भीम पांडिया
राजस्थानी मंचीय कविता परम्परा रा खास जातरू। 'हाथ सूं कतर लीनो बोरलो', 'गरीब करोड़पति' आद कविता संग्रै प्रकाशित।
राजस्थानी मंचीय कविता परम्परा रा खास जातरू। 'हाथ सूं कतर लीनो बोरलो', 'गरीब करोड़पति' आद कविता संग्रै प्रकाशित।
बीज नै उगणो पड़सी
भीतर भंवरो गूंजै यूं
दरद रा खोल मती चौबारा
हिमाळै में के थारै बापरी हेमाणी बूरी ही?
हिवडै मायलो हीरक दीप संजोय रे
हूं नान्हो सो दिवलो
जी म्हारा जिवड़ा जी
मिनख क्यूं मिनख नै मारै
पण लूंट सकै तो लूं ठोड़ां नै लू’ठाई सू’ लूं’ट
सूरज री ऊगाळी पैलां जाग रे
उगायो भोर रो तारो
उजासो दीसै आभल कोर
विनासी अणु बम सूं मत खेल