काहु सुं प्रीति न कीजइ, पल पल तन मन छीजइ।
प्रीति कियां जीउ परवसि हुइहइं, झुरि झुरि वृथा मरीजइ॥
नइंना नींद न भूख पियासा, देखण कुं तरसीजइ।
विकल होत इत उत भटकत हे, सुख दे के दुख लीजइ॥
स्यांम होत कंचण सी काया, निति आधीन रहीजइ।
कहइ जिनहरख जाणि दुख कारण, सुगुरु वचन रस पीजइ॥