पावस विरहिणी न सुहाइ।
देखि विकटा घटा घन की, अंग मइ अकुलाइ॥
नीर धारा तीर लागइ, पीर तन न खमाइ।
गाज की आवाज सुणिकेइ, चित्त मांझि डराइ॥
सबद चातकी जहर सुणिकै, जीउ निकस्यउ जाइ।
नेमि विणि जिनहरख राजुल ज्यामिना मुरझाइ॥