पावस विरहिणी सुहाइ।

देखि विकटा घटा घन की, अंग मइ अकुलाइ॥

नीर धारा तीर लागइ, पीर तन खमाइ।

गाज की आवाज सुणिकेइ, चित्त मांझि डराइ॥

सबद चातकी जहर सुणिकै, जीउ निकस्यउ जाइ।

नेमि विणि जिनहरख राजुल ज्यामिना मुरझाइ॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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