Anjas

ईसरदास बारहठ

  • 1538-1618
  • Marwar

'ईसरा-परमेसरा' रे विरुद सूं विख्यात। डिंगल रा सिरै भगत कवियों में पैलो नांव। 'देवियाण', 'हरिरस', 'निंदा-स्तुति', 'गुण भागवत हंस' जिसी ठावकी भगतिपरक रचनावां सागै ही 'हालां-झालां रा कुंडलिया' जिसी ऊंचे दरजे री वीर रस री रचना रा भी सिरजक।

ईसरदास बारहठ रौ परिचय

जन्म: भाद्रेस,भारत

निधन: भाद्रेस,भारत

चारण जात में जनम्यां ईसरदासजी राजस्थानी री सगळी काव्य विधावां में पारंगत कवि मान्या जावै। किणी कवि कैयो ई है-
मेहो छंदे झूलणै मालो, सूर पदै गीते हरसूर।
कवित्ते अलू दूहे करमाणंद, पात ईसर विद्या चो पूर॥
महात्मा ईसरदासजी रो जलम 1515 में मान्यो जावै-
संवत पन्नर पन्नरमें, जलम्यां ईसरदास।
चारण वरण चकार में, उण दिन हुवो उजास॥ साथै ई ओ मत ई प्रचलित है कै ईसरदासजी रो जलम 1595में वि.में हुयो-
पंदरा सौ पिच्चाणवें,जनम्या ईसरदास।
चारण वरण चकार में,उण दिन हुवो उजास॥
पण रावल जाम रै शासनकाल री अवधि,नवानगर बसावण री तिथि अर उणांनें मिल्यै गांम रै तांबापतर रै आधार माथै घणकराक विद्वान ईसरदासजी रो जलम 1515 वि. ई मानै अर सही ई लखावै।
ईसरदासजी साहित्य जगत में 'ईसरा सो परमेसरा' रै नाम सूं ओळखीजै। किणी पण कवि रो इतरो सनमान दूजी भाषावां रै कवियां सारू देखण में नीं आवै।
सोळहवीं सदी रा शिखर कवि ईसरदासजी उच्च कोटि रा कवि रै साथै-साथै परम भगत ई हा। उणां री प्रसिद्धि राजस्थान अर गुजरात में समान रूप सूं फैली थकी है।
ईसरदासजी चारणां री रोहड़िया शाखा रा चारण सूरैजी रै घरै भादरेस गाँव में जलम्या। उणां री माँ रो नाम अमरांबाई हो। वे विद्याभ्यास आपरै काका आसाजी बारहठ रै सानिध्य में कियो।
ईसरदासजी रो रचना संसार विस्तार लियो थको है। इण रचना संसार रो समग्र लेखो-जोखो तो हाल तक ई नी हुय पायो। ईसरदासजी री लोकप्रियता इतरी फैली कै दूजै ईसरदास नामक कवियां री रचनावां ई लोगां इणां रे नाम मांडणी शुरू कर दी। जद कै आ बात अनुसंधानकर्ता नें ध्यान में राखणी चाहिजै कै ईसरदास नामक कैई कवि चारण समाज में जलम्या है। 
ईसरदासजी री प्राप्य रचनावां में हरिरसं, देवीयांण, गुण निंदा स्तुति, हालां-झालां रा कुंडलिया, बाल-लीला, भागवत हंस, रासकीला, छोटा हरिरस, ध्यान मंजरी, गुण वादन, किसन केलि, दान लीला, गुण वैराट, अष्टपदी, भाव दर्शन, निर्गुण ब्रह्म री आरती, सूर्य स्तवन, दिलीप नूं तप रै साथै मोकळा भक्ति परक अर तत्कालीन उदार पुरसां रै चारू चरित्र ने अंकित करता थकां डिंगल गीत गिणाया जा सकै।
ईसरदासजी री आ बधताई है कै आप वीर अर भगती परक रचनावां लिखण में समान रूप सूं प्रवीण हा।
ईसरदासजी री रचनावां एकै कांनी पाठकां अर श्रोतावां में भगती रा भाव जगावै तो दूजै कांनी सांस्कृतिक परंपरावां रै पेटे गौरव रा भाव ई जगावै। इण रचनावां सूं कर्तव्य चेतना अर त्याग रो संदेश मिळै। इणां री रचनावां रा वीर नायक आपां सारू वरेण्य है ,क्यूंकै वै वीर कदै न कदै किणी न किणी जीवण मूल्यां अर कर्तव्य पालणा सारू बलिदान रै मारग रो वरण करियो। 
ईसरदासजी री कवितावां पढियां आ बात साव स्पष्ट हुय जावै कै चारण कवि अवसर अनुसार आपरी भूमिका अर कर्तव्य ने समझता। वै एकै कांनी जुध्द में स्वयं लड़ता तो दूजै कांनी जुध्द विमुखां में उत्साह रो संचार ई करता।
गढवी गांगो गावीजै, स्याम न मैल्है साथ।
ओटण अनिकारां नरां, हालां रा पण हाथ।
हाथ आवाहतौ सिंधु रागा थियां।
सहै झूझा थयां बळि जसां रा साथियां।
साथियां जसवंत रै, साव बह सम चड़ो।
गाविजै नेतड़े रोहड़े गांगड़ौ॥
     ईसरदासजी री वीर रसात्मक कविता री आ विशेषता है कै इणां सूं  परवर्ती कवि घणा प्रभावित रैया। जिणां में बांकीदासजी अर सूर्यमल्लजी रा नाम विशेष रूप सूं गिणाया जा सकै।
ईसरदासजी आपरै गुरु पीताम्बर भट्ट सूं भागवत रै महारस रो प्रसाद प्राप्त कर'र ई हरिरस जैड़ै काळजयी ग्रंथ रो प्रणयन कियो। इण हरिरस ग्रंथ सूं ई लोक री धार्मिक अर आध्यात्मिक चेतना ने गति मिळी।
ईसरदासजी आपरी कविता रै माध्यम सूं समन्वय रो महान प्रयास करियो। वे किणी पण सम्प्रदाय में दीक्षित नी हा। ओ ई कारण हो कै उणां आपरी बात लोक हित में निडरता अर प्रमाणिकता साथै कैयी। तत्कालीन समय में हिंदू मुस्लिम एकता रा ईसरदासजी प्रबल पैरोकार हा।
ईसरदासजी री भाषा शैली री बात करां तो एक बात साफ रूप सूं साम्हीं आवै कै वै विषय रै मुजब शैली बदळण में पारंगत हा। डिंगल गीतां अर हालां-झालां रा कुंडलियां री भाषा साहित्यिक तो हरिरस, गरुड़ पुराण आद री भाषा सरल अर सहज है। उणां रै निर्गुण भक्ति भाव रै पदां नै पढियां लखावै कै उणां में भाषा व भावां रो प्रयोग अर समन्वय विरल है। आ बात वो हीज कवि कर सकै जिको लोक हृदय री ओळखाण राखै। ईसरदासजी री भगति परक रचनावां री भाषा आत्म निवेदन री है तो हालां-झालां रा कुंडलियां री भाषा भाव प्रधान।
    इण भांत कैयो जा सकै कै ईसरदासजी रै साहित्य री सौरम राजस्थान अर गुजरात में समान रूप सूं फैल्योड़ी है अर दोनूं भांयखै रा लोग ईसरदासजी ने आपरा प्रिय कवि मानै-
ईसाणंद ऊगाह, तर चनण चारण तणै।
प्रिथमी जस पूगाह, सौरम रूपै सूरवत॥