सखी री घोर घटा घहराइ।

प्रीतम बिणि हुं भई इकेली, नइणां नीर भराइ॥

देखि संयोगिणि पिउ संग खेलत, सोल सिंगार बनाइ।

मन की वात रही मनही मइं, मनही मइं अकुलाइ॥

धन वैयारी प्यारी प्रिउ की, रहत चरण लपटाइ।

मो सी दुखणी अउर जगत में, कहत जिनहरख काइ॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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