गया। पण वे सोरठा भाव, भाषा अर बणगट रै हिसाब सूं दूजै कवियां रा सुभट लखावै।
राजिया रा सोरठा भाषा री प्रांजळता, भावां री सबळता अर सुग्राह्यता रै पांण इण भांत लोक में जगै बणाई कै आज भी लोकोक्तियों रै रूप में परोटीजै। नीति रा नगीना जड़्या थका है, जिका भूलै भटक्यै नें सुभग मार्ग बतावण में सक्षम है।
'लक्ष्मण विलास'  काव्य शास्त्र सूं संबंधित एक लाक्षणिक ग्रंथ है।
'चाळकनेच नाटक' में कवि आपरी आराध्या देवी 'चाळकनेच' रै नृत्य रौ वरणाव कियौ है। आ रचना पढण सूं लागै कै कवि फगत डिंगल-पिंगल इ नी बल्कै संस्कृत रा भी विद्वान हा। छप्पय छंदां में सृजित अर भाषा री दीठ सूं  महताऊ आ रचना देवी भक्तां रै बिचाळै लोकप्रिय है। इण छंद री भाषा प्रवणता देखणजोग है-

तरणि जलज रजि रुचिर, भजत अज सरचि अरज भव।
सरव काळ इच्छित सहस्र, मस्तक धर माधव।
अंग धरन क्रत संग, परम भसमंग विलेपन।
खंजळ महि हरि सिख्यते, तत बरतत त्रिगुण तन।
अव्यय अनंत अनबध इक, अग जग व्यापक सरवमय।
कह कृपाराम कारण करण, जय जय जय जगदम्बि जय।।

इणीगत 'चाळकनेच रौ छंद' ई देवी स्तुति री सांतरी रचना रै रूप में भक्तां बिचाळै चावो है। त्रिभंगी छंद में प्रणीत रास रै भाव री इण रचना री बानगी सूं इ आंपानै ठाह लाग जावैला कै कवि री रसना माथै आखर किणगत अठखेलियां करता-

तिलड़ी लड़ लटकत तड़ता तटकत, गटकत भोजन गूंदगिळां।
पीवत मद मटकत प्याला पटकत, थटकत नित मनरंग थळां।
नाचत न्रत नटकत अलकां छिटकत, भैचर अटकत वास भमै।
बणि जवान घड़ी खिण बूड्ढिय बाळक, रांमत चाळकनेच रमै।।

'राजिया रा सोरठा' तो नीति काव्यां में सगळा सूं चावी रचना है। अर शायद राजस्थानी संबोधन काव्य री सुरसरि रौ उद्गम स्थल ओ इ है। शुध्द, सरल अर सरस भाषा में सार भरी सुक्तियां नीति काव्य रो नवनीत मानी जावै।
अद्भुत उक्ति चातुर्य रौ अनुपम उदाहरण है ए सोरठा-

कुटळ निपट नाकार, नीच कपट छोड़ै नहीं।
उत्तम करै उपकार, रूठां-तूठां राजिया।।

पढणो वेद पुराण, सोरो इण संसार में।
बातां तणां विनाण, रहस दुहेलो राजिया।।

समझणहार सुजाण, नर औसर चूकै नहीं।
औसर रो अवसाण, रहे घणा दिन राजिया।।

मुख ऊपर मिठियास, घट मांही खोटा घड़ै।
इसड़ा सूं इखळास, राखीजै नह राजिया।।