कौन गुन्हा दधि लूटी रे, कान्हा मेरी।

वृंदाबन की कुंज गलिन में, घर बहियां झकझौरी।

या ब्रज में को हितू हमारो, लोग कहे सब झूठी।

लपट छपट मोरी बहियां मरोरी, सिर की गागर फूटी।

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हा हा करत हि छूटी।

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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