ऊधोजी, म्हारो कांईं गुन्हा-तकसीर,

कुंजन बन त्यागी जी माधो।

जे मैं होती जळ की मछलियां,

हरी करते असनान, चरण बिच तिरती जी माधो।

जे मैं होती बन की कोयलियां,

गऊवां चरावत कान्ह, मधुर धुन सुणती जी माधो।

जे मैं होती गऊ नंदघर,

चारत नंदकिसोर, दरस नित करती जी माधो।

जे मैं होती मोर की पंखियां,

हरि करते सिणगार, मुकुट पर रहती जी माधो।

जे मैं होती सीप को मोती,

हरि गळै में हार, हिये पर रहती जी माधो।

जे मैं होती बांस की बंसरियां,

मुख धरता नंदलाल, अधर रस पीती जी माधो।

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि,

हरि कै चरण में ध्यान, कृष्ण संग रहती जी माधो।

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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