सो भगवांन भलौ रे भाई। रांम नांम सूं प्रीति लगाई॥
दत औतार कहैं कलि आयौ। अपना साहिब सूं मन लायौ॥
बाहरि रहै न घर मैं जाइ। बैठां दे सो टूकौ खाइ॥
सिन्यासी सो जो आपौ मारै। भजि गोब्यंद र पंथ संवारै॥
पंथ संवारै चालै बाट। टीला बहु लंघै औघट घाट॥