मिले पिव पूरबले भाग, रहे सहेली अखंड लाग॥

अगम महल में पधारे पीव, प्रेम ढोलियो विराजै सीव।

सुरत सुंदरी सज सिंणगार, हीर चीर मोतिया गळहार॥

सोळै सखी बिछावै सेज, राजा राणी अधिक तेज।

पांच पचीसूं खवासी मांहि, परम-सुख कहणा में नाहिं॥

गैब का दीपक अगम उजास, तेजपुंज को भयो प्रकास।

रात दिवस व्यापै नहिं कोय, केवल ब्रह्मा एक ही होय॥

दुख सुख पाप पुन्य नहिं होय, हिन्दू तुरक जानै कोय।

खट दरसण कू गम नहिं काय, जहं बिरला साधूजन जाय॥

दिष्ट मुष्ट अमर अलेख, रूप रेख देह भेख।

मन पवना जहां पहुंचै नाहिं, जहं चल सुरत अकेली जाहिं॥

सुरत सबद वा दुबध्या नाहिं, निराकार निरगुण पद माहिं।

कहण सुणत नहिं धूप छांही, अणभै सबद कहत है आहि॥

सुन्य सेज में मंड्यो विलास, अनंत जनम की पूरी आस।

रामदास जहां निरभै देस, हम पाया गुरु के उपदेस॥

स्रोत
  • पोथी : श्री रामदास जी की बाणी ,
  • सिरजक : रामदास जी ,
  • संपादक : रामप्रसाद दाधीच 'प्रसाद', हरिदास शास्त्री ,
  • प्रकाशक : श्रीमदाद्य रामस्नेही साहित्य शोध - प्रतिष्ठान, प्रधान पीठ, खेड़ापा, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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