रुत आइ रे बोल मोरा, म्हारा स्याम बिना जिया दोरा।
झिरमिर झिरमिर मेवला बरसै, आंगण मच रह्या सोरा।
घन गरजे अर बिजळी चिमकै, पवन देत झकझोरा॥
उतर दिसा स उठी बादळी, बरस भर्या डैरी धोरा।
गंगा जमना ओर सुरसती, तरबीणी लेत अभोळा॥
राधा भीजै रंगमहल में, बाहर नंदकिसोरा।
मैं भीजूं मोरी सुरंग चुनड़िया, पिवजी को पिचरंग कोरा॥
दादर मोर पपैया बोलै, कोयल करत किलोळा।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, स्याम मिल्यां जिया सोरा।