इक आस्रम सुंदर अति अनूप कल कूजत कोकिल ऋतु बसंत किय स्राद्ध नंदि मुख बेद बृद्धि पहुँचे सुमारि ऋषि निकट आय रबि तपै विषम अति किरन धूप रति परम प्रिया ऋतुराज जानि संगीत भाव गावैं अनंत सुनि राव जैत मन हर्ष किन्न तिहिं समय काम प्रेर्यौ सुरिंद्र