भुजंगप्रयात छंद14 कहूं भिल्ल बंके बसैं ताय्स्थाँनं कहूँ राग ऐसो करैं मेघ आवैं चले साह आखेट बज्जे निसाँनं चले हयदलं पयदलं सथ्थ रथ्थं जके रूप सौं साह बंध्यौ सुजाँनं
मोतिदाम छंद5 कियौ तब मार हुकम्म सु हेरि बहैं बहु भाँति त्रिबिद्धि समीर भए मतवार सु खेलत फाग मिटै जग सीत न ताप न तोय लगी लखि वायु सबै तिहिं वार
चौपाई9 अध ऊरध चहुँ ओर सुमारैं अलक सलक अतिसै चटकारी घूँघट ओट दुरत प्रगटत यों छुटि समाधि ऋषि नैन उघारे दमकति दिपति सलोंनी दीपति
छप्पय8 इक्क समय आखेट, राव खेलन वन आए कुच कंचन घट प्रगट, नाभि सरवर बर सोहै जैत राव चहुवाँन सकल विद्याजुत सोहै जिती उब्बसी संग, सकल सम्मूह मिलिय वर मृगया महँ जिहिं समय
नाराच छंद3 असंत संत मोहियं, बसंत खोलि जोहियं चल्यौ जु सेख राव पहँ बनाय साज कीनयं लिये सु दोय बज्र लाल एक मुक्त मालयं
पद्धरि छंद9 इक आस्रम सुंदर अति अनूप किय स्राद्ध नंदि मुख बेद बृद्धि पहुँचे सुमारि ऋषि निकट आय रति परम प्रिया ऋतुराज जानि संगीत भाव गावैं अनंत
दूहा9 इक्क समय पातसाह बन करि बिचार त्रिय कृत कृया जलक्रीड़ा हम करत सब भयौ भयानक तिमिर बन हरम सबै पतसाह को
ठाकुर गुमानसिंह भैरूलाल गर्ग झूमरलाल वर्मा बरजूबाई मानसिंह हरीश सुवासिया निशा आर्य घनश्याम लाल रांकावत